अनुवाद कला (प्रथम अंश) अभ्यास 10

(क्रियाविशेषण)

१. यह नदी विना शब्द किये (अशब्दम्) बहती है। यह गहरी है और इसमें पत्थर नहीं है।
अशब्दं वहतीयं वाहिनी। गम्भीरा चेयं नाश्मवती।

२. गुरु की ओर मुंह करके (अभिमुखम्) बैठ, विमुख होकर बैठना अनादर समझा जाता है।
गुरोरभिमुखमुपविश। विमुखीभूयोपवेशनं त्वनादरो मतः।

३. वह अटक-अटक कर (सगद्गदम्, स्खलिताक्षरम्) बोलता है, उसकी वाणी में यह स्वाभाविक दोष है।
सगद्गदं भाषते सः। तस्य वाच्ययं सहजो दोषः।

४. तूने ठीक (युक्तम्, साधु) व्यवहार नहीं किया, इसलिए तुम्हारी लोक में निन्दा हो रही है।
त्वं युक्तं न व्यवाहरः, अतोऽसि लोके निन्द्यमानः।

५. तुम व्याकरण पर्याप्त रूप से (पर्याप्तम्, प्रकामम्) नहीं जानते, अतः ग्रन्थकार का आशय समझने में कभी कभी भूल कर जाते हो।
न त्वं व्याकरणं प्रकामं जानीषे, अतः कदाचिदाशयमन्यथा गृह्णासि।

६. नारद अपनी इच्छा से (स्वैरम्) त्रिलोकी में घूमता था और सभी वृत्तान्त जानता था।
त्रिलोकी स्वैरं समचरन्नारदः सर्वं च लोकवृतमबोधत्।

७. मैं बड़ी चाह से (सोत्कण्ठम्, सोत्कलिकम्) अपने भाई के घर लौटने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।
सोत्कण्ठं प्रतीक्षे गृहं प्रति भ्रातुः प्रत्यावृत्तिम्।

८. मैं आप से बलपूर्वक (साग्रहम्) और (नम्रम्, सप्रश्रयम्) प्रार्थना करता हूँ कि आप इस संकट में मेरी सहायता करें।
साग्रहं सप्रश्रयं चात्रभवन्तं प्रार्थयेऽत्रभवता संकटेऽस्मिन् साहायकं मे सम्पाद्यमिति।

९. पहले (पूर्वम्) हम दोनों एक दूसरे से बराबर होते हुए मिलते थे, अब आप अफसर हैं और मैं आपके नीचे नियुक्त हूँ।
समानौ भूत्वा पूर्वं मिलावः स्म, साम्प्रतं त्वमीश्वरोऽस्यहं च त्वदधिष्ठितो नियोज्यः।

१०. कृपया आप मुझे शान्ति से (समाहितम्) सुनें। मुझे आपके हित की कई एक बातें कहनी हैं।
समाहितं मां शृणुत, हितं वो वक्तुमना अहम्।

११. बच्चा बहुत ही (बलवत्) डर गया है, अभी तक होश में नहीं आता है।
बलवद् भीतोऽयं बालः। अधुनाऽपि संज्ञां न प्राप्तः।

१२. आप स्पष्टतर (निर्भिन्नार्थतरकम्) कहिये। मुझे आपका कथन पूरी तरह (निरवशेषम्) समझ नहीं आता।
निर्भिन्नार्थतरकं भाषतां भवान्। भवत्कथितं निरवशेषं नावगच्छामि।

१३. शाबाश (साधु, साधु) देवदत्त, तुमने अपने कुल को बट्टा नहीं लगने दिया।
साधु देवदत्त साधु, रक्षितं त्वया कालुष्यात्कुलयशः।

संकेत :-
१. इयमश्मवती न। नदी, तटिनी, तरङ्गिणी, वाहिनी- स्त्रीलिङ्ग।
४. नाचरः, न व्यवाहरः।
५. भ्रमसि। आशय समझने में.. कदाचिदाशयमन्यथा गृह्णासि।
६. त्रिलोकी स्वैरं समचरन्नारदः, सर्वं च लोकवृत्तमबोधत्। तृतीयान्तयुक्त होने पर सम्-चर् धातु आत्मनेपदी होती है, सो यहाँ आत्मनेपदी नहीं हुवा।
७. गृहं प्रति भ्रातुः प्रत्यावृत्ति (भ्रातरमावतिष्यमाणम्) सोत्कण्ठं प्रतीक्षे।
८. साग्रहं सप्रश्रयं चात्रभवन्तं प्रार्थयेऽत्रभवानत्ययेस्मिन्ममाभ्युपपत्तिं सम्पादयतु (अत्रभवता संकटेस्मिन्साहायकं मे सम्पाद्यमिति)।
९. अब आप अफसर.. = त्वमीश्वरोऽसि, अहं च त्वदधिष्ठितो नियोज्यः।
१०. समाहितं मां शृणुत। यहाँ कृपया, सकृपम् इत्यादि कहना व्यर्थ है, क्योंकि यह अर्थ प्रार्थना में आये हुए लोट् लकार से ही कह दिया गया है।
१३. साधु देवदत्त साधु, रक्षितं त्वया कालुष्यात्कुलयशः। यहाँ ‘‘साधु कृतम्’’ यह सम्पूर्ण वाक्य होता है।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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