अनुवाद कला (प्रथम अंश) अभ्यास 28

(अस् इस् उस् प्रत्ययान्त)

१. युवावस्था (अभिनवं वयः) शरीर का स्वाभाविक भूषण है। चाहे कोई कितना ही विरूप क्यों न हो जवानी आते ही सुरूप प्रतीत होने लगता है।
अभिनवं वयोऽसंभृतं मण्डनमङ्गयष्टेः। सुविरूपोऽपि सुरूपः प्रतीयते वयस्यस्मिन् समागते।

२. इन जल रहित (निरम्भस्) रेतीले स्थानों में खेतीबाड़ी नहीं हो सकती। हाँ, कहीं कहीं खजूर आदि अपने आप उग पड़ते हैं।
एषु निरम्भःसु सिकतिलदेशेषु कृषिर्न सम्भवति। खर्जूरादयस्तु क्वचित् स्वत एव जायन्ते।

३. डरे हुए राक्षस (रक्षस्-नपुं.) दिशाओं में दौड़ रहे हैं। क्योंकि ये भगवान् के तेज को नहीं सह सकते।
भीतानि रक्षांसि दिशो द्रवन्ति, यतस्तेजो भगवतः सोढुं नार्हन्ति।

४. अग्नि देवताओं को मुख है, क्योंकि यह उनके लिए हवियों (हविस्-नपुं.) को ले जाता है।
अग्निर्वै देवानां मुखम्। एष हि तेषां हविषां वोढा।

५. भारत में पद्म रचना में इतनी अधिक रुचि हुई कि यहाँ अभिधानकोष और स्मृतियाँ तक भी छन्दों में रची गईं।
भारतवर्षे पद्येषु रुचेराधिक्याद् अभिधानकोशा स्मृतयश्च छन्दसा बद्धाः।

६. प्रज्वलित अग्नि की दक्षिण ओर उठती हुई ज्वाला (अर्चिस्-स्त्री., नपुं.) शुभ होती है ऐसा निमित्त जाननेवाले कहते हैं।
उदर्चिषोऽग्नेः प्रदक्षिणमर्चिः शुभायेति निमितज्ञाः।

७. ऋषि छिपे हुए तथा दूर देश में पड़े पदार्थों को भी एकाग्र चित्त (चेतस्-नपुं.) कभी मिथ्या नहीं होता।
ऋषयोऽन्तरितान् दूरदेशीयांश्च पदार्थान् एकाग्रचेतसा साक्षात्कुर्वन्ति। अत एव न विप्लवते तद्वचः।

८. कब मैं भगवती भागीरथी के तट (रोधस्-नपुं.) पर रहता हुआ, कौपीनमात्र धारण करता हुआ, मस्तक पर हाथ जोड़े हुए, हे गौरीनाथ, हे त्रिपुरहर, हे शम्भो, हे त्रिनयन ! इस तरह चिल्लाता हुआ अपने दिनों को आँख की झपक की तरह बिताऊँगा।
कदा (वाराणस्याम्) अमरतटिनीरोधसि वसन् वसानः कौपीनं शिरसि निदधानोऽञ्जलिपुटम्। अये गौरीनाथ, त्रिपुरहर, शम्भो, त्रिनयन प्रसीदेत्याक्रोशन्निमिषमिव नेष्यामि दिवसान्।

९. जब स्कन्द ने इन्द्र की सेनाओं का सेनापति बनकर युद्ध में तारक को मार दिया तो दोनों लोक (रोदस्-नपुं.) सुखी हो गए।
यदा स्कन्दो वासवीयानां चमूनां सैनापत्येऽभिषिक्त आहवे तारकमनीनशत्तदा रोदसी सुखभाजी अभूताम्।

१०. वृद्धों की आसीस् (आशिस्-स्त्री.) से मनुष्य बढ़ता है। इसलिए आसीस् प्राप्ति के लिए वृद्धों की सेवा करनी चाहिए।
वृद्धानाम् आशिषोन्नयते नरः। अत आशिषः प्राप्तये वृद्धा उपसेवनीयाः।

११. इक्ष्वाकु वंश के राजाओं ने इस जगत् को स्वर्ग तक एक धनुष् (नपुं.) से ही जीता।
ऐक्ष्वाकैरिदं जगदास्वर्लोकं धनुषैकेन स्वायत्तीकृतम्।

१२. अग्नि ताप और दाह से रहित है यह वचन परस्पर विरुद्ध है।
अग्निर्नाम तापदाहाभ्यां रहित इति संकुलं वचः।

१३. चरित्र की रक्षा करनेवाले इस ब्रह्मचारी का तो तेज (वर्चस्-नपुं.) सहा नहीं जाता। साक्षात् अग्नि है।
चरित्रवतोऽस्य ब्रह्मचारिणो वर्चोऽसह्यं वर्तते। अयं तु साक्षादग्निरेव।

संकेतः-
१. स्वाभाविक = असम्भृत, अनाहार्य, अविहित् सिद्ध-वि.।
२. रेतीले = सिकतिल-वि.। खेती-बाड़ी नहीं हो सकती = कृषिर्न सम्भवति।
४. अग्निर्वै देवानां मुखम् (अग्निमुखा वै देवाः)। एष हि तेषां हविषां वोढा।
५. छन्दों में रची गईं = छन्दसा बद्धाः।
६. उदर्चिषोऽग्नेः (समिद्धस्य हिरण्यरेतसः) प्रदक्षिणमर्चिः शुभायेति निमितज्ञाः।
७. एकाग्र चित्त से = प्रणिहितेन चेतसा। इसी लिए उनका वचन कभी मिथ्या नहीं होता = अत एव न विप्लवते तद्वचः।
९. यदा स्कन्दो वासवीयानां चमूनां सैनापत्येऽभिसिक्त आहवे तारकमनीनशत्तदा रोदसी सुखभाजी अभूताम्। यहाँ वासवीनाम् कहना प्रामाणिक न होगा। कवियों से प्रयुक्त हुआ हुआ भी यह शब्द अपशब्द ही है। रोदस्-नपुं.। द्विवचन- रोदसी = आकाश व भूमि। इसका द्विवचन होगा रोदस्यौ। अर्थ में कोई भेद नहीं।
१२. अग्निर्नाम तापदाहाभ्यां रहित इति संकुलं (क्लिष्टम्) वचः।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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