अनुवाद कला (प्रथम अंश) अभ्यास 25

(इन्, विन्, मतुप्, क्तवतु-प्रत्ययान्त)

१. चाँद के साथ ही चाँदनी चली जाती है और मेघ के साथ ही बिजली (तडित्-स्त्री.)।
शशिना सह याति कौमुदी, सह मेघेन तडित् प्रलीयते।

२. यद्यपि पानी के बिना भी जीना मुश्किल है, अतएव उसे ‘जीवन’ या ‘जीवनीय’ कहते हैं, तो भी वायु से ही प्राणी प्राणवाले (प्राणवत्) हैं।
अन्तरेण जलं, दुष्करं जीवनमतस्तज्जीवनं जीवनीयं वेति वदन्ति यद्यपि तथापि प्राणेनैव प्राणिनः प्राणवन्तस्सन्ति।

३. सात पैर साथ चलने से ही सत्पुरुषों के साथ मैत्री हो जाती है ऐसा बुद्धिमानों (मनीषिन्) का कथन है।
सङ्गतं मनीषिभिः साप्तपदीनमुच्यते।

४. जिस प्रकार सुन्दर पक्षों से पक्षी (पतत्रिन्) सुन्दर होते हैं उसी प्रकार सुन्दर वेष से ही मनुष्य सुन्दर नहीं बनते।
यथा पतत्रिणः सुरूपपक्षैः सुजाता भवन्ति न तथा मनुष्या मञ्जुवेषेण मनोज्ञा भवन्ति।

५. महात्मा गान्धी ने संसार (जगत्) की नीति का रूप बदल दिया। उनका यह उपदेश था कि छली लोगों के साथ भी छल का व्यवहार नहीं करना चाहिए।
महानुभावः श्रीगान्धी जगति वर्तमानं नयं पर्यवर्तयत्। स इत्थम् अन्वशात्-मायिष्वपि न मायया वर्तनीयम्।

६. यह बेचारा (तपस्विन्) ब्राह्मणकुमार अभी दो वर्षों का ही था कि इसके माता-पिता स्वर्ग सिधार गए। आप इसकी सहायता करें।
द्विवर्षस्यास्य तपस्विनो ब्राह्मणकुमारस्य पितरौ दिष्टान्तामाप्तौ, अभ्युपपत्तिरस्य भवता कार्या।

७. जिसके पैर फटे न बिवाई वह क्या जाने पीरपराई।
दुःखमननुभूतवतो जनस्य परदुःखमविदितम्।

८. अर्जुन (किरीटिन्) धनुर्धारियों (धन्विन्, धनुष्मत्) में उत्तम था, शक्ति चलानेवालों में नकुल बढ़िया था।
किरीटी बभूवोत्तमो धनुष्मताम्, नकुलश्च शाक्तीकानाम्।

९. उत्तम रूप और शरीरवाला, बुद्धिमान् (मेधाविन्) यह नौजवान् (वयस्विन्) देखनेवालों के चित्त को ऐसे खींचता है जैसे चुम्बक लोहे को।
सिंहसिंहननो मेधावी चायं वयस्वी द्रष्टॄणां चित्तमयस्कान्तो लोहमिव हरति।

१०. माला पहने हुए (स्रग्विन्) रेशमी वस्त्र धारण किए हुए (दुकूलवासिन्) बिस्तर पर बैठे हुए अपने आप को पण्डित माननेवाले (पण्डितमानिन्) ये कौन हैं। ये सन्त जी हैं जो प्रायः स्त्रियों को धर्मोपदेश करते हैं।
के सन्तीमे स्रग्विणो दुकूलनिवासिनस्तल्प आसीनाः पण्डितमानिनश्च? सज्जना इमे सन्ति, प्रायो ये नारिर्धर्ममुपदिशन्ति।

संकेतः-
४. सुन्दर, सुजात, सुरूप, अभिरूप, मनोज्ञ, पेशल- वि.। वेष, आकल्प-पुं.। नेपथ्य-नपुं.।
५. महानुभावः श्रीगान्धी जगति वर्तमानं नयं पर्यवर्तयत्। स इत्थम् अन्वशात्-मायिष्वपि न मायया वर्तनीयम्।
६. द्विवर्ष, द्विहायन-वि.। (माता-पिता स्वर्ग सिधार गए) पितरौ निधनं गतौ, दिष्टान्तमाप्तौ, कालधर्मं गतौ, देवभूयं गतौ, स्वर्यातौ। (आप इसकी सहायता करें) अभ्युपपत्तिरस्य कार्या।
८. (शक्ति चलानेवालों में) शाक्तिक।
९. (बिस्तर पर बैठे) तल्प आसीनाः।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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