अनुवाद कला (प्रथम अंश) अभ्यास 14

(अकारान्त नपुं. शब्द)

१. कणाद-शास्त्र तथा पाणिनि व्याकरण सब शास्त्रों के लिये उपयोगी हैं।
काणादं पाणिनीयं च सर्वशास्त्रोपकारकम्।

२. मनुप्रणीत मार्ग से घर के धन्धे को चलाती हुई पत्नी (कलत्र) घर को स्वर्ग बना सकती है।
मनुप्रणीतेन पथा गृहतन्त्रं वहत् कलत्रं गृहं स्वर्गीकर्तुमलम्।

३. बहुत थोड़े कालेज वास्तव में विद्या-मन्दिर अथवा सरस्वती-सदन कहे जा सकते हैं, क्योंकि इनमें ज्यों त्यों परीक्षा पास कराना लक्ष्य है।
स्वल्पान्येव महाविद्यालयानि वस्तुतो विद्यामंदिरं, सरस्वतीसदनम् इत्येवमाख्यातुमर्हाणि, यतो हि यथा तथा परीक्षोत्तारणमेवैषां लक्ष्यम्।

४. महाराज! इसी ने पहले मेरी निन्दा की यह कहते हुए कि आप में और मुझ में जौहड़ और समुद्र का सा भेद है।
देव, अयमेव मे प्रथमं परिवादकरः, अत्र भवतो मम च समुद्रपल्वलयोरिवान्तरमिति।

५. किसान दाँतियाँ लेकर खेती काटने के लिये खेत को जा रहे हैं।
सस्यलावाः कृषीवