अनुवाद कला (प्रथम अंश) अभ्यास 17

(इकारान्त स्त्रील्लिङ्ग)

  1. अहो इसकी कैसी शुभ प्रकृति है। नित्य ही सबका मंगल चाहता है।
    अहो कल्याणी प्रकृतिरस्य, सदा समेषां हितमिच्छति।
  2. विद्या से भोग (भुक्ति) और मोक्ष (मुक्ति) दोनों ही मिलती हैं। चित्त की शान्ति और कीर्ति तो साथ में ही आ जाती है।
    विद्या भुक्तिं मुक्तिं च ददाति। चेतोनिर्वृत्तिः कीर्तिश्चानुषङ्गात्।
  3. मैं जब भी तुम्हें देखता हँू तुम इधर-उधर चक्कर काटा करते हो। अपना पेट कैसे पालते हो ?
    सर्वकालमितस्ततः परिक्रामन्तमेव त्वां पश्यामि। वृत्तिं केन कल्पयसि ?
  4. तेरी बुद्धि भूतमात्र के कल्याण (भूति) के लिए हो। तू कभी बुराई का चिन्तन मत कर।
    भूतमात्रस्य भूतये भवतु त्वदीया बुद्धिः। मा तेऽस्तु दुर्मतिः कदापि।
  5. अजी देवदत्त का तो क्या हि कहना, वह तो गुणों की खान (खनि) है।
    किं नु खलु कीर्त्येत देवदत्तस्य। स हि गुणानां खनिः।
  6. सीप (शुक्ति) में चांदी की तरह यह नामरूपात्मिका संसार मिथ्या है।
    शुक्तौ रजतमिवेयं सृष्टिर्मिथ्या वर्तते।
  7. यह औषधी तैया ज्वर में बड़ा प्रभाव रखती है, पुराने ज्वरों में भी इसके लगातार प्रयोग से लाभ होता है।
    तृतीयके ज्वरे सुप्रभावकरी भवतीयमोषधिः। कालिके ज्वरेऽप्यस्या निरन्तरप्रयोगो लाभकरो भवति।
  8. मोर की गर्दन (शिरोधि) पहले ही सुन्दर (रम्य, कमनीय) है, पर केका करने के लिए उठाई हुई अधिक सुन्दर हो जाती है।
    मयूरस्य शिरोधिः प्रकृत्यैव सुन्दरी, केकारवाय तूत्कर्षितेयं सुन्दरितरा भवति।
  9. वानर से डराई वह बच्ची अभी तक होश में नहीं आती। भगवान् भला करे। कभी-कभी अचानक भय (भीति) से भी मृत्यु हो जाती है।
    वानराद् भीतेयं बाला नैतावतापि संज्ञां लभते। ईश्वरोऽस्तु रक्षकः। यदा कदाऽकस्माद् भीत्यापि मृत्युर्भवति।
  10. परीक्षा (परिष्टि) में अपनी सफलता का समाचार (प्रवृत्ति) पाकर उसे अपूर्व सन्तोष (तुष्टि) हुआ।
    परीष्ट्याां स्वीयसाफल्यस्य प्रवृत्तिं ज्ञात्वा तेनाद्भूता तुष्टिः प्राप्ता।
  11. महात्माओं के वचन (व्याहृति) लोक में कभी मिथ्या नहीं होते।
    न हीश्वरव्याहृतयः कदाचित्पुष्णन्ति लोके विपरीतमर्थम्।
  12. बड़ों की भी परम उन्नति का अन्त अवनति है।
    अत्यारूढीर्भवति महतामप्यपभ्रंशनिष्ठा।
  13. वह बन्दर है और यह बन्दरी (कपि) है। यह अपने बच्चों को छाती से लगाए हुए डरी हुई सी भागती जा रही है।
    सोऽस्ति वानर इयं च कपिः। उरसा शावकानाश्लिष्य भीतेवेयं पलायमानास्ति।
  14. आज हमने तीन कोड़ियाँ बरतन कलाई करवाए हैं और नौ रुपए मेहनत (भृति) दी।
    अद्य तिस्रः विंशतयः पात्राणां त्रपुलेपं लम्भिताः। नव रुप्यकाणि च भृतिर्दत्तानि।

संकेतः-

  1. विद्या भुक्तिं मुक्तिं च ददाति। चेतोनिर्वृत्तिः कीर्तिश्चानुषङ्गात्।
  2. सर्वकालमितस्ततः परिक्रामन्तमेव त्वां पश्यामि। वृत्तिं केन कल्पयसि ?
  3. किं नु खलु कीर्त्येत देवदत्तस्य। स हि गुणानां खनिः।
  4. तृतीयको ज्वरः। कालिक-वि.।
  5. सुन्दर का स्त्रीलिङ्ग सुन्दरी होता है, पर अधिक सुन्दर के लिए ‘सुन्दरितरा’ ऐसा स्त्रीलिङ्ग में रूप होगा। घ-रूपकल्प0 (6/3/43) से तरप् तमप् होने पर अनेकाच् ङ्यान्त को ह्रस्व हो जाता है।
  6. अद्य तिस्रः विंशतयः पात्राणां त्रपुलेपं लम्भिताः। नव रुप्यकाणि च भृतिर्दत्तानि (नव रुप्यकाणि च भूतिर्दत्ता)।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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