अनुवाद कला (प्रथम अंश) अभ्यास 8

(अजहल्लिङ्ग विधेय)

१. उर्वशी इन्द्र का कोमल शस्त्र, स्वर्ग का अलंकार, तथा रूप पर इतराने वाली लक्ष्मी का प्रत्याख्यान-रूप थी।
उर्वशी सुकुमारं प्रहरणं महेन्द्रस्य अलङ्कारः स्वर्गस्य, प्रत्यादेशो रूपगर्वितायाः श्रियः।

२. वेद पढ़ी हुई वह राजकन्या अपने आपको बड़भागिन समझती है। उसका अपने प्रति यह आदर ठीक ही है।
आम्नायेऽधीतिनी सा राजकुमार्यात्मानं कृतिनीं मन्यते। युक्ता खल्वस्या आत्मनि सभावना।

३. परमात्मा की महिमा अनन्त है, अतः यह वाणी और मन का विषय नहीं।
परिच्छेदातीतः परमेश्वरस्य महिमा, अतो वाङ्मनसयोरगोचरः।

४. विपत्ति मित्रता की कसौटी है, सम्पत्ति में तो बनावटी मित्र बहुत मिलते हैं, इन्हें मित्राभास कहते हैं।
विपत्तिर्मित्रताया निकषोऽस्ति। सम्पत्तौ तु कृत्रिमाणि मित्राणि बहुशो लभ्यन्ते, मित्राभासानि तान्युच्यन्ते।

५. व्यभिचारिणी स्त्री घर का रोग हैं। विधिपूर्वक व्याही हुई भी ऐसी स्त्री को छोड़ दें।
पुंश्चली गृहस्याधिर्भवति। विधिवत्परिणीताप्यसौ परिहर्तव्या।

६. आप हम सबका आसरा हैं, आपको छोड़कर हम कहाँ जाये।
अस्माकं गतिस्तु भवानेव, भवन्तं विहाय कुत्र वा गच्छेम?

७. हम देवताओं की शरण में जाते हैं और नित्य उनका ध्यान करते हैं।
वयं देवतानि शरणं यामो नित्यं च तानि ध्यायामः।

८. निराश न होना ऐश्वर्य का मूल है, निराश न होना परम सुख है, क्योंकि जो विघ्नों से ठुकराये हए निराश हो जाते हैं वे नष्ट हो जाते हैं।
अनिर्वेदः श्रियो मूलमनिर्वेदः परं सुखम्। यतो विघ्नैस्तु प्रतिहता नश्यन्ति ते निर्वेदिताः।

९. गोविन्द मेरा शरीरधारी चलता फिरता जीवन है और सर्वस्व है।
गोविन्दो मम मूर्तिसंचराः प्राणाः सर्वस्वं च।

१०. एक गुणी पुत्र अच्छा (वरम्) है, सैकड़ों मूर्ख नहीं, अकेला चाँद अन्धेरे को दूर कर देता है, हजारों तारे नहीं।
वरमेको गुणी पुत्रो न च मूर्खशतान्यपि। एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न च तारासहस्रकम्।

११. वह गुणों का घर (आगारम्) होता हुआ भी नम्र है।
स गुणानाम् अगारमपि सन् नम्रो वर्तते।

१२. दो महीनों की एक ऋतु होती है और छः ऋतुओं का एक वर्ष।
द्वौ द्वौ मासावृतुर्भवति, षड्ऋतवश्च वर्षम्भवति।

१३. जिस समाज में मूर्ख प्रधान होते हैं और पण्डित गौण, वह चिर तक नहीं रह सकता।
यत्र समाजे मूर्खाः प्रधानमुपसर्जनं च पण्डिताः स चिरं नावतिष्ठते।

१४. सोना खदिर के धधकते हुए कोयलों के सदृश दो कुण्डल बन जाता है।
सुवर्णपिण्डः खदिराङ्गारसवर्णे कुण्डले भवतः।

१५. यह होनहार ब्राह्मणी है, इसने छः मास के भीतर सारा अमरकोष कण्ठस्थ कर लिया है।
द्रव्यमियं ब्राह्मणी। एनया षण्मासाभ्यन्तरेऽमरकोषः कण्ठस्थी कृतः।

संकेत :-
२. आम्नायेऽधीतिनी (अधीतवेदा) सा राजकुमार्यात्मानं कृतिनी मन्यते। युक्ता खल्वस्या आत्मनि संभावना। यहाँ ‘आत्मन्’ शब्द के नित्यपुल्लिङ्ग होने पर भी ‘कृतिन्’ विधेय स्त्रीलिङ्ग में प्रयुक्त हुआ है। इस ने उद्देश्य ‘सा’ के लिङ्ग को लिया है। (‘क्यङ्मानिनोश्च’ इस सूत्र की व्याख्या में काशिका का ‘‘या त्वात्मानं दर्शनीयां मन्यते तत्र पूर्वेणैव सिद्धम्’’ यह वचन प्रमाण है। पर अन्यत्र साहित्य में ‘आत्मन्’ में अन्वित हुए विशेषण व विधेय पुंल्लिङ्ग देखे जाते हैं। काशिका का पाठ सिद्धान्तकौमुदी में भी जैसा का तैसा मिलता है।)
३. परिच्छेदातीतः परमेश्वरस्य महिमा, अतो वाङ्मनसयोरगोचरः। यहाँ वाक् च मनश्चेति ‘वाङ्मनसे’ ऐसा द्वन्द्व होता है।
४. निकष, कष, निकषोपल- पुं। कृत्रिम, कृतक- वि.। मित्राभासानि तान्युच्यन्ते।
५. कुलटा, इत्वरी, धर्षणी, असती, पुंश्चली। आधि- पुं.।
६. गति- स्त्री.।
७ वयं देवतानि शरणं यामो नित्यं च तानि ध्यायामः। ‘शरण’ रक्षिता अर्थ में नपुं. एक वचन में ही प्रयुक्त होता है।
८. निर्विद्यन्ते। निर्पूर्वक दिवा. वद् लट्।
९. गोविन्दो मम मूर्त्तिसंचराः प्राणाः सर्वस्वं च। जीवन अर्थ में ‘प्राण’ नित्य बहुवचनान्त है।
१२. द्वौ द्वौ मासावृतुर्भवति, षड्ऋतवश्च वर्षम्भवति। यहाँ विधेय के अनुसार क्रियापद का वचन हुआ है। इसके लिये विषयप्रवेश देखो।
१३. यत्र समाजे मूर्खाः प्रधानमुपसर्जनं च पण्डिताः स चिरं नावतिष्ठते।
१४. द्रव्यमियं ब्राह्मणी । एनया……कण्ठे कृतः। ‘‘द्रव्यं च भव्ये’’ (५/३/१०४) सूत्र में आचार्य द्रव्य शब्द का भव्य अर्थ में निपातन करते हैं। भव्य = होनहार। ‘द्रव्यं भव्ये गुणाश्रये’ यह अमर में भी पाठ है।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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