अनुवाद कला (प्रथम अंश) अभ्यास 29

(संकीर्ण हलन्त शब्द)

१. योरुप के नीतिज्ञ यह जानते (द्विस्) हुए भी कि युद्ध का परिणाम कितना भयानक होता है, तीसरे विश्वव्यापी युद्ध की तैयारी में लगे हुए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि संसार पागल हो गया है।
हरिर्षीया नीतिविदः संगरस्य प्रतिभयाः परिणतीर्विद्वांसोऽपि तृतीयस्मै विश्वव्यापिने युद्धाय सम्भारान् कुर्वन्ति। उन्मत्तभूतं जगदिति प्रतिभाति।

२. नगर के समीप ठहरे हुए (तस्थिस्) मुनीन्द्र के दर्शन के लिए दूर दूर से लोग आए।
नगरोपकण्ठे स्थितस्य मुनिवृष्णो दर्शनाय जनाः सुदूरादागताः।

३. सब मंगलों (श्रेयस्-नपुं.) को प्राप्त हुए हुए आपके लिए क्या आसीस हो सकती है। हाँ, इतना चाहते हैं कि चिरकाल तक धर्म से प्रजा का पालन करते रहो।
सर्वाणि श्रेयांस्यविजग्नुषस्ते का नामाशीः प्रयोज्या। तथापीदम् आशास्महे चिरं धर्मेण प्रजाः पालनन्भूयाः।

४. वह अकेला सज्जनों में उत्तम है जिसके लिए दूसरे का प्रयोजन ही अपना प्रयोजन है।
स्वार्थो यस्य परार्थ एव स पुमानेकः सतामग्रणीः।

५. देवदत्त का छोटा भाई (कनीयस् भ्रातृ) उससे अधिक चतुर (पटीयस्, मेधीयस्) है।
देवदत्तस्य कनीयान् भ्राता ततो मेधीयान् अस्ति।

६. पाप (एनस्) स्वीकार कर लिया जाए तो यह हल्का (कनीयस्) हो जाता है ऐसी श्रुति है, पाप छिपाया जाए तो बढ़ता है ऐसा दूसरे शास्त्रकार कहते हैं।
निरुक्तमेनः कनीयो भवतीति श्रुतिः। “निगुह्यमानमेनो विवर्धते” इत्यन्ये शास्त्रविदः।

७. हे प्रभो ! तेरी महिमा (महिमन्-पुं.) को गाकर जो हम ठहर जाते हैं वह इसलिए नहीं कि तेरे गुण इतने ही हैं, किन्तु हम अशक्त हैं अथवा हम थक जाते हैं।
महिमानं यदुत्कीर्त्य तव संह्रियते वचः। श्रमेण तदशक्त्या वा न गुणानामियत्तया॥

८. बहुत बार देखा (भूयसा) देखा गया है कि सम्पत्ति से दर्प आ जाता है। विनीत पुरुष भी अविनीत हो जाते हैं।
भूयसाविलोकितं यत्संपत्तेर्जायते दर्पः, विनीतोऽप्यनया भवत्यविनीतः।

९. शत्रुओं (द्विष्) के वचनों में विश्वास न करे। ये अवसर पाकर अवश्य धोखा देंगे।
न द्विषः प्रत्ययं गच्छेत्। तेऽवश्यं यथावशं विप्रलप्स्यन्ते।

१०. यह बैल (अनडुह्) के लिए कुछ भार नहीं, यह तो लादे हुए (आहित) बड़े गड्ढे को आसानी से खींच सकता है।
अनडुहे तु क्षुद्रोऽयं भारः, यतो ह्याहितं बृहच्छकटमपि सुवहमनेन।

११. पुराने आर्य मूँज की जूती (उपानह्-स्त्री.) पहनते थे क्योंकि वे चाम को अपवित्र मानते थे। काश्मीर के श्रमी लोग आज भी इसका उपयोग करते हैं।
प्राचीनार्या मूञ्जोपानहं परिदधते स्म, यतश्चर्म तैरपवित्रं मनमासीत्। काश्मीराः कर्मिणस्त्वद्याप्येतां परिदधते।

१२. इस बरस बरसात (प्रावृष्-स्त्री.) में नदियों में बाढ़ आ जाने से सैकड़ों गाँव बह गए और लाखों मनुष्य बेघर हो गए।
अस्मिन्नब्दे प्रावृषि नदीनामाप्लावेन शतशो ग्रामाः परिवाहिताः, लक्षशश्च जना अनिकेतनाः संवृताः।

१३. आज आकाश में मामूली से बादल हैं, इसलिए हल्की सी धूप है।
अद्याभ्रविलिप्ती द्यौः। अतः क्षीण आतपः।

१४. यह बड़ा भवन ग्राम के मुखिया (स्थायुक) का है। इसके आने-जाने के लिए तीन दरवाजे (द्वार्-स्त्री.) हैं।
स्थायुकस्य हीदं बृहद्भवनमस्ति। गमनागमनायात्र तिस्रो द्वारः सन्ति।

१५. मनुष्य मरणशील (मरणधर्मन्) हैं। ऋषि, मुनि, यति, तपस्वी, ब्रह्मचारी और गृहस्थ सभी को काल के गाल में जाना है।
मरणधर्मा हि मनुष्यः। ऋषयो मुनयस्तपस्विनो ब्रह्मचारिणो गृहस्थाश्चेमे सर्वेऽपि कालकपोलग्रासाः।

१६. हम प्रायः बाहिर की ओर देखते हैं, अपने भीतर नहीं। ब्रह्मा ने इन्द्रियों के गोलक आहर की ओर खुलनेवाले ही तो काटे हैं।
पराग्दृशो वयं न तु प्रत्यग्दृशः। पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूः।

१७. बरसात में सिन्धु नदी का पाट इतना चौड़ा हो जाता है कि यह समुद्र सी प्रतीत होती है।
वर्षासु सिन्धोर्नद्याः पात्रं तथा वरीयो भवति यथैषा जलधिमनुहरति।

संकेतः-
१. हरिर्षीया नीतिविदः संगरस्य प्रतिभयाः परिणतीर्विद्वांसोऽपि (भीतिदानुबन्धान् विजानन्तोऽपि) तृतीयस्मै विश्वव्यापिने युद्धाय सम्भारान् कुर्वन्ति। उन्मत्तभूतं जगदिति प्रतिभाति।
२. नगर के समीप ठहरे हुए = नगरोपकण्ठे, मुनीन्द्र के दर्शन के लिए = मुनिवृषन्।
६. पाप छिपाया जाए तो बढ़ता है = निगुह्यमानमेनो विवर्धते।
९. शत्रुओं (द्विष्) के वचनों में विश्वास न करे = न द्विषः प्रत्ययं गच्छेत्।
१३. आज आकाश में मामूली से बादल हैं = अद्याभ्रविलिप्ती द्यौः।
१६. हम प्रायः बाहिर की ओर देखते हैं, अपने भीतर नहीं = पराग्दृशो वयं न तु प्रत्यग्दृशः।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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