अनुवाद कला (प्रथम अंश) अभ्यास 26

(अन्, इन्, मन्, वन् प्रत्ययान्त)

१. सरलता से जीविका कमानी चाहिए, लालच से आत्मा को गिराना नहीं चाहिए। यही अच्छा मार्ग (पथिन्) है, इसके विपरीत कुमार्ग है।
आर्जवेनाजीवः सम्पादनीयः गर्धेन तु नात्मा पातनीयः। अयमेव सुपन्थाः, इतो विपरीतस्त्वपन्थाः।

२. प्रजाओं को प्रसन्न करने से भूपाल को आर्य लोग राजा (राजन्) कहते थे। राजा अपने आप को प्रजाओं का सेवक मानता था और उपज का छठा अंश लेकर निर्वाह करता था।
प्रजाप्रसादाद् ‘भूपालः’ आर्येषु राजेति प्रसिद्धः आसीत्। प्रजासेवकंमन्योऽयं राजा सस्यफलस्य षष्ठांशभुगासीत्।

३. राजाओं का प्रिय कौन है और अप्रिय कौन। ये लोग अपने प्रयोजन को देखते हैं और हृदय से किसी का आदर नहीं करते।
को वा राज्ञां प्रियः कश्चाप्रियः ? स्वार्थपरायणा इमे भवन्ति, न कञ्चित् हृदयेन सत्कुर्वन्ति।

४. प्रेम (प्रेमन् पुं., नपुं.) बिना कारण और अनिर्वाच्य होता है ऐसा शास्त्रकार कहते हैं। उनका कहना है कि स्नेह हो और निमित्त की अपेक्षा रखता हो यह परस्पर विरुद्ध है।
अप्रतिसंख्येयमनिबन्धनं प्रेमाणमामनन्ति शास्त्रकाराः। स्नेहश्च निमित्तसव्यपेक्ष इति विप्रतिषिद्धम्।

५. मैं श्वेत कमलों की इस माला (दामन्-नपुं.) को पसन्द करता हूँ। नील कमलों की इस माला (माल्य-नपुं.) को नहीं।
इदं पौण्डरीकं दाम मे प्रियं, न त्विदं पौष्करकं माल्यम्।

६. अच्छे बुरे में भेद करनेवाले विद्वान् (सत्) कृपया इसे चुने। क्योंकि सोने (हेमन् नपुं.) का खरापन या खोटापन अग्नि में ही दीख पड़ता है।
तं सन्तः श्रोतुमर्हन्ति सदसद्व्यक्तिहेतवः। हेम्नः संलक्ष्यते ह्यग्नौ विशुद्धिः श्यामिकाऽपि वा।

७. यह ब्रह्मचारी (वर्णिन्) तेज (धामन्-नपुं.) में सूर्य (सहस्रधामन्-पुं.) के समान है गम्भीरता में समुद्र की तरह है और स्थिरता में हिमालय की तरह है।
अयं वर्णी तेजसि सहस्रधामवत् गाम्भीर्ये सागरवत्, धैर्ये च हिमाद्रिवदस्ति।

८. ब्रह्म उसे परे हटा देता है जो आत्मा से पृथक् ब्रह्म को जानता है।
ब्रह्म तं निराकरेद्योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद।
९. ज्ञान की अग्नि से पाप (पाप्मन्-पुं.) ऐसे जल जाते हैं जैसे इषीका का तूल।
ज्ञानाग्निर्दहति पाप्मा यथेषिकतूलम्।

१०. इस चारपाई की दौन (दामन्-नपुं.) ढीली हो गई है। इस पर आराम से सोया नहीं जाता।
शिथिलं जातमस्याः खट्वाया दाम, ततः सुखं शयितुं न लभ्यते।

११. यह लम्बा रास्ता (अध्वन्-पुं.) है। इसे हम कई दिन पड़ाव करते हुए चलकर तय कर सकेंगे।
दीर्घोऽयमध्वा। एनमनेकैरपि प्रयाणकैरतिक्रमिष्यामः।

१२. ब्राह्मण और क्षत्रिय जातियों (ब्रह्मन्-नपुं., क्षत्र-नपुं.) में यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाए तो कुछ भी विरोध नहीं, प्रत्युत् यह एक दूसरे की उपकारक ही नहीं, अलंकार भी हैं।
सूक्ष्मेक्षिकयालोच्यमाने ब्रह्मणः क्षत्रस्य च न विरोधः कश्चिद्भाव्यते। अपि त्वन्योन्यस्योपकार्योपकारकभावो भूषणभूष्यभावश्च प्रतीयते।

१३. बिना क्षत्रिय जाति के ब्राह्मण जाति फलती फूलती नहीं। क्षत्रिय आततायियों के वध के लिए सदा सशस्त्र रहते हैं।
नाक्षत्रं ब्रह्म वर्धते। आततायिवधे सततमुदायुधा राजन्याः।

१४. भारत से योरूप जाने के पहले दो मार्ग (वर्त्मन्-नपुं.) थे- स्थलमार्ग और जलमार्ग। अब तीसरा आकाशमार्ग भी है।
भारताद् योरुपगमनाय पुरासीद् वर्त्मद्वयम्- स्थलपथो जलपथश्च, अधुना तृतीयो व्योमपथोऽपि विद्यते।

१५. कोई परिहास (नर्मन्-नपुं.) में प्रसन्न होते हैं, कोई वक्रोक्ति में, कोई लक्ष्यार्थ में और कोई सीधे वाच्यार्थ में ही रस लेते हैं। यह स्वभाव-भेद के कारण है।
केचन नर्मणा प्रसीदन्ति, केचिद् वक्रोक्तौ कतिपया लक्षणायामन्ये च साक्षादभिधायामेव रसिका भवन्ति। इदं प्रकृतिभेदनिबन्धनम्।

१६. अभिमानरूपी जलन से होनेवाले ज्वर की गरमी (ऊष्मन्-पुं.) ठंडी चीजों के लगाने से दूर नहीं की जा सकती।
अशीतलोपचारहार्यो दर्पदाहज्वरोष्मा।

संकेतः-
१. आर्जवेनाजीवः सम्पादनीयः गर्धेन तु नात्मा पातनीयः। अयमेव सुपन्थाः, इतो विपरीतस्त्वपन्थाः। यहाँ पूजनात् (५/१/६९) से समासान्त का निषेध हुआ है। अपन्थाः के स्थान में अपथम् भी कह सकते हैं।
२. उपज का छठा अंश = सस्यफलस्य षष्ठांशभुक्।
४. शास्त्रकार = तन्त्रकार-पुं.।
५. कमलों की इस माला = पौण्डरीकं दाम।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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