अनुवाद कला (प्रथम अंश) अभ्यास 19

(उकारान्त पुंल्लिङ्ग)
१. क्या तुमने कभी ईख (इक्षु) का रस पीया है ? नियम से पीया हुआ यह रस शरीर में तेज (दीप्ति) भर देता है।
इक्षुरसमपासीर्वा कदाचित्त्वम् ? रसोऽयं नियमेन पीतो दीप्त्या भरति कायम्।
२. मैं परदेशी (आगन्तु) हूँ। इसलिए मैं जानना चाहता हूँ कि यह बच्चा (शिशु) कौन है ?
अस्म्यहमागन्तुः, अतो जिज्ञासे कोऽयं शिशुः ?
३. आज चाहे वह मुझे न जाने बचपन में हम दोनों धूल (पांसु) में खेलते रहे।
अद्य स मां प्रत्यभिजानातु मा वा, बाल्ये तु पांसुषु सममक्रीडाव।
४. रात का समय है बस्ती दूर है और चारों ओर गीदड़ों (फेरु) की हू हू (फेत्कार) ही सुनाई देती है।
रात्रिरेषा दूरे च वसतिः अभितश्च फेरूणां फेत्कारः श्रूयते।
५. श्रीराम ने समुद्र पर पुल (सेतु) बांधा और सेना पार उतारकर रावण का संहार किया।
श्रीरामचन्द्रैः सागरे सेतुर्निर्मितः, सैन्यं च पारं प्रापय्य दशाननः संहृतः।
६. थोड़े के बदले बहुत देना चाहता हुआ तू मुझे विचारहीन मालूम होता है।
अल्पस्य हेतोर्बहु हातुमिच्छन्विचारमूढः प्रतिभासि मे त्वम्।
७. वसन्त (मधु) में सृष्टि उज्ज्वल वेषवाली नई दुलहिन (वधू) की तरह प्रतीत होती है।
शुभ्रवेषिणी वधूरिव प्रतीयते मधावियं सृष्टिः।
८. श्रीराम ने अश्वमेध यज्ञ (मन्यु, क्रतु) प्रारम्भ किया है और एक वर्ष में लौटने के लिए घोड़ा खुला छोड़ दिया है।
श्रीरामचन्द्रेण क्रतुरश्वमेधः प्रक्रान्तः संवत्सरे च पुनरागमनाय मेध्योऽश्वो निरर्गलो विसृष्टः।
९. (बच्चा) स्नेहरूपी तन्तु है जो हृदय के मर्मों को सी देता है।
(स) हि स्नेहात्मकस्तन्तुरन्तर्मर्माणि सीव्यति।
१०. चाहे कुछ भी हो, जान (असु) बचानी चाहिए। आप मरे जग परलउ।
यद् भवतु तद् भवतु, असवो रक्षणीयाः। स्वयं गते जगज्जालं गतमेव न संशयः।
११. अनार्य लोग घुटने (जानु) टेककर और भूमि पर मस्तक झुकाकर ईश्वर से प्रार्थना करते हैं।
अनार्या जानुन्यन्वाच्य शिरश्च भूमाववनमय्य परेशं प्रार्थयन्ति।
१२. यति पहाड़ों की समतल भूमि (सानु) पर निवास करते हैं और प्रभु की विभूतियों का साक्षात् दर्शन करते हैं।
यतयो हि सानुनि निवसन्ति प्रभोश्च विभूतीः साक्षात्कुर्वन्ति।
१३. यह इतना तीव्र विष है कि इसकी एक ही बिन्दु (बिन्दु) प्राणों को हर लेती है।
तथा तीक्ष्णमस्तीदं गरं, यत् प्राणान् हरति बिन्दुमात्रेणापि
१४. आग में तपाई हुई धातुओं के मल जिस प्रकार नष्ट हो जाते हैं उसी प्रकार प्राणों के निग्रह से इन्द्रियों के दोष दूर हो जाते हैं।
दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां च यथा मलाः।
तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात्॥
१५. देवदत्त स्वयं तो लम्बा (प्रांशु) है, पर उसका भाई नाटा (पृश्नि) है।
देवदत्तोऽस्ति स्वयं प्रांशुः, सोदरस्तु तस्य पृश्निः।
१६. विद्या-विख्यात (विद्याचञ्चु) इस महात्मा का लोक में बड़ा आदर क्यों न हो ?
विद्याचुञ्चोरस्य साधोर्लोके बहुमानः कथं न स्यात् ?
१७. साहू (साधु) लक्ष्मीनारायण अधिक सूद नहीं लेता और असमर्थ ऋणियों के साथ नरमी का व्यवहार करता है।
साधुर्लक्ष्मीनारायणो नातिवृद्धिमादत्ते, अक्षमैश्च ऋणिकैः श्लक्ष्णं व्यवहरति।

संकेतः-
३. अद्य स मां प्रत्यभिजानातु मा वा, बाल्ये तु पांसुषु सममक्रीडाव। प्रांसु का प्रायः बहुवचन में प्रयोग देखा जाता है।
४. रात्रिरेषा, दूरे च वसतिः, अभितश्च फेरूणां फेत्कारः श्रूयते।
८. निरर्गलो विसृष्टः।
१०. यद्भवतु तद्भवतु, असवो रक्षणीयाः। स्वयं गते जगज्जालं गतमेव न संशयः।
११. अन्वाच्य।
१६. विद्याचुञ्चोरस्य साधोर्लोके बहुमानः कथं न स्यात् ? = (विद्यया वित्तः प्रसिद्धः = विद्याचञ्चुः। विद्याचरणः। “तेन वित्तश्चुञ्चुप्चणपौ” अ. ५/२/२६ चुञ्चु तथा चण प्रत्यय हैं)
१७. वृद्धिः।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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