अनुवाद कला (प्रथम अंश) अभ्यास 24

(तवर्गान्त, चवर्गान्त, हलन्त शब्द)

१. हमारे इतिहास में ऐसी वीर स्त्रियाँ (योषित्) हो चुकी हैं जिन्हें आज भी दुनिया याद करती है।
अस्मदीये इतिहास एवं विक्रान्ता योषित उपवर्णिता या अद्यापि स्मरति लोकः।

२. हिमालय (हिमवत्) जो पृथ्वी पर सबसे ऊँचा पहाड़ (सानुमत्, भूभृत्) है, जिसकी चोटियों पर नित्य ही धूप रहती है- इस देश (नीवृत् पुं.) के उत्तर में विराजमान है।
हिमवान् अस्ति प्रोतुङ्गो भूभृद् अस्यां भुवि, शृङ्गेष्वस्य द्युमालोको नित्यं भवति, अस्य नीवृत उदीच्यामयं विराजमानोऽस्ति।

३. नदियों (सरित्-स्त्री.) का जल बरसात में मलिन हो जाता है, पर मानस का नहीं और शरद् ऋतु में निर्मल हो जाता है।
वर्षासु सरितां सलिलमाविलं भवन्त्यनत्र मानसात्। शरदि तु प्रसीदति।

४. हिरनों के बच्चे इन शिलाओं (दृषद्-स्त्री.) पर इसलिए बैठते हैं कि यहाँ सीता अपने हाथों से इन्हें नया-नया घास दिया करती थी।
दृषत्स्वेतासु पृषच्छावकास्ततो निषीदन्ति, यतोऽत्र सीता निजकराभ्यांमेभ्यः शष्पं वितरति स्म।

५. उसका जिगर (यकृत्-नपुं.) बिगड़ा हुआ है, अतः उसे ज्वर रहता है और कफ का भी प्रकोप है।
विकृतिमत्तस्य यकृत्। अतः स ज्वरति, प्रकुप्यति चास्य कफः।

६. भद्रे प्राणियों (प्राणभृत्) की ऐसी ही लोकयात्रा है, तेरा भाई जिसने स्वामी के ऋण को अपने प्राणों से चुका दिया शोक के योग्य नहीं।
भद्रे ! ईदृशी प्राणभृतां लोकयात्रा। न शोच्यस्ते सोदर्योऽसुभिर्भर्तुरानृण्यं गतः।

७. मोर अपने पंखों और कलगी से कितना सुन्दर है। पर इसके पैर कितने भद्दे हैं। जहाँ फूल है वहाँ काँटा भी है।
अहो शोभते कलापी शिखाकलापैः, कदाकारौ त्वस्य पादौ, न हि कुसुमं कंटकं व्यभिचरति।

८. प्रजाओं के कल्याण के लिए ही वह उनसे कर लेता था, क्योंकि सत्पुरुष देने के लिए ही लेते हैं, जैसे बादल।
प्रजानामेव भृत्यर्थं स ताभ्यो बलिमग्रहीत्। सहस्रगुणमुत्स्रष्टुम् आदत्ते रसं रविः।

९. युद्ध (युध् स्त्री.) के परिणाम भयंकर हैं ऐसा जानते हुए भी समस्त संसार युद्ध की तैयारी में लगा हुआ है।
युधो भीषणपरिणतिं संजानानोऽपि प्रायः समस्त संसारो युद्धाय सज्जते।

१०. जो नित्य जप करते हैं और अग्निहोत्र करते हैं वे पतित नहीं होते हैं।
जपतां जुह्वतां चैव विनिपातो न विद्यते।

११. इस संकरे मार्ग पर चलती हुई गाड़ियाँ टकरा जाती हैं अतः पगडंडी के साथ-साथ चलो।
संकटेनानेन संचरेण यान्ति यानानि संघट्टन्ते। तस्माद्वर्तनिमनुवर्तस्व।

१२. आकाश में उड़ते हुए पक्षियों (पतत्) की गति भी जानी जा सकती है पर रक्षाधिकृत राजभृत्यों की नहीं।
अपि शक्या गतिर्ज्ञातुं पततां खे पतत्रिणाम्। न तु रक्षाधिकृतां राजभृत्यानाम्।

१३. गौ जब बछड़े को दूध पिला रही हो तो उसे हटाए नहीं।
न वारयेद् गां धयन्तीम्।

१४. जब मैं परमात्मा का ध्यान कर रहा हूँ तो विघ्न मत करो।
मयि परमेशं ध्यायति मा भूर्विघ्नकरः।

१५. जीविका की तलाश करते-करते (अन्विष्यत्, अन्वेषयत्) लोगों का सारा जीवन लग जाता है, चतुर्वर्ग की सिद्धि अछूती रह जाती है।
जीविकाम् अन्वेषमन्वेषं मनुष्यैः सर्वं जीवनं याप्यते, चतुर्वर्गसिद्धिस्तु स्पर्शहीनैवावतिष्ठते।

