अनुवाद कला (प्रथम अंश) अभ्यास 6

(अजहल्लिङ्ग विधेय)

१. गुरुजी कहते हैं दूसरे कि निन्दा मत करो, निन्दा पाप है।
परनिन्दां मा स्म कुरुत, निन्दा पापं भवतीति गुरुचरणाः।

२. राम अपनी श्रेणी का रत्न है और अपने कुल का भूषण है।
राम श्रेण्या रत्नं कुलस्य चावतंसः।

३. वे सब मङ्गल पदार्थों के निवास स्थान (निकेतन) और जगत् की प्रतिष्ठा हैं।
ते सर्वेषां मङ्गलानां निकेतनं सन्ति, जगतश्च प्रतिष्ठा।

४. पाण्डव छोटी अवस्था में ही कौरवों की शङ्का का स्थान बन गये।
पाण्डवाः प्रथमे वयस्येव कुरूणां शंकास्थानं बभूवुः।

५. वह राजा की कृपा का पात्र (पात्र, भाजन) हो गया और लोगों के सत्कार का भी।
स नृपानुग्रहस्य पात्रं जातः, लोकस्यादरस्यापि।

६. अविवेक आपदाओं का सबसे बड़ा कारण (परं पदम्) है, अतः अच्छे बुरे में विवेक करके कार्य करे।
अविवेकः परमापदां पदम्, अतः सदसद्विवेकेन कार्यं कुरुत।

७. माधव कष्ट में (हमारा) रक्षक (पद) है, ऐसा हमारा दृढ़ निश्चय है।
पदमापदि माधव इत्यस्माकं दृढो निश्चयः।

८. गुणियो के गुण ही पूजा का स्थान हैं, न लिंग और नहीं वय।
गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न लिङ्गं न च वयः।

९. अच्छा राजा प्रजात्रों के अनुराग का पात्र (आस्पद, भाजन) हो जाता है, और राष्ट्र को सुख का धाम बना देता है।
भद्रो भूपः प्रजानाम् अनुरागास्पदं भवति राष्ट्रं च स्वर्लोकं भावयति।

१०. जो शासक पिता की तरह प्रजाओं का रक्षण, पोषण तथा शिक्षण करता है और उनसे कर के रूप में जो लेता है उसे कई गुणा करके उन्हीं को दे देता है वह आदर्श शासक है।
शासको यः पितेव प्रजाः पालयति पोषयति प्रशिक्षयति च, शुल्करूपेण च ताभ्यो यदादत्ते तद् बहुलीकृत्य ताभ्य एव प्रतिददाति, स आदर्शः शासकानाम्।

११. सांख्य के अनुसार प्रकृति (प्रधान) जगत् का आदि कारण (निदान) हैं, पुरुष असंग, साक्षी और निर्गुण है।
सांख्यानुसारं प्रकृतिर्जगतः कारणमस्ति, पुरुषस्त्वसङ्गः साक्षी निर्गुणश्च।

१२. विद्वानों का कथन है कि मृत्यु शरीरधारी जीवों का स्वभाव (प्रकृति) है और जीवन विकार है।
मरणं प्रकृतिः शरीरिणां विकृतिर्जीवितमुच्यते बुधैः।

१३. इन्द्र ने असुरों को तेरा लक्ष्य (शरव्य, लक्ष्य) बना दिया है, यह धनुष उनकी ओर खींचिये।
कृताः शरव्यं हरिणा तवासुराः। शरासनं तेषु विकृष्यतामिदम्।

१४. सत्पुरुषों के लिये सन्देह के स्थलों में अपने अन्तःकरण की प्रवृत्तियां प्रमाण होती हैं।
सतां हि सन्देहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्तःकरणप्रवृत्तयः।

१५. इक्ष्वाकु-कुल में गुणों से प्रसिद्ध ककुत्स्थ नाम का राजा सब राजाओं में श्रेष्ठ (ककुद् नपुं) हुआ।
ऐक्ष्वाक आहतलक्षणः ककुत्स्थो नाम नृपतिर्नृपतीनां ककुदं बभूव।

संकेत :-
इस अभ्यास में ऐसे विधेय पद दिये गये हैं जो अपने लिंग को नहीं छोड़ते, चाहे उद्देश्यों का लिंग उनसे भिन्न हो। ऐसे शब्दों को ‘अजहल्लिङ्ग’ कहते हैं। ये प्रायः एकवचन में प्रयुक्त होते हैं। {भाजन, पात्र, पद आदि शब्द कभी कभी बहुवचन में प्रयुक्त होते हैं- भवादृशा एव भवन्ति भाजनान्युपदेशानाम् (कादम्बरी)।}
१. परनिन्दां मा स्म कुरुत, निन्दा हि पापं भवतीति गुरुचरणाः। यहाँ ‘‘पूज्या गुरवः’’ के स्थान में ‘गुरुचरणाः’ कहना व्यवहार के अधिक अनुकूल है। इसके पीछे क्रियापद को छोड़ना ही शोभादायक है।
२. रामः श्रेण्या रत्नं कुलस्य चावतंसः। रत्न नित्य (नपुं) और अवतंस नित्य पुं. है। यहाँ ‘‘स्वस्याः श्रेण्याः, स्वस्य कुलस्य’’ कहना व्यर्थ है। प्रायः अपने अर्थ में ‘स्व’ का परिहार करना चाहिये, विशेष कर सम्बन्धि शब्दों के साथ। मातरं नमति, न कि स्वां मातरं नमति।
३. ‘‘ते सर्वेषां मङ्गलानां निकेतनं सन्ति, जगतश्च प्रतिष्ठा।’’ ऐसे स्थलों में क्रियापद उद्देश्य के अनुसार होता है।
४. ‘‘पाण्डवाः प्रथमे (पूर्वे) वयस्येव कुरूणां शङ्कास्थानं बभूवुः।’’ यहाँ भी उद्देश्य की कर्तृता मानकर उसके अनुसार ही क्रियापद बहुवचन में प्रयुक्त हुआ है। ‘कुरूणाम्’ के स्थान में ‘कौरवाणाम्’ कहना अशुद्ध होगा, ऐसे ही ‘कौरव्याणाम्’ भी।
१०. वह आदर्श शासक है = स आदर्शः शासकानाम् (शासितॄणाम्)। ‘आदर्शशासकः’ नहीं कह सकते। आदर्श नाम दर्पण का है।
१५. ‘‘ऐक्ष्वाक आहतलक्षणः ककुत्स्थो नाम नृपतिर्नृपतीनां ककुदं बभूव।’’

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर“, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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