अनुवाद कला (प्रथम अंश) अभ्यास 27

(अस्, इस्, उस् प्रत्ययान्त)

१. पौ फटते ही (उषस्-नपुं.) ब्रह्मचारी को ग्राम से बाहर निकल जाना चाहिए। ग्राम में ही इसे कभी सूर्य न निकल आए, नहीं तो इसे प्रायश्चित्त लगेगा।
उषस्येव ब्रह्मचारी ग्रामान्निष्क्रामेत्। ग्रामेऽन्तर्नेममभ्युदियात्सूर्यः। अन्यथा प्रायश्चित्तीयः स्यात्।

२. दुर्वासा (दुर्वासस्) एक ऐसे क्रोधशील मुनि हुए हैं कि जहाँ भी शाप आदि देने का प्रसंग हुआ, कवि लोगों ने उन्हें उपस्थित कर दिया।
दुर्वासा नाम कश्चिद् कोपी मुनिर्बभूव। यदाप्यभिशापप्रसङ्गः प्राप्तस्तदा कविभिरयमेव वर्णितः।

३. चन्द्रमा (चन्द्रमस्-पुं.) की शोभा भी एक अनोखी शोभा है, विशेष कर पूर्णिमा के चाँद और उसकी भी समुद्र तट पर, जब कि समुद्र की तरंगें मानो उसे छूना चाहती हुई उछलती हैं।
चन्द्रमसोऽभिख्या काप्यभिख्यास्ति। विशेषेण पौर्णमासस्य, साऽपि वेलास्थाऽभिख्या, यदा समुद्रवीचयस्तं पिस्पृक्षवो भवन्ति।

४. यह लड़का कुछ उदास (विमनस्) प्रतीत होता है। यह घर जाने को उत्सुक (उन्मनस्) है, क्योंकि इसे माता-पिता से मिले हुए छः मास हो गए हैं।
विमना अयं दृश्यते। गृहगमनायोन्मना एषोऽस्ति, पितरौ दृष्टवतोऽस्य षण्मासा व्यतीताः।

५. जब उसने बड़े भाई के विवाह का शुभ समाचार सुना तो बहुत प्रसन्न (प्रमनस्) हुआ और तत्काल घर को लौटा।
अग्रजस्योद्वाहवृत्तं श्रुत्वा प्रमना भूत्वा स तत्कालं गृहं प्रत्यागतः।

६. कहते हैं विश्वामित्र ने बहुत बरस तपस्या (तपस्-नपुं.) करके ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया।
उच्यते, “विश्वामित्रः कतिपयवर्षाणि तपश्चरित्वा ब्रह्मभूयं गतः”।
७. कमल की जल (पयस्-नपुं.) से शोभा है, जल की कमल से, और तालाब (सरस्-नपुं.) की जल और कमल दोनों से।
सरोजेन पयसः सौंदर्यं, पयसा सरोजस्य, सरसश्च पयःसरोजाभ्याम्।

८. उस पुरुष से जो अपमान होने पर भी क्षोभरहित रहता है, धूल (रजस्-नपुं.) अच्छी है, जो पाओं तले रौंदी जाने पर मस्तक (मूर्धन्-पुं.) पर जा चढ़ती है।
पादाहतं यदुत्थाय मूर्धानमभिरोहति। स्वस्थादेवावमानेऽपि देहिनस्तद्वरं रजः॥

९. भारत के किसानों के तन पर फटे पुराने कपड़े (वासस्) पुकार-पुकार कर कह रहे हैं कि वे लोग दारुण दरिद्रता के शिकार बने हुए हैं।
भारतवर्षकृषकाणां श्रमक्षुण्णेषु कार्येषु जीर्णानि शीर्णानि च वासांस्युचैर्घोषयन्ति, “दारुणदारिद्र्याोपहता अमी” इति।

१०. मन (मनस्-नपुं.) वाणी (वचस्-नपुं.) और शरीर में पवित्र अमृत से भरे हुए ये लोग संसार का भूषण (ललामन्-नपुं.) हैं।
मनसा वाचा वपुषा चामृतपूर्णा इमे जगतो ललामनः सन्ति।

११. यह सारी त्रिलोकी अंधकारमय हो जाए यदि शब्द नाम की ज्योति (ज्योतिस्-नपुं.) संसारभर में न चमके।
इदमन्धन्तमः कृत्स्नं जायेत भुवनत्रयम्। यदि शब्दाह्वयं ज्योतिरासंसारं न दीप्येत।

१२. किसी ने किसी से पूछा इस बच्चे की क्या आयु (आयुस्-नपुं.) है। वह कहता है मैं इसकी आयु नहीं जानता, हां, इसकी अवस्था (वयस्-नपुं.) जानता हूँ।
कश्चित्कञ्चित्पृच्छति किमस्य शिशोरायुरिति। स आह नाहमायुर्वेद, वयस्तु वेद्मि।

१३. इस लड़के ने कोई अपराध नहीं किया। इसे आपने क्यों दण्ड दिया ? अपराध (आगस्-नपुं.) तो इन्होंने किया था। इनको आपने दण्ड नहीं दिया।
अयमनागाः किमित्येनं निगृहीतवानसि। एते ह्यागः कृतवन्तः नैनान् दण्डितवानसि।

१४. हे प्रभो ! मैंने बहुत उग्र पाप (एनस्-नपुं.) किए हैं, अब ऐसी कृपा कीजिए कि निष्पाप हो जाऊँ।
हे प्रभो ! उग्रैनांसि कृतवानस्मि। इदानीमनेना यथा स्यां तथा दयस्व।

संकेतः-
१. उषस्येव ब्रह्मचारी ग्रामान्निष्क्रामेत्। ग्रामेऽन्तर्नेममभ्युदियात्सूर्यः। अन्यथा प्रायश्चित्तीयः स्यात्।
३. शोभा = अभिख्या। अनोखी शोभा = काप्यभिख्या। तरंगे = तरंग, भंग-पुं., ऊर्मि-पुं., वीचि-स्त्री.।
५. बड़े भाई = अग्रज। विवाह = विवाह, उद्वाह, परिणय, उपयाम।
९. भारतवर्षकृषकाणां श्रमक्षुण्णेषु कार्येषु जीर्णानि शीर्णानि च वासांस्युचैर्घोषयन्ति, “दारुणदारिद्र्याोपहता अमी” इति।
१२. कश्चित्कञ्चित्पृच्छति किमस्य शिशोरायुरिति। स आह नाहमायुर्वेद, वयस्तु वेद्मि।
१३. अयमनागाः किमित्येनं निगृहीतवानसि। एते ह्यागः कृतवन्तः नैनान् दण्डितवानसि। (नैनानशाः) शास्-लङ् मध्यम पुरुष एकवचन

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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