अनुवाद कला (प्रथम अंश) अभ्यास 3

(विशेषण-विशेष्य की समानाधिकरणता)

१. विधाता की यह सुन्दर सृष्टि उनकी महत्ता को प्रकट करती है, पर वह इससे बहुत बड़ा है।
सुंदरीयं सृष्टिर्विधेर्विभुत्वं प्रख्यापयति, इतो ज्यायांस्तु सः।

२. इस लड़की की वाणी मीठी और सच्ची है। यह कुलीन होगी।
सूनृताऽस्याः कन्यकाया वाक्, इयमभिजाता स्यात्।

३. ये अपने हैं, अतः विश्वास के योग्य हैं।
सगन्धा इमेऽतो विश्वासार्हाः।

४. वह अनाड़ी कारीगर है, जिस काम को हाथ लगाता है, बिगाड़ देता है।
कुशिल्प्ययं, यस्मिन् कर्मणि प्रक्रमते तद्दूषयति।

५. मैं इस समय खाली नहीं हूँ, मुझे अभी बड़ा आवश्यक कार्य करना है।
सम्प्रति सक्षणो नास्मि, आत्ययिकं कार्यं मे वर्तते।

६. मेरा नौकर पुराना होते हुए भी विनीत तथा उत्साही है और तुम्हारा नया होते हुए भी उद्धत और आलसी।
किंकरो मे वृद्धोऽपि विधेयो महोद्यमश्च, नवीनोऽपि तेऽविनीतोऽलसश्च।

७. भारतवर्ष के लोग आवभगत के लिये प्रसिद्ध हैं, विदेश से आये हुए यहाँ घर का सा सुख पाते हैं।
विश्रुतमातिथ्यं भरतवर्षस्थानाम्। वैदेशिका इह गृहलभ्यं सुखं लभन्ते।

८. हिन्दूजाति न्यायप्रिय एवं धर्मभीरु है।
हिन्दूजातिर्वर्तते न्यायप्रिया धर्मभीरुश्च।

९. ये ऊँचे कद के सिपाही पंजाब के सिक्ख हैं और ये छोटे कद के नेपाल के गोरखा।
इमे प्रलम्बाः सैनिकाः पाञ्चनदाः सिक्खजनाः, पृश्नयश्चैते नेपालवासिनो गोरखाजनाः।

१०. आज पिताजी अस्वस्थ हैं, अतः उन्होंने कालेज से दो दिन की छुट्टी ले ली है।
व्याधितोऽद्य पिता, अतस्तेन महाविद्यालयस्य द्व्यहीनोऽनध्यायः कृतः।

११. यह लुभाने वाली भेंट है, इसे अस्वीकार करना कठिन है।
लोभनीयमिदमुपायनं, दुष्करमस्य निराकरणम्।

१२. तू बड़ा अनजान है, ऐसे बातें करता है मानों रामायण पढ़ी ही नहीं।
अनभिज्ञोऽसि नितराम्, अनधीतरामायण इव ब्रवीषि।

१३. देवदत्त बड़ा बातूनी और झूठा है, समाज में इसका आदर घट रहा है।
वाचालो देवदत्तोऽनृतिकश्च, हीयतेऽस्य लोके समादरः।

१४. रमा की साड़ी काली और श्यामा की सफेद है।
रमायाः शाटिका कालिका वर्तते श्यामायाश्च श्येनी।

१५. यह वेग से बहने वाली नदी है, अतः इसे तैर कर पार करना आसान नहीं।
वेगवाहिनीयं वाहिनी, नेयं सुप्रतरा।

१६. यह घोड़ा बड़ा तेज दौड़ता है, होशियार सवार ही इसकी सवारी कर सकता है।
आशुरयमश्वः, अभिज्ञः एवाऽश्वारोहोऽस्याऽरोहायाऽलम्।

१७. क्या यह महाराज दशरथ की प्यारी धर्मपत्नी कौसल्या हैं ? सीता के निर्वासन से इसके आकार में बहुत बड़ा विकार हो गया है।
किमियं महाशजदशरथस्य प्रिया धार्मदारा कौसल्या वर्तते? सीतानिर्वासनेनाऽस्या आकारे महाविकारो जातोऽस्ति।

संकेत :-
इस अभ्यास में विशेषण और विशेष्य को समानाधिकरणता दिखानी इष्ट है। विशेषण वाक्य में गौण होता है और विशेष्य प्रधान। जिस का क्रिया में सीधा अन्वय हो वह प्रधान होता है। विशेषण का स्वतन्त्रतया क्रिया में अन्वय न होने से यह अप्रधान है। अतः यह कारक नहीं। तो भी विशेषण के वे ही विभक्ति, लिङ्ग और वचन होते हैं जो विशेष्य के। जैसे :-
१. सुन्दरीयं सृष्टिर्विधेर्विभुत्वं प्रख्यापयति, इतो ज्यायांस्तु सः। (विधि, विरिञ्चि शतधृति- पुं.)।
२. सूनृताऽस्याः कन्यकाया वाक, इयमभिजाता स्यात्।
३. इमे स्वाः (सगन्धाः, आप्ताः)।३. इमे स्वाः (सगन्धाः, आप्ताः)।
४. कुकारक- पुं.।
५. निर्व्यापार, सक्षण- वि.; आत्ययिक- वि.।
६. भृत्य, प्रेष्य, किंकर, अनुचर, परिचारक, भुजिष्य- पुं.।
७. भरतवर्षस्था आतिथ्येन विश्रुताः। वैदेशिका इह गृहलभ्यं सुखं लभन्ते। यहाँ ‘आतिथ्याय’ कहना ठीक न होगा, क्योंकि यहाँ ‘तादर्थ्य’ नहीं, हेतु है। (अलस, शीतक, मन्द, तुन्दपरिमृज-वि.)।
९. प्रलम्ब, प्रांशु- वि.; अल्पतनु, पृश्नि- वि.।
११. लोभनीय- वि.; उपहार- पुं.; उपदा-स्त्री. । उपायन, प्रादेशन, उपग्राह्य-नपुं।
१२. अनभिज्ञोऽसि नितराम्, अनधीतरामायण इव ब्रवीषि।
१३. वाचालो देवदत्तोऽनृतिकश्च, हीयतेऽस्य लोके समादरः। यहाँ समाज के स्थान में लोक शब्द का प्रयोग ही व्यवहारानुगत है।
१४. रमायाः कालिका शाटी, श्यामायाश्च श्येनी। श्श्येतश् (श्वेत) के स्रो लिंग में श्येता और श्येनी दो रूम होते हैं। {यहाँ साड़ी स्वतः काली नहीं, किन्तु रंग देने से काली है, अतः यहाँ कालाच्च (५/४/३३) इस सूत्र से कन् प्रत्यय होगा। हाँ काली गौः ऐसा कह सकते हैं। काली निशा (अन्धेरी रात) ऐसा भी।}
१५. वेगवाहिनीयं वाहिनी, नेयं सुप्रतरा।
१६. आशुरयमश्वः (शोघ्रोऽयं तुरङ्गः)। (अश्ववार, अश्वारोह, सादिन्- पुं.)।
१७. कथं महाराजदशरथस्य प्रिया धर्मदारा इयं कौसल्या। यहाँ ‘महाराजदशरथस्य’ व्यधिकरण विशेषण है । ‘इयम्’ भी सार्वनामिक विशेषण है। अतः विभक्ति, लिङ्ग, वचन में कौसल्या विशेष्य के अधीन है। (विकार, विपरिणाम, परिवर्त, अन्यथाभाव-पुं)।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर“, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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