अनुवाद कला (प्रथम अंश) अभ्यास 16

(इकारान्त पुल्लिङ्ग)

  1. चुप्पी मुनि का लक्षण है। जो जितना अधिक सोचता है उतना थोड़ा बोलता है।
    मौनं मुनेर्लक्षणम्। यो यावानतिविमर्शी स तावानेवाल्पभाषी।
  2. काव्यरूपी अपार संसार में कवि ही प्रजापति है। यह विश्व जैसे उसे भाता है वैसे बदल जाता है।
    अपारे काव्यसंसारे कविरेव प्रजापतिः। यथास्मै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्तते।
  3. दो सिक्ख आपस में छोटी सी बात पर झगड़ पड़े। एक ने दूसरे को गाली दी तो दूसरे ने तलवार (असि) खींचकर उसका हाथ (पाणि) काट दिया।
    द्वौ शिष्यौ कुशं काशं वालम्ब्याकलहायेताम्। एकोऽपरमशपत्। ततोऽपरोऽसिं निष्कृष्य पूर्वस्य पाणिमकृन्तत्।
  4. कहते हैं, पुराकल्प में पहाड़ (गिरी) पक्षियों की तरह पंखवाले थे और उड़ा करते थे। इन्द्र (हरि) ने अपने वज्र (पवि) से इनके पंखों को काट दिया।
    उच्यते यत्पुराकल्पे गिरयः पक्षिण इव पक्षवन्त उत्पतिष्णवश्चासन्। हरिरलुनात्स्वपविना तेषां पक्षान्।
  5. यह बढ़ई (वर्धकि, स्थपति) लकड़ी के सुन्दर खिलौने बनाता है। वे सब हाथों-हाथ बिक जाते हैं।
    अयं स्थपतिः सुजातानि दारुमयानि क्रीडनकानि करोति। यान्यहम्पूर्विकया क्रीणाति लोकः।
  6. कल खेलते-खेलते वह गिर पड़ा और उसकी कुहनी (कफोणि) टूट गई और बेचारा दर्द के मारे रातभर नहीं सोया।
    ह्यः क्रीडन् अयं स्खलितः कफोणिश्चास्य भग्नः। वराकः पीडया बाध्यमानः सर्वरात्रं नास्वपत्।
  7. यह हमने प्रत्यक्ष देख लिया कि कलियुग में शक्ति संघ में है।
    साक्षात्कृतवन्तो वयं यत् “संघे शक्तिः कलौ युगे”।
  8. भौरे (अलि) फूलों पर मंडराते हैं, अनेक प्रकार का रसपान करते हैं और मानो गद्गद् प्रसन्न हो भिनभिनाते हैं।
    कुसुमेषूद्भ्रमन्त्यलयः। नानाविधान् रसान् आस्वादयन्तश्चेमे गुञ्जन्त्यानन्दपुलकिताः।
  9. व्यायाम से थके हुए शरीरवाले, पावों से लताड़े हुए पुरुष के निकट बिमारियाँ नहीं आतीं, जैसे गरुड़ के निकट साप।
    व्यायामक्षुण्णगात्रस्य पद्भ्यामुद्वर्तितस्य च। व्याधयो नोपसर्पन्ति वैनतेयमिवोरगाः।
  10. मैंने अपना काम कर लिया है, अतः मुझे कुछ भी दुःख (आधि) नहीं।
    कृतकार्योऽस्मि। अतो नास्ति मे कश्चिदाधिः।
  11. कायर अपमानसहित सन्धि को अच्छा समझता है, युद्ध को नहीं।
    भीरुकः सनिकारं सन्धिमभिरोचयते न संगरम्।
  12. आप जैसे जिन्होंने अपने शरीर को दूसरे का साधन बना दिया है बहुत थोड़े ही उत्पन्न होते हैं।
    परोपकरणीकृतकायास्त्वादृशा विरला एव जगति जायन्ते; उदरम्भरयस्तु भूरयः।
  13. वसन्त (सुरभि) में सभी कुछ सुहावना बन जाता है, कारण कि वसन्त वर्ष का यौवनकाल है।
    सकलं संजायते सुरभौ सुरम्यम्। सुरभिः खलु यौवनं संवत्सरस्य।
  14. कौनसा रत्न (मणि) सूर्य (द्युमणि) से अधिक चमकीला है। सूर्य तो भगवान का इस श्लोक में प्रतीक है।
    को वा मणिर्द्युमणेर्भास्वरतरः। अर्कस्तु प्रतीकं परमात्मनो लोकेऽस्मिन्।
  15. दैव (विधि) की गति (विलसित, चेष्टित- नपुं.) विचित्र है। आप जैसे शास्त्र जाननेवाले (अन्तर्वाणि) भी दुःख पाते हैं।
    विचित्रं हि विधेर्विलसितम्। भवन्ति हि दुःखभाजो भवादृशोऽन्तर्वाणयोऽपि।
  16. विद्वान् (कवि) का कहना है कि धर्म का मार्ग उस्तरे की तेज धार है जिस पर चलना मुश्किल है।
    क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति।
  17. अञ्जलि से पानी न पीये, ऐसा सूत्रकार कहते हैं। इस प्रकार पानी अधिक पीया जाता है जो स्वास्थ्य को बिगाड़ देता है।
    “नाञ्जलिना पयः पिबेत्”-इति सूत्रकाराः। एवमधिकं पीयते पयो यज्जनयति विकारं शरीरे।
  18. कृष्ण के बाल्यकाल की लीलाएँ (केलि) अत्यन्त रसभरि हैं।
    बाल्यकालिकाः कृष्णकेलयः सन्त्यतिरसिकाः।
  19. मित्र (सखि) से दिए हुए नन्हे उपहार को भी मैं आदर से स्वीकार करता हूँ।
    सख्योपहृतं क्षुद्रमपि प्रतिग्रहं प्रतीच्छामि सादरम्।
  20. यह कोरा कपड़ा (निष्प्रवाणिः पटः) है। धुलने पर यह गाढ़ा हो जाएगा और चिर तक चलेगा।
    निष्प्रवाणिरयं पटः। निर्णिक्ते सति स्थूलो भविता चिरं च स्थाता।

