अनुवाद कला (प्रथम अंश) अभ्यास 15

(आकारान्त स्त्रीलिङ्ग)

  1. विद्वत्ता और प्रतिभा से काव्य निर्माण में सामर्थ्य उत्पन्न होता है।
    विद्वत्ता च प्रतिभा च काव्येऽलंकर्मीणतां कुरुतः।

2. असूज और कार्तिक में चाँदनी (चन्द्रप्रभा) बहुत आनन्ददायक होती है, विशेष कर तालाबों और बगीचों में।
आश्वयुजे कार्तिके च भवति चन्द्रप्रभात्यन्तमाह्लादिका, विशेषतस्तु कासारेष्वारामेषु च।

3. बच्चों को खेल प्यारी होती है और यह उनके शरीर के विकास के लिए आवश्यक भी है।
खेला हि बालानां प्रिया भवति। एषा चामीषां कायविकासायाऽपेक्षिता च।

4. लज्जा स्त्रियों (योषा) का भूषण है और प्रौढ़ता पुरुषों का। कहा भी है- लज्जावती (सलज्जा) गणिकाएँ नष्ट हो जाती हैं और निर्लज्ज कुलाङ्नाएँ।
लज्जा खलु भूषा योषाणां प्रौढता च नराणाम्। तथा चोक्तं, नश्यन्ति सलज्जा गणिका निर्लज्जाश्च कुलाङ्गनाः।

5. क्या जल्दी (त्वरा) है अभी गाड़ी (रेलयान नपुं.) चलने में बहुत देर है। घबराइए नहीं।
का त्वरा। चिरात्प्रयास्यति रेलयानम्। मा स्म व्याकुलीभूः।

6. सन्त परमात्मा की सच्ची मूर्ति (प्रतिमा) हैं। इनमें सत्व का प्रकाश बहुत बढ़ा चढ़ा होता है।
सज्जना भवन्ति परमात्मनः परमार्थप्रतिमा। भवति तेषु सत्वस्याभातिशयिता।

7. परीक्षा निकट आ रही है अतः छात्र अध्ययन में ही रातें (निशा, क्षपा, क्षणदा, त्रियामा) बिताते हैं।
यतोऽदूरे परीक्षा, ततोऽध्ययन एव गमयन्ति छात्राः क्षपाः।

8. रमा लक्ष्मी (पद्मा, पद्मालया, हरिप्रिया) का नाम है। इसलिए विष्णु को रमा का ईश होने से रमेश कहते हैं।
रमेति पद्माया आख्या। अतो रमाया ईशः सन् रमेशः इत्युच्यते विष्णुः।

9. जनता का विचार है कि शिल्प और कला की शिक्षा से देश की आर्थिक दशा सुधरेगी।
जनता पश्यति यत् शिल्पस्य कलायाश्च शिक्षया देशस्यार्थिकस्थितिः साधूभविष्यति।

10. बुद्धि (प्रज्ञा) और स्मरणशक्ति (मेधा) दोनों ही मनुष्य की सफलता (कृतार्थता, सिद्धार्थता) में सहायक हैं।
प्रज्ञा मेधा चोभे इमे पुरुषस्य कृतार्थतायां सहाय्यकरे भवतः।

11. पृथ्वी (धरा) हम सबको धारण करती है, इसलिए इसे ‘विश्वम्भरा’ कहते हैं।
यतोऽस्मान् विश्वान् भरति धरा, तत इयमुच्यते विश्वम्भरा।

12. दुर्जनों के फंदे में आया हुआ कौन बचकर निकला ?
को वा दुर्जनवागुरासु पतितः क्षेमेण यातः पुमान् ?

13. क्षुद्र लोग जब थोड़े में ही सफलता को प्राप्त कर लेते हैं तो उनमें अपने लिए गौरव का भाव (आहोपुरुषिका) उत्पन्न हो जाता है।
स्तोकेनैवाप्यते यदा क्षुद्रैः सफलता, उत्पद्यते तदा तेष्वाहोपुरुषिका।

14. आज पवित्र दिन है, आज देवदत्त की पुत्री (सुता, आत्मजा, तनूजा) का विवाह होगा। बारात (जन्या) की प्रतिक्षा हो रही है।
पुण्याहमिदं वर्तते। देवदत्तात्मजा परिणेष्यतेऽद्य। जन्या चात्र प्रतीक्ष्यते।

15. हरिमित्र अपने देश में ही काते और बुने हुए गाढ़े और सादे वस्त्र को पहनता है अतः बन्धुओं (बन्धुता) में इसका बहुत मान है।
हरिमित्रः स्वदेशे कृत्तोतं स्थूलमनुल्बणं च वसनं वस्ते, महच्च मान्यते बन्धुतया।

संकेत:-

  1. विद्वत्ता च प्रतिभा च काव्येऽलंकर्मीणतां कुरुतः।
  2. खेला हि बालानां प्रिय भवति। एषा चामीषां कायविकासायाऽपेक्षिता च। यहाँ ‘आवश्यक’ का प्रयोग ठीक नहीं होगा। आवश्यक = जो अवश्य होना है, अपरिहार्य है।
  3. का त्वरा। चिरात्प्रयास्यति रेलयानम्। मा स्म व्याकुलीभूः।
  4. परमार्थप्रतिमा।
  5. अदूरे परीक्षा। नयन्ति, गमयन्ति, यापयन्ति, क्षपयन्ति। बन्धूनां समूहो बन्धुता बन्धुवर्गः। यहाँ समूह अर्थ में तल् प्रत्यय हुआ।
  6. साधूभविष्यति।
  7. पुण्याह।
  8. हरिमित्रः स्वदेशे कृत्तोतं स्थूलमनुल्बणं च वसनं वस्ते, महच्च मान्यते बन्धुतया।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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