अनुवाद कला (प्रथम अंश) अभ्यास 7

(अजहल्लिङ्ग विधेय)

१. मिथिलानरेश की बेटी, कन्याओं में रत्न, रूपवती सीता के स्वयंवर में नाना दिशाओं और देशों से राजा आये।
मैथिलस्य कन्यारत्नस्य रूपवत्याः सीतायाः स्वयंवरार्थं नाना दिग्भ्यो देशेभ्यश्च राजानः समायाताः।

२. रानी धारिणी को उसके भाई सीमा-रक्षक वीरसेन ने मालविका भेंट रूप में (उपायनम्) भेज दी।
अन्तपालेन भात्रा वीरसेनेन देव्यै धारिण्यै मालविकोपायनं प्रेषिता।

३. यह अंगूठी राजा की ओर से भेंट (प्रतिग्रहः) है, इसे उचित आदर से ग्रहण कीजिये।
अङ्गुलीयकमिदं राज्ञः प्रतिग्रहः। सादरं गृहणैतत्।

४. कौन सी कला या विज्ञान बुद्धिमान् उद्योगी पुरुष की पहुँच से परे (अविषयः) है।
का कला विज्ञानं वा मतिमतो व्यवसायिनोऽविषयः।

५. ऋषियों की प्रतिभा-दृष्टि से कौन सा पदार्थ परे है। वे तो दूर, पर्दे के पीछे छिपे हुए पदार्थों को भी हस्तामलकवत् देख लेते हैं।
किं नाम सत्त्वम् ऋषीणां प्रातिभस्य चक्षुषोऽगोचरः, ते हि भगवन्तो व्यवहितविप्रकृष्टमपि हस्तामलकवत्पश्यन्ति।

६. उनका तो क्या ही कहना, वे तो विद्या के निधि (निधानम्) और गुणों की खान (आकरः) हैं।
का कथा तेषां, ते तु विद्याया निधानं गुणानां चाकरः सन्ति।

७. राम मेरा प्यारा पुत्र (पुत्रभाण्डम् ) है, अतः सीतानिर्वासन-रूप महापराध करने पर भी मैं उसे दण्ड देना नहीं चाहता।
रामो हि मम पुत्रभाण्डमस्ति, अतः शीतानिर्वासनरूपे महापराधे कृतेऽपि नेच्छामि तं दण्डयितुम्।

८. राम मानो क्षात्र धर्म है, जिसने वेद-निधि की रक्षा के लिए आकार धारण किया है।
(रामः) क्षात्रो धर्मः श्रित इव तनुं ब्रह्मकोषस्य गुप्त्यै।

९. कोरी नीति कायरता है और कोरी वीरता जंगली जानवरों की चेष्टा से बढ़कर नहीं।
कातर्यं केवला नीतिः शौर्य श्वापदचेष्टितम्।

१०. सच पूछो तो वह शरीरधारी अनुग्रह का भाव है। जो भी उसके द्वार पर गया, खाली हाथ नहीं लौटा।
वस्तुतस्तु स शरीरधार्यनुग्रहस्य भावोऽस्ति। योऽपि तस्य द्वारं प्रति गतः, न स रिक्तहस्तः प्रत्यागतः।

संकेत :-
१. मैथिलस्य, कन्यारत्नस्य, कन्याललामस्य। ललाम (नपुं.) = प्रधान। यह नान्त भी है।
२. अन्तपालेन भ्रात्रा वीरसेनेन देव्यै धारिण्यै मालविकोपायनं प्रेषिता। यहाँ भी उद्देश्य मालविका (उक्तकर्म) के अनुसार ही क्तान्त प्रेषिता स्त्रीलिङ्ग हुआ है। ‘‘तस्या भ्रात्रा’’ कहना व्यर्थ है। ऐसा कहने की शैली नहीं।
३. अङ्गुलीयक -नपुं.। ऊर्मिका -स्त्री.
४. का कला विज्ञानं वा मतिमतो व्यवसायिनोऽविषयः। ‘अविषयः’ तत्पुरुष है।
५. किं नाम सत्त्वम् ऋषीणां प्रातिभस्य चक्षुषोऽगोचरः, ते हि भगवन्तो व्यवहितविप्रकृष्टमपि हस्तामलकवत्पश्यन्ति। ‘अगोचरः’ भी अविषयः की तरह यहाँ तत्पुरुष है। सो ये दोनों पुं. एकवचन में प्रयुक्त हुए हैं। बहुव्रीहि का यहाँ अवकाश नहीं। प्रतिभा एव प्रातिभम्। स्वार्थ मे अण्।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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