अनुवाद कला (प्रथम अंश) अभ्यास 18

(ईकारान्त स्त्रील्लिङ्ग)
१. आर्य लोग नदियों और तालाबों (सरसी) में नहाना पसन्द करते हैं। बन्द कमरे में नहाने की प्रथा थोड़े समय से चली है।
आर्या नदीषु सरसीषु च स्नानम् अभिरोचयन्ते। कोष्ठकेषु स्नानस्य प्रथा त्वचिरादेवारब्धा।
२. यह वनस्थली कितनी रमणीय है। आँखों को लुभाने के लिए और मन को रिझाने के लिए इससे बढ़कर कौनसी चीज हो सकती है ?
वनस्थलीयमत्यन्तं रमणीया। चक्षूंषि लोभयितुं मनांसि च रञ्जयितुं किमन्यद् उत्कृष्टतरम् ?
३. पाणिनीय पद्धति (पद्धती) सर्वश्रेष्ठ है यह निर्विवाद है। इस शास्त्र पर काशिका नाम की बड़ी (बृहती) टीका है।
विश्वसम्मतमिदं यत् “पाणिनीया पद्धती सर्वासां श्रेष्ठा वर्तते”। एतच्छास्त्रोपरि ‘काशिका’ नाम्नी बृहती टीका विद्यते।
४. यह सीता की सोने की मूर्ति है। इसे राम ने अश्वमेध यज्ञ में अपनी सहधर्मचारिणी बनाया।
इयं हिरण्मयी सीतायाः प्रतिकृतिः। रामेणाश्वमेधे स्वीया सहधर्मचारिणी कृतेयमेव।
५. विस्तीर्ण आकाश में विद्युत् रेखा से घिरी हुई मेघमाला (कादम्बिनी) अपूर्व शोभा को धारण किए हुए है।
गगनाभोगे विद्युद्रेखावलयिता कादम्बिनी कामप्यपूर्वां सुषमां पुष्यति।
६. इस समय राजा सेनाओं (वाहिनी, अनीकिनी) का अधिकाधिक संग्रह कर रहे हैं और इसे ही शान्ति स्थापन का साधन समझते हैं।
साम्प्रतं महीशा अनीकिनीनां भूयिष्ठं संग्रहं कुर्वाणाः सन्ति। तमेव च मन्यन्ते शान्तेरुपायम्।
७. संस्कृत (सुरभारती, सुरगवी, गीर्वाणवाणी) में अनुरक्ति से जहाँ ज्ञान में वृद्धि होती है वहाँ चित्त को शान्ति भी मिलती है।
गीर्वाणवाण्यामनुरक्त्या यथा ज्ञानवृद्धिर्भवति, तथा मनश्शान्तिरपि लभ्यते।
८. गाड़ी (गन्त्री) के एकाएक उलट जाने से सवारियों की हड्डी-पसली टूट गई।
गन्त्र्याः सहसा पर्याभवनेन तदारूढानां कीकसानि पर्शुकाश्च भग्नानि।
९. उदारता से उन्नतमन वालों के लिए पांच हजार क्या चीज है, लाख क्या चीज है, (ंनहीं नहीं) रत्नों से भरी हुई पृथ्वी भी क्या चीज है।
कियती पञ्चसहस्त्री कियती लक्षाऽथ कोटिरपि कियती। औदार्योन्नतमनसां रत्नवती वसुमती कियती।
१०. यह तीक्ष्ण सींगोंवाली, दूध भरे स्तनोंवाली, सुन्दर कानोंवाली गौ (पयस्विनी, अनड्वाही, सौरभेयी) किसकी है ?
कस्येयं तीक्ष्णशृङ्गी घटोघ्नी चारुकर्णी पयस्विनी ?
११. देवता और असुर दोनों (उभयी) ही प्रजापति की प्रजा हैं।
उभय्यः प्रजापतेः प्रजा देवाश्चासुराश्च।

संकेतः-
२. लोभयितुम्। रञ्जयितुम्।
३. सर्वासां श्रेष्ठा (सत्तमा)। यहाँ समास नहीं हो सकता।
४. इयं हिरण्मयी सीतायाः प्रतिकृतिः। यहाँ हिरण्यमयि कहना अशुद्ध होगा।
५. गगनाभोगे विद्युद्रेखावलयिता कादम्बिनी कामप्यपूर्वां सुषमां पुष्यति।
८. गन्त्र्याः सहसा पर्याभवनेन तदारूढानां कीकसानि पर्शुकाश्च भग्नानि।
१०. कस्येयं तीक्ष्णशृङ्गी घटोघ्नी चारुकर्णी पयस्विनी ?
११. उभय्यः प्रजापतेः प्रजा देवाश्चासुराश्च।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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