अनुवाद कला (प्रथम अंश) अभ्यास 30

(सर्वनाम)

१. जो ठंडक है वह जल का स्वभाव है गरमी तो आग और धूप के मेल से होती है।
उष्णत्वमग्न्यातपसम्प्रयोगाच्छैत्यं हि यत्सा प्रकृतिर्जलस्य।

२. यम वह नित्यकर्म है जो शरीरसाध्य है और नियम वह अनित्य कर्म है जो बाह्य साधनों पर निर्भर है।
शरीरसाधनापेक्षं नित्यं यत्कर्म तद्यमः। नियमस्तु स यत्कर्मानित्यम् आगन्तुसाधनम्।

३. नौकर जब बड़े बड़े कार्यों में सिद्धि को प्राप्त करते हैं उसे तू प्रभु लोगों के आदर का ही फल जान।
सिध्यन्ति कर्मसु महत्स्वपि यन्नियोज्याः सम्भावनागुणमवेहि तमीश्वराणाम्।

४. निश्चय ही वाणी का फोक है जो अशुद्ध शब्द है।
ऋजीषं वा एतद्यः संस्कारहीनः शब्दः।

५. ऋषि लोग घमण्डी और पागल की वाणी को ‘राक्षसी’ कहते हैं। वह सब वैरों का कारण और लोक के विनाश की देवता है।
ऋषयो राक्षसीमाहुर्वाचमुन्मत्तदृप्तयोः। सा योनिः सर्ववैराणां सा हि लोकस्य निऋर्तिः।

६. क्या तुम सामने उस देवदारु को देखते हो ? इसे शिव ने अपना पुत्र बनाया था।
अमुं पुरः पश्यसि देवदारुं पुत्रीकृतोऽसौ वृषभध्वजेन।

७. देवता और असुर दोनों ही प्रजापति की सन्तान हैं। इनका आपस में लड़ाई झगड़ा होता आया है।
सुरासुरा हि सन्ति प्राजापत्याः। नित्यो ह्येषां संग्रामः।

८. कोई जन्म से देवता होते हैं और कोई कर्म से। दोनों का दुबारा जन्म नहीं होता।
केचन जन्मना देवता भवन्ति केचित्तु कर्मणा। उभयेऽप्यपुनर्भावकाः।

९. हृदय वह है जो पहचान करता है, दूसरा चञ्चल मांसमात्र है। नहीं तो क्या कारण है कि सौ में से एक ‘सहृदय’ माना जाता है।
हृदयं तद्विविङ्क्ते यद्भावमन्यच्चलं पलम्। शतैकीयाः सहृदया गण्यन्ते कथमन्यथा॥

१०. जनक ने कहा वह मेरा योग्य सम्बन्धी था, वह प्यारा मित्र था, वह मेरा हृदय था। महाराज श्री दशरथ मेरे लिए क्या न था।
जनक उवाच, “स सम्बन्धी श्लाघ्यः प्रियसुहृदसौ तच्च हृदयम्। महाराजः श्रीमान् किमिव मम नासीद् दशरथः।

११. यद्यपि रघुनन्दन ने मेरी पुत्री के साथ अन्याययुक्त कर्कश व्यवहार किया तो भी मैं उसे चाप वा शाप से दण्ड देना नहीं चाहता, क्योंकि वह मेरा प्यारा पुत्र है।
यद्यपि रघुनन्दनेन मदात्मजया सहान्याय्यं कर्कशं चाचरितं तथापि नेच्छामि धनुषाभिशापेन वा तं दण्डयितुम्, यतस्तत्पुत्रभाण्डं हि मे।

१२. जो सूत्र का उल्लङ्घन करके कहा जाए, उसका स्वीकार न होगा।
यो ह्युत्सूत्रं कथयेन्नादो गृह्येत।

१३. सत्य से बड़ा धर्म नहीं और अनृत से बढ़कर पाप नहीं ऐसा पूर्व (प्रथम, पूर्व) मुनि कहते हैं।
नास्ति सत्यात्परो धर्मः, नास्त्यनृतात्पातकं परमिति प्रथमे मुनयः।

१४. थोड़े ही (अल्प) मनुष्य यह विश्वास करते हैं, कि अहिंसा का प्रभाव जीता नहीं जा सकता।
अजेयो ह्यहिंसाप्रभाव इति कतिपयमनुष्याणां विश्रब्धः।

१५. इन (अदस्) प्राणों के लिए मनुष्य क्या क्या पाप नहीं करता। क्षीण हुए हुए लोग निर्दय होते हैं।
एभ्यः प्राणेभ्यः पुरुषः कीदृक्पापान्याचरति। क्षीणा हि निर्दया भवन्ति।

