अनुवाद कला (प्रथम अंश) अभ्यास 11

(क्रिया विशेषण)

१. यह स्पष्ट रूप से (व्यक्तम्) प्रमाद है, आपसे यह कैसे हो गया।
व्यक्तमयं प्रमादः, कथमयं चरितस्त्वया।

२. उसने सुरापान की आदत अभी पूरी तरह से (निरवशेषम्) नहीं छोड़ी, यदि कुछ देर और पीता रहा, तो निःसन्देह (असन्देहम् निर्विचिकित्सम्, मुक्तसंशयम्) इसके फेफड़े खराब हो जायेंगे।
न तेन सुराप्रसङ्गो निरवशेषं विसृष्टः। यदीतोऽग्रेऽपि पास्यन् भविष्यति तर्हि निःसन्देहमस्य फुप्फुसं दुर्गतिं यास्यति।

३. वह दर्द भरे स्वर से (करुणम्, आर्तम्) चिल्लाया, जिससे आसपास बैठे हुए सभी लोगों के हृदय में दया भर आई।
स करुणमाक्रन्दत्, येनोपोपविष्टानां हृदयान्याविशत् कारुण्यम्।

४. उसने यह पाप इच्छा से (कामेन, कामात्, कामतः) किया था, योंही नहीं, अतः गुरुजी ने उसे त्याग दिया।
स कामेनेममपराधमचरन्नाकामेन, तेन तं निराकुर्वन् गुरुचरणाः।

५. भ्वादि, दिवादि, तुदादि और चुरादि-ये क्रम से पहला, चौथा, छठा तथा दसवां गण हैं।
भ्वादिः, दिवादिः, तूदादिः चुरादिः – इमे क्रमात् प्रथमचतुर्थषष्ठदशमा गणा भवन्ति।

६. अभिज्ञानशाकुन्तल विशेष कर (विशेषेण, विशिष्य) कोमल बुद्धिवाले बालकों के लिये कठिन है। वे इसका रसास्वादन नहीं कर सकते।
अभिजानशाकुन्तलं विशेषेण सौम्यमतिबालानां दुर्ज्ञेयम्। न तैरस्य रसास्वादनं कर्तुं शक्यम्।

७. हे मित्र ! यह बात हँसी से कही गई है, इसे सच करके न जानिये।
परिहासाविजल्पितं सखे परमार्थेन न गृह्यतां वचः।

८. उसने खुल्लमखुल्ला (प्रकाशम्) अधिकारियों के दोषों को कहा और परिणामस्वरूप अनेक कष्टों को सहा।
तेनाधिकारिणां दूषणानि प्रकाशं प्रोक्तानि। परिणामतश्च बहुशः कष्टानि सोढानि।

९. आप यहाँ से सीधे दाहिने हाथ जायें, आप थोड़ी देर में विश्वविद्यालय पहुँच जायेंगे।
इतो हस्तदक्षिणोऽवक्रं याहि, क्षिप्रं विश्वविद्यालयमासादयिष्यसि।

१०. वह दयानतदारी से (ऋजु) जीविका कमाता है और थोड़े से (स्तोकेन) ही सन्तुष्ट होकर सुख से रहता है।
स ऋजुतयाजीविकामर्जयति स्तोकेन हि सन्तुष्य सुखं निवसति।

११. तपोवन में स्थानविशेष के कारण विश्वास में आये हुए हिरन निर्भय होकर (विस्रब्धम्) घूमते फिरते हैं।
विस्रब्धं हरिणाश्चरन्ति तपोवने, अचकिता देशागतप्रत्ययाः।

१२. सांप टेढ़ा ( कुटिलम्, जिह्मम् ) चलता है, पर शेर महानद को भी छाती के बल से सीधा तैर कर पार करता है।
सर्पः कुटिलं सर्पति, सिंहस्तूरसा महानदमपि तीर्त्वा पारं गच्छति।

१३. शिव यथार्थ में (अन्वर्थम्) ईश्वर है, वस्तुतः ईश, ईश्वर, ईशान, महेश्वर मुख्यतया इसी के नाम हैं और गौणतया दूसरे देवताओं के।
शिवोऽन्वर्थमीश्वरोऽस्ति। वस्तुतः ‘‘ईशः, ईश्वरः, ईशानः, महेश्वरः’’ इत्येतानि प्राधान्येनास्यैव नामधेयान्यप्राधान्येन तु देवतान्तराणाम्।

१४. दूर तक देखो, निकट में ही दृष्टि मत रखो, परलोक को (भी) देखो, (केवल) इस लोक को ही नहीं।
दीर्घं पश्यत मा ह्रस्वं, परं पश्यत माऽपरम्।

१५. उसने मुझे जबरदस्ती (हठात्, बलात्, प्रसभम्, प्रसभेन) खींचा और पीछे धकेल दिया।
स मां प्रसभं प्राकृषत् पृष्ठतश्च प्राणुदत्।

संकेत :-
१. कथमयं चरितस्त्वया।
२. प्रसङ्ग-पुं.। प्रसक्ति-स्त्री.। पुप्फुस-नपुं.।
३. करुणमाक्रन्दत, येनोपोपविष्टानां हृदयान्याविशत्कारुण्यम्। उपोपविष्टः = समीप उपविष्टः।
४. स कामेन (कामतः) इममपराधमचरन्नाकामतः (न तु यदृच्छया), तेन तं निराकुर्वन् गुरुचरणाः। यहाँ ‘कामेन’ यह तृतीया सहार्थ में है, ‘‘कामेन सह’’ यह अर्थ है। इसीलिए यहाँ द्वितीया नहीं हुई।
५. भ्वादिः, दिवादिः, तुदादिः, चुरादिः-इमे क्रमात् प्रथमचतुर्थषष्ठदशमा गणा भवन्ति। यहाँ क्रमात् = क्रममाश्रित्य।
९. इतो हस्तदक्षिणोऽवक्र याहि, क्षिप्रं विश्वविद्यालयमासादयिष्यसि।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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