अनुवाद कला (प्रथम अंश) अभ्यास 22

(ऊकारान्त स्त्रीलिङ्ग)

१. गद्य पद्य मिश्रित काव्य को चम्पू कहते हैं। संस्कृत में इने गिने ही चम्पू हैं।
गद्यपद्यमयं काव्यं चम्पूरित्यभिधीयते। संस्कृते परिगणिता एव चम्प्वः सन्ति।

२. देश की रक्षा बहुत दर्जे तक उसकी सुरक्षित सेनाओं (चमू) के अधीन है और कुछ नागरिक जनता के भी।
राष्ट्ररक्षा भूम्ना कृतपुङ्खासु चमूष्वायतते काचिन्नागरेष्वपि।

३. यह टूटी फूटी काया (तनू) कब तक निभेगी ? निश्चय ही इसका विनाश आज हुआ वा कल।
भङ्गुरा तनूरियं कियदवस्थास्यते ? अवश्यमद्यश्वीनोऽस्याः पातः।

४. बहु (वधू) सास (श्वश्रू) को बहुत प्यारी है, कारण कि यह सुशील और आज्ञाकारिणी है।
वधूरियमस्ति श्वश्र्वा हृद्या, यतो ह्यसौ सभ्या वश्या च।

५. इस पृथ्वी पर (भू) कुछ भी स्थायी नहीं, जो भी उत्पन्न हुआ है उसका विनाश निश्चित है।
नाक्षयं किञ्चिदप्यस्त्यस्यां भुवि। जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्भवति।

६. जौ का दलिया (यवागू) हलका भोजन है। यह बीमारी से निर्मुक्त हुए पुरुष को जल्दी ही चलने-फिरने के योग्य बना देता है।
यवागूर्वर्तते लघ्वाहारः। ययोल्लाघा भवन्ति चलनविचरणे शक्ताः।

७. वह दाद (दद्रू) से पीड़ित है और इस बेचारे को गीली खुजली (कच्छू) ने भी तंग कर रखा है।
सोऽस्ति पीडितो दद्र्वा। कदर्थितस्चायं तपस्वी कच्छ्वा।

८. जो विधवा दोबारा पति को प्राप्त करती है उसे पुनर्भू कहते हैं।
या विधवा पतिं पुनः प्राप्नोति, तां पुनर्भ्वर्माहुः।

९. जब आप बाजार जाएँ तो मेरे लिए रसीले जामुन (जम्बू) लेते आवें।
यदा भवान् विपणिं गच्छेत् तदा मदर्थं कतिपयानि रसवन्ति जम्बून्याहरेत्।

१०. माता (प्रसू) का अतिस्नेह ही अनिष्ट की शङ्का करता है, बच्चा चाहे कितना ही सुरक्षित क्यों न हो।
प्रस्वा अतिस्नेह एव पापशङ्की, सुत्रातः स्याद् बालो यद्यपि।

११. यह जूती (पादू) ठीक तुम्हारे पाओं के माप की (अनुपदीना, पदायता) है इसे कारिगर ने बनाया है न ?
वर्ततेऽसौ पादूस्तवानुपदीना। कारुणा खल्वियं निर्मिता ?

१२. इस कुप्पे (कुतू) में कितना घी है और इस कुप्पी (कुतुप पु.) में कितना ?
इमां कुतूं कियद् घृतं समाविशति। एषा कुतूः कियद् घृतमनुभवति।

१३. हे लड़की (वासू) तू कौन है ? हिंस्र पशुओं से भरे हुए मानुष संचार से रहित इस वन में तू किस लिए घूमती है ?
वासु ! काऽसि घोर प्रचारे निर्जनसंसारेऽस्मिन् कान्तारे किमर्थं पर्यटसि ?

१४. यह लड़का लुंजा (कुणि) है, इसकी छोटी बहन (अनुजा) लंगड़ी (पङ्गू) और बड़ी बौनी (वामन) है।
अयमस्ति कुणिः, अनुजाऽस्य पङ्गूरस्ति, अग्रजा च वामना।

संकेतः-
१. परिगणित
२. भूम्ना। कृतहस्त, कृतपुङ्ख-वि.। राष्ट्ररक्षा भूम्ना (भूयसा) कृतपुङ्खासु चमूष्वायतते (चमूरन्वायतते)। ‘अधीन’ का संस्कृत में प्रायः स्वतन्त्र प्रयोग नहीं होता, समास के उत्तरपद के रूप में होता है। मेरे अधीन = मदधीन। राजा के अधीन = राजाधीन। इस अर्थ में निर्भर का प्रयोग कभी नहीं होता।
३. भङ्गुर-वि.। अद्यश्वीनोऽस्याः पातः।
६. वश्य, वश्यंवद, आश्रव। उल्लाघ।
७. कदर्थिततपस्वी।
८. तां पुनर्भ्वमाहुः। दृन्-कर्-पुनःपूर्वस्य भुवो यण् वक्तव्यः।
९. यदा भवान् विपणिं गच्छेत् तदा मदर्थं कतिपयानि रसवन्ति जम्बून्याहरेत्। (रसवन्ति कतिपयानि जम्बूनि, कतिपयानि जाम्बानि)
१०. प्रस्वा अतिस्नेह एव पापशङ्की।
१२. इमां कुतूं कियद् घृतं समाविशति। एषा कुतूः कियद् घृतमनुभवति। ह्रत्वा कुतूः कुतुपः = कुप्पी।
१३. वासु ! काऽसि घोर प्रचारे निर्जनसंसारेऽस्मिन् कान्तारे किमर्थं पर्यटसि ?

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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