अनुवाद कला (प्रथम अंश) अभ्यास 23

(संकीर्ण स्वरान्त शब्द)

१. लक्ष्मी (श्री स्त्री.) को चाहनेवाला उसे प्राप्त करे या न करे, पर लक्ष्मी जिसे चाहे वह उसके लिए कैसे दुर्लभ हो।
लभेत वा प्रार्थयिता न वा श्रियं, श्रिया दुरापः कथमीप्सितो भवेत्।

२. स्त्रियों (स्त्री) का स्वभाव चिड़चिड़ा होता है। इनसे सदा मधुर व्यवहार करें।
स्त्रियो भवन्ति सुलभकोपाः। सदेमाः सौम्यमाचरणीयाः।

३. विरक्त तपस्वी (तापस) अपनी पवित्र बुद्धि (धी) से भविष्यत् का दर्शन करते हैं।
विरक्तास्तापसाः स्वविमलधियायतिं साक्षात्कुर्वन्ति।

४. यह हमारे लिए लज्जा (ह्री-स्त्री.) की बात है कि हम हिन्दू होते हुए संस्कृत न पढ़ें।
इदं हि नो ह्रियः पदम्। आर्या सन्नपि न वयं संस्कृताध्येतारः।

५. विद्या भवसागर तरने के लिए नौका (तरी-स्त्री) है और सब साधन इससे उतर कर हैं।
भवाब्धि तरणाय तरिर्वर्तते विद्या। अन्योपायास्तु ततो हीनाः।

६. वीणा (वल्लकी-स्त्री) सब वाद्यो में मुख्य है। इसकी मधुरता (माधुरी-स्त्री) सुर-असुर सभी को एक समान वश में कर लेती है।
वल्लकी वाद्यानामुत्तमा मता। अस्या माधुरी सुरासुराणां समं संवननम्।

७. लक्ष्मी के प्रति लोगों की ऐसी आसक्ति है कि इसकी चाह मिटती ही नहीं।
लक्ष्म्यां तथाऽसक्ता नरा यद् अविनाश्यस्या अभिलाषः।

८. भीष्म कौरवों के सेनापति (सेनानी) थे और भीम पाण्डवों के।
भीष्मो बभूव कुरूणां सेनानीः, भीमश्च पाण्डवानाम्।

९. यह विश्व ब्रह्मा (स्वयम्भू) की सृष्टि है, जिसके विधि, विधाता आदि अनेक नाम हैं।
विश्वमिदं वर्तते स्वयम्भुवः सर्गः, विधिर्विधातेत्येवमाह्वा यस्य।

१०. दूसरे लोगों के गुणों को पहचाननेवाले (विज्ञातृ) बुद्धिमान् (सुधी) होते हैं और द्वेष करनेवाले (द्वेष्टृ) मूर्ख (जडधी)।
परगुणविज्ञातार उच्यन्ते सुधियः, द्वेष्टारश्च जडधियः।

११. भंगी (खलपू) का काम समाज के लिए उतना ही उपयोगी और सम्मानित होता है जितना कि वेदपाठी (श्रोत्रिय) का।
खलप्वो वृत्तिः श्रोत्रियवत् समाजहितसाधिका समादृता च भवति।

१२. कृपा करो हे विधाता, हमारे पाप क्षमा करो। हमारे हृदय पश्चाताप से दग्ध हैं।
हे विधातोऽनुगृहाण ! क्षमस्वास्मत्किल्बिषाणि, हृदयानि नोऽनुशयसन्तप्तानि।

१३. मैं माता (मातृ) को बार-बार नमस्कार करता हँू, जिसने आप भूखी नंगी रहकर मुझे पाला पोसा और मेरे सुख के लिए अगणित कष्ट उठाए।
वावन्द्येऽहं मातरम्। यया क्षुधार्तानावृतयाऽपि कृतं मे भरणपोषणं, सौख्याय च मे सोढान्यसंख्यकष्टानि।

१४. गौ (गो-स्त्री) का दूध बच्चों के लिए अत्यन्त हितकारक होता है। यह हल्का और बुद्धिवर्धक होता है।
गोः पयो ह्यतिहितकरं शिशुभ्यः। सुपचमिदं बुद्धिवर्धकं च।

१५. गौड लोग दही (दधि) के साथ भात खाते हैं। पंजाब में तो दूध चावल अथवा दही चावल बीमार ही खाते हैं।
गौडा दध्नोपसिक्तमोदनं भुञ्जते, पञ्चनदीयास्तु रुजार्ता एव।

१६. रुद्र की तीसरी आँख (अक्षि-नपुं) से निकली हुई अग्नि (कृशानु-पुं.) से क्षणभर में कामदेव राख का ढेर (राशि-पुं.) हो गया।
रुद्रस्य तृतीयाऽक्ष्णो निःसृतेन कृशानुना निमिषाभ्यन्तरमेव भस्मनो राशिर्भूतः कामदेवः।

१७. मुझे अपनी मौसी (मातृस्वसृ) को देखे हुए देर हो गई है, फूफी (पितृस्वसृ) को तो पिछले ही सप्ताह मिला था।
अद्य चिरं मातृष्वसारं दृष्टवतो मम, पितृष्वसा तु गतसप्ताह एव दृष्टा।

१८. अब हमें बिछुड़ना होगा यह जानकर सीता की आँखें (अक्षि) डबडबा गईं।
उपस्थितो नौ वियोग इति सीताया अक्षिण्युदश्रुण्यभूताम्।

१९. मेरी भाभी (प्रजावती, भ्रातृजाया) की अपनी ननद (ननान्दृ) से नहीं बनती, अपनी देवरानी (यातृ) से तो खूब घुटती है।
मम भ्रातृजाया ननान्द्रा न संजानीते, यातरि तु भृशं प्रीयते।

२०. रक्त पीनेवाली इस भयंकर राक्षसी ने कई यज्ञों का विध्वंस किया और लोंगों को अनेक प्रकार से कष्ट दिया।
अनया रक्तपा भीषणराक्षस्या बहवो यज्ञा ध्वस्तीकृता जनाश्च बहुशः पीडिताः।

२१. पिता पुत्र के कर्मों का उत्तरदायी है ऐसा कोई मानते हैं, नहीं है ऐसा कोई दूसरे कहते हैं।
पिता पुत्रस्य कर्मणां प्रतिभूरिति केचित्, नेत्यपरे।

संकेतः-
२. सुलभकोपाः स्त्रियः।
४. इदं हि नो हियः पदम्।
६. समं वशे करोति (आवर्जयति)। वल्लकी वाद्यानामुत्तमा मता। अस्या माधुरी सुरासुराणां समं संवननम्।
९. समाख्या, अभिधा, आह्वा-स्त्री.।
११. वृत्तिः-स्त्री.।
१२. मर्षय, क्षमस्व। अनुशयसन्तप्तानि हृदयानि नः।
१३. अनावृत-वि.।
१५. गौडादध्नोपसिक्तमोदनं भुञ्जते, पञ्चनदीयास्तु रुजार्ता एव। पयसोपसिक्तं दध्ना वोपसिक्तं भक्तम्।
१७. अद्य चिरं मातृस्वसारं (मातुः स्वसारम्, मातुः ष्वसारम्) दृष्टवतो मम।
१८. उपस्थितो नौ वियोग इति सीताया अक्षिणी उदश्रुणी अभूताम्।
१९. मम भ्रातृजाया ननान्द्रा न संजानीते, यातरि तु भृशं प्रीयते।
२०. रक्तपाः (प्रथमा एकवचन) विच् प्रत्यय।
२१. पिता पुत्रस्य कर्मणां प्रतिभूरिति केचित्, नेत्यपरे। ऐसे वाक्यों में क्रियापदों को छोड़ने में ही शोभा है।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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