अनुवाद कला (प्रथम अंश) अभ्यास 9

(क्रियाविशेषण)

१. आप आराम से (सुखम्, साधु) बेठें, तपोवन तो अतिथियों का अपना घर होता है।
सुखमास्तां भवान्। तपोवनं त्वतिथिजनस्य स्वं गेहम्।

२. बुढ़िया धीरे-धीरे (मन्दम्, मन्दमन्दम्, मन्थरम्) चलती है, बेचारी दुःखों से सूखकर पिंजर हो गई है।
मन्दमन्दं याति जरती। वराकीयं कृच्छ्रक्षामाऽस्थिपञ्जरः संवृता।

३. बुद्धिमान् पदार्थों को ध्यान से (निपुणम्) देखते हैं और अच्छे बुरे में विवेक करके कार्य में प्रवृत्त होते हैं।
बुधाः पदार्थान् निपुणमीक्षन्ते, सदसद्विवेकन च कार्ये प्रवर्तन्ते।

४. वह मधुर (मधुरम्) गाता है। जी चाहता है उसे बार-बार सुनें।
मधुरं गायति सः। वाञ्छामि तमविरतं श्रोतुम्।

५. वह कठोर (परुषम्, कर्कशम्) बोलता है, पर हृदय से सभी का शुभ ही चाहता है।
कर्कशभाष्यपि स हृदयेन सर्वेषां शुभेच्छुकोऽस्ति।

६. वह आज लगातार (निरन्तरम्, सन्ततम्, अविरतम्, अनारतम्) पढ़ता रहा, अतः खूब (बाढम्, दृढम्) थक गया है।
अद्य सोऽनारतं पठने रतः, अतो बाढं श्रान्तो जातः।

७. जो पापी होता हुआ भी मुझे अनन्य भक्त होकर भजने लगता है वह शीघ्र (क्षिप्रम्) धर्मात्मा बन जाता है।
अपि चेत्सुदुराचारो मामन्यभाग् भजमानः क्षिप्रं धर्मात्मा भवति।

८. आप विश्वास कीजिये, मैंने यह अपराध जानबूझ कर (मत्या बुद्धिपूर्वम् अभिसन्धिपूर्वम्) नहीं किया।
विश्वसितु भवान्, मया मत्यायमपराधो न कृतः।

९. गरमी की ऋतु है, मध्याह्न समय है, सूर्य बहुत तेज (तीक्ष्णम्) चमक रहा है।
घर्मकालोऽयं मध्याह्नश्च भास्करोऽपि तीक्ष्णं भासते।

१०. विना इच्छा (अमत्या, अनभिसन्धि) किये हुए पाप के लिये शास्त्र बड़ा दण्ड विधान नहीं करते, क्योंकि संकल्प ही कार्य को अच्छा या बुरा बनाता है।
अमत्या चरिताय पापाय शास्त्रं कठोरं दण्डविधानं न करोति, यतः सङ्कल्पो हि शुभाशुभं सम्पादयति।

११. धीर पुरुषों का चरित्र बहुत ही (अतिमात्रम्, अभ्यधिकम्) प्रशंसनीय है। वे प्राणों का संकट होने पर भी न्याय के मार्ग से एक पग भी नहीं डिगते।
चरित्रं हि भवत्यतिमात्रं प्रशंसनीयं धीराणाम्। न्याय्यात्पथः पदं न प्रविचलन्ति प्राणात्ययेऽपि ते।

१२. आज सभा में वसुमित्र देशभक्ति के विषय पर विस्तार और स्पष्टता से बोला। सभी ने इसके व्याख्यान को पसन्द किया।
अद्य वसुमित्रः सभायां देशभक्तिविषयं सविस्तरं विशदं च व्याख्यत्। सर्वेऽस्य व्याख्यानमभ्यनन्दन्।

१३. वह छिपी हुई मुस्कराहट से बोला, क्या बात है आज तो आप बड़ी बुद्धिमत्ता की बातें करते हैं।
सोऽन्तर्लीनमवहस्याब्रवीत्, अद्य तु प्रज्ञावादान्भाषसे, किमेतत्।

संकेत :-
इस अभ्यास में क्रिया-विशेषणों के प्रयोग का यथार्थ बोध कराना इष्ट है। क्रिया-विशेषण नपुसक लिंग की द्वितीया विभक्ति के एकवचन में प्रयुक्त होते हैं, जैसे-
१. सुखमास्ताम्, भवान् तपोवनं ह्यतिथिजनस्य स्वं गेहम्।
२. मन्थरं याति जरती। तपस्विनीयं कृच्छ्रक्षामाऽस्थिपञ्जरः संवृत्ता।
११. प्राणात्ययेऽपि। न्याय्यात् पथः। न व्यतियन्ति, न विचलन्ति।
१२. अद्य वसुमित्रः सभायां देशभक्तिविषयं सविस्तरं विशदं च व्याख्यत्। चक्षिङ् का लुङ् में रूप है। यहाँ ‘सविस्तारम्’ नहीं कह सकते। विस्तार (पुं.) चीजों की चौड़ाई को कहते हैं। अभ्यनन्दन्।
१३. सोन्तर्लीनमवहस्याब्रवीत्-अद्य तु प्रज्ञावादान्भाषसे, किमेतत्। ‘अव’ क्रिया की अपरिपूर्णता को कहता है, अतः अव-हस् का अर्थ मुस्कराना हुआ।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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