१६. जो चलता है उसे प्रमादवश ठोकर लग ही जाती है। दुर्जन उस समय हँसते हैं और सज्जन समाधान कर देते हैं।
सज्जनः स्खलनं क्वापि भवत्येव प्रमादतः। हसन्ति दुर्जनास्तत्र, समादधति सज्जनाः॥

१७. मैं देखता हूँ कि एक महान् संकट आ रहा है। इसलिए तुम सजग हो जाओ।
महान्तमनर्थमुपनमन्तमुत्प्रेक्षे। तेन प्रतिजागृहि।

१८. गाली देते हुए (आक्रुशत्) को भी गाली मत दो। अपकार करते हुए (अपकुर्वत्) का भी उपकार करो। यह सज्जन का मार्ग है।
आक्रुशन्तं नाक्रुशेदपकुर्वाणं नोपकुर्वीतेतीयमस्ति सज्जनसरणिः।

१९. हमारे पूर्वज (प्राञ्च) हमसे कुछ कम सभ्य न थे, कई अंशों में तो हमसे सभ्यता में बढ़े हुए थे।
अस्मदीयप्राञ्चोऽस्मत् सभ्यकल्पा नासन्, कतिपयांशेषु तु तेऽस्मदपि सभ्यतरा आसन्।

२०. नगर का पश्चिम (प्रत्यञ्च) द्वार बन्द है तुम पूर्व (प्राञ्च) द्वार से प्रवेश कर सकते हो।
पुर्याः प्रत्यग् गोपुरं पिहितमिति प्राग्गोपुरेण शक्यस्ते प्रवेशः।

२१. निचली भूमि (अवाञ्च प्रदेश) में पानी खड़ा रहता है और वहाँ मलेरिया ज्वर बड़े जोर से होता है।
अर्वाक्प्रदेशेऽप्रवहदवतिष्ठते वारि, शीतकज्वरश्च तत्र बलवज्ज्वरयति।

२२. सीता के निर्वासन में वन में पशुओं ने दुःख मनाया। देखो हिरनियों ने आधे चबाए हुए दाभ के ग्रासों को मुख से गिरा दिया है और मानों आंसू बहा रही हैं।
सीतानिर्वासने वनसत्त्वा अपि समदुःखाः। तथाहि निर्गलितार्धावलीढदर्भकवला मृगा अश्रूणि विमुञ्चन्तीव।

२३. मूर्ख लोग बाहिर के काम्य पदार्थों के पीछे जाते हैं।
प्रेयो हि मन्दो वृणीते।

२४. इस समय पौ फटने को है। मोतियों की छबि वाले तारों से मण्डित आकाश (वियत्-नपुं.) धीरे धीरे निष्प्रभ हो रहा है।
प्रभातकल्पा शर्वरी। मौक्तिकसच्छायैरुडुभिर्मण्डितं वियच्छनैः शनैर्हतप्रभं भवति।

संकेतः-
१. अस्मदीये इतिहास एवं विक्रान्ता योषित उपवर्णिता (कीर्तिताः) या अद्यापि स्मरति लोकः।
३. वर्षासु सरितां सलिलमाविलं भवन्त्यनत्र मानसात्। शरदि तु प्रसीदति।
४. नया घास = शष्प-नपुं.
५. विकृतिमत्तस्य यकृत्। अतः स ज्वरति, प्रकुप्यति चास्य कफः।
७. मोर = मयुर, बर्हिण, भुजङ्ग, भुजग-पु. पंखों = पिच्छ, बर्ह-नपुं.। कलाप। कलगी = शिखा। न हि कुसुमं कंटकं व्यभिचरति।
९. “युद्ध की तैयारी में लगा है” = युद्धाय सज्जते।
११. संकटेनानेन संचरेण यान्ति (संचरमाणानि) यानानि संघट्टन्ते। तस्माद्वर्तनिमनुवर्तस्व (पदवीयमनुयाहि, एकपदीमनुसर)।
१७. महान्तमनर्थमुपनमन्तमुत्प्रेक्षे। तेन प्रतिजागृहि।
२०. द्वार = गोपुर। बन्द = संवृत, पिहित।
२१. मलेरिया = शीतको ज्वरः।
२२. सीतानिर्वासने वनसत्त्वा अपि समदुःखाः (दुःखसब्रह्मचारिणः)। तथाहि निर्गलितार्धावलीढदर्भकवला मृगा अश्रूणि विमुञ्चन्तीव (विहरन्तीव)।
२४. प्रभातकल्पा शर्वरी। मौक्तिकसच्छायैरुडुभिर्मण्डितं वियच्छनैः शनैर्हतप्रभं भवति। उडु (तारा) स्त्री. और नपुं.। वियत् आकाश नित्य नपुं. है।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *