अनुवाद कला (प्रथम अंश) अभ्यास 5

१. ऋषि और मुनि सबकी पूजा के योग्य हैं, क्योंकि वे पापरूपी दलदल में फंसे हुए लोगों का उद्धार करते हैं।
ऋषयो मुनयश्च पूजार्हा भवन्ति, यतस्ते पापपङ्कनिमग्नानुद्धरन्ति।

२. राम और सीता प्राणियों में सब से अधिक पवित्र थे, इनके जन्म से दशरथ और जनक के वंश ही कृतार्थ नहीं हुए, तीनों लोक भी।
रामः सीता च प्राणिनां पवित्रतमौ। एनयोर्जन्मना न केवलं जनकदशरथयोः कूले कृतिनी संजाते, त्रीणि भुवनान्यपि।

३. दिलीप और उसकी रानी सुदक्षिणा नन्दिनी गौ के बड़े भक्त थे। चाहे दिन हो या रात ये इसकी सेवा में लगे रहते थे।
महाराजदिलीपो महाराज्ञीसुदक्षिणा च नन्दिनीनामिकाया गो महाभक्तौ बभूवुः। अहर्निशं तामेव सेवमानावास्ताम्।

४. काम और क्रोध मनुष्य के आन्तरिक महाशत्रु हैं, कल्याण चाहने वाले बुद्धिमान् को इनकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये।
कामः क्रोधश्च मनुष्यस्यान्तस्थौ महारिपू स्तः। हितैषी बुध एनौ नोपेक्षेत।

५. देवदत्त और उसकी बहिन पढ़ाई से ऊब गये हैं, लाख यत्न करने से भी इनका मन पढ़ाई में नहीं लगाया जा सकता।
देवदत्तस्तस्य च भगिनी पर्यध्ययनौ संजातौ। यत्नशतेनापि न शक्यमनयोर्मनः पठने प्रसञ्जयितुम्।

६. प्रमाद और आलस्य विनाशकारी हैं। दोनों ही लोकयात्रा के विरोधी हैं।
प्रमाद आलस्यं च विनाशके स्तः। उभे लोकयात्राया विरोधिनी।

७. दानशीलता, दया और क्षमा मनुष्य को सबका प्यारा बना देते हैं। इन गुणों को दैवी सम्पत्ति कहते हैं।
दानशीलता, दया, क्षमा च मनुष्यं सर्वप्रियं कुर्वन्ति। इमे गुणा दैवी सम्पद् इत्युच्यते।

८. निद्रा और भय प्राणियों का समान धर्म है और अभ्यास और वैराग्य से इन्हें कम किया जा सकता है।
निद्रा भयं च प्राणिनां साधारणे। एतेऽभ्यासवैराग्याभ्यां शक्ये व्यपकर्ष्टुम्।

९. बड़े हर्ष की बात है कि यह वही दीर्घबाहु अञ्जना का पुत्र है, जिसके पराक्रम से हम और सभी लोग कृतार्थ हुए।
दिष्ट्याा सोऽयं महाबाहुरञ्जनानन्दवर्धनः। यस्य वीर्येण कृतिनो वयं च भुवनानि च।

१०. मुझे व्याकरण और मीमांसा दोनों रुचिकर हैं, अर्थशास्त्र में मुझे थोड़ो ही रुचि है।
व्याकरणं मीमांसा चोभेऽपि मम रुचिरे स्तः, अर्थशास्त्रे तु ममाल्पैव रुचिर्वर्तते।

संकेत :-
यहाँ ऐसे वाक्य दिये गये हैं जिनमें उद्देश्य अनेक हैं, पर विधेय एक है। उद्देश्य जब भिन्न-भिन्न लिङ्गों के हों तो विधेय का क्या लिङ्ग होना चाहिये, यह व्यवरथा करनी है।
दूसरे वाक्य में राम और सीता दो उद्देश्य हैं, एक पुल्लिङ्ग और दूसरा स्त्रीलिङ्ग। इस अवस्था में विधेय पुल्लिङ्ग होगा। वचन के विषय में कोई सन्देह नहीं।
रामः सीता च प्राणिनां पवित्रतमौ।
एनयोर्जन्मना न केवलं जनकदशरथयोः कुले कृतिनी संजाते, त्रीणि भुवनान्यपि (कृतीनि संजातानि)। ‘जनक’ अल्पाच्तर है, अतः समास में इसका पूर्व निपात हुआ।
१. पापपङ्कनिमग्नानुद्धरन्ति।
२. आन्तर, अन्तस्थ, अन्तःस्थ (‘‘खपरे शरि विसर्गलोपो वा वाच्यः’’)-वि. संस्कृत में आन्तरिक आभ्यन्तरिक शब्द नहीं मिलते।
३. दिवा वा नक्तं वा।
४. शिव, कल्याण, भव्य, भावुक, भविक -नपुं.।
५. देवदत्तस्तस्य भगिनी च पर्यध्ययनौ (अध्ययनाय परिग्लानौ), यत्नशतेनापि न शक्यमनयोर्मनः पठने प्रसञ्जयितुम्। ‘‘लाख यत्न करने से’’ इत्यादि स्थलों में संस्कृत में ‘शत’ का प्रयोग शिष्ट-संमत है। शत का यहाँ अनन्त अर्थ है।
६. उभे लोकयात्राया विरोधिनी। यहाँ नपुंसक उद्देश्य के अनुसार विधेय का लिङ्ग होता है। ‘उभे’ सर्वनाम भी नपुं. द्विवचन है।
८. निद्रा भयं च प्राणिनां साधारणे। एते अभ्यासवैराग्याभ्यां शक्ये व्यपकर्ष्टुम्। यहाँ दो उद्देश्यों में से ‘निद्रा’ स्त्रीलिङ्ग है और ‘भय’ नपुंसक लिंग है। इनका एक विधेय ‘साधारण’ नपुं. द्विवचन में रखा गया। इन्हीं दो उद्देश्यों के लिये एक सर्वनाम एतद् भी नपुं. द्विवचन में प्रयुक्त हुआ।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर“, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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