संकेतः-

  1. मौन-नपुं.। तूष्णीम्भाव-पुं.।
  2. द्वौ शिष्यौ कुशं काशं वालम्ब्याकलहायेताम्। एकोऽपरमशपत्। ततोऽपरोऽसिं निष्कृष्य पूर्वस्य पाणिमकृन्तत्। गाली देने अर्थ में शप् का अथवा आ-क्रुश् का ही प्रयोग शिष्ट-संमत है। शप् उभयपदी है।
  3. अयं स्थपतिः सुजातानि दारुमयानि क्रीडनकानि करोति। यान्यहम्पूर्विकया क्रीणाति लोकः। यहाँ प्रतिपदिकान्तनुम्0 सूत्र से वैकल्पिक णत्व होने से दारुमयाणि भी कह सकते हैं।
  4. उदपतन्। उत्पतिष्णव आसन्। अलुनात्।
  5. सर्वरात्रं नास्वपत्, निद्रां नालभत।
  6. कुसुमेषूद्भ्रमन्त्यलयः (कुसुमानि परिसरन्त्यलयः, कुसुमानि परिपतन्त्यलयः)
  7. भीरुकः सनिकारं सन्धिमभिरोचयते न संगरम्।
  8. परोपकरणीकृतकायास्त्वादृशा विरला एव जगति जायन्ते; उदरम्भरयस्तु भूरयः।
  9. भास्वरतर। प्रतीक-पुं.।
  10. आमनन्ति। शरीरे विकारं जनयति।
  11. प्रतीच्छामि।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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