१६. जो जिसको प्यारा है वह उसके लिए कोई अपूर्व वस्तु है। क्योंकि वह कुछ भी न करता हुआ सुख देकर दुःख दूर कर देता है।
अकिञ्चिदपि कुर्वाणः सौख्यैर्दुःखान्यपोहति। तत्तस्य किमपि द्रव्यं यो हि यस्य प्रियो जनः।

१७. जो ये लोग घर आए हुए शत्रुओं का भी आतिथ्य करते हैं, यह इनका कुलधर्म है।
यदेते गृहागतेषु शत्रुष्वप्यातिथेया भवन्ति, स एषां कुलधर्मः।

संकेतः- नामों के प्रयोगों के विषय में कुछ विशेष वक्तव्य हैं। सामान्यतया इस अभ्यास में सर्वनाम का प्रयोग नाम के स्थान पर किया जाता है जब कि नाम को एक से अधिक बार प्रयोग करने की अपेक्षा होती है, क्योंकि एक ही शब्द की आवृत्ति अखरती है। इस प्रकार प्रयुक्त किए हुए ‘सर्वनाम’ ‘नाम’ के ही लिङ्ग, विभक्ति और वचन को ले लेते हैं और यह स्वाभाविक है। (यो यत्स्थानापन्नः स तद्धर्मो लभते)। रामो राज्ञां सत्तमोऽभूत्। स पितुर्वचनमनुरुध्य वनं प्रव्रजदित्यनपायिनीं कीर्तिमाप्नोत्। वृत्तन वर्णनीया यज्ञदत्तसुता देवदत्ता नाम। तां परोक्षमपि प्रशंसति लोकः। ग्रामोपकण्ठे विमलापं सरोऽस्ति। तस्मन्सिुखं स्नान्ति ग्रामीणाः। इन वाक्यों में जहाँ नाम और सर्वनाम की विभक्ति में भेद दीखता है, वह उपरी दृष्टि से है। दुबारा प्रयुक्त होने पर नाम की जो जो विभक्ति होती है वह वह यहाँ सर्वनामों से हुई है। सो विभक्ति के विषय में भी सर्वनाम नाम के अधीन है यह निर्विवाद है। कई बार हम सर्वनाम को नाम के साथ ही प्रयुक्त करते हैं। वहाँ इसका प्रयोग विशेषण के रूप में होता है। और दूसरे विशेषणों की तरह यह भी विशेष्य के अधीन होता है। कस्यैष आत्मनीनो हताशः कितवः। कल्याणाचारेयं कन्या कमन्ववायमलङ्करोति जनुषा। अन्ववायः = अन्वयः = कुलम्।
पर जहाँ वाक्यों में उद्देश्य और विधेय की एकता (अभेद) को बतानेवाले दो सर्वनामों (यद् तद् इत्यादि) का प्रयोग होता है वहाँ लिङ्ग की व्यवस्था कैसी है यह कहना है। भाषामर्मज्ञ शिष्ट लोगों ने इस विषय में कामचार (उद्दिश्यमानप्रतिनिर्दिश्यमानयोरेकत्वमापादयन्ति सर्वनामानि पर्यायेण तल्लिङ्गमुपाददते इति कामचारः-कैयट) बताया है। यदि यद् (यद् शब्द कभी कभी विधेय के लिङ्ग को भी ले लेता है।-श्लेष्म वा एतद्यज्ञस्य यद् दक्षिणा-ताण्ड्या ब्राह्मण १६/१/१३। मुखं वा एतत्संवत्सरस्य यत् फाल्गुनी पौर्णमासी-शाङ्खायन ब्रह्मण ५/१) उद्देश्य के लिङ्ग को ले, तो तद् चाहे उद्देश्य के ही लिङ्ग को लेले चाहे विधेय के। इसमें नियम नहीं। तो तद् का लिङ्ग प्रायः विधेयानुसारी देखा जाता है। जैसे १) शैत्यं हि यत् सा प्रकृतिर्जलस्य। यो हि यस्य प्रियो जनस्तत्तस्य किमपि द्रव्यम्। पर कहीं कहीं ‘तद्’ उद्देश्य के लिङ्ग को भी लेता है। २) शरीरसाधनापेक्षं नित्यं यत्कर्म तद्यृत्तमः (अमर)। सा वीराशंसनं युद्धभूमिर्यातिभयप्रदा (अमर)। यदधमर्णेनोत्तमर्णाय मूलधनातिरिक्तं देयं तद् वृद्धिः-काशिका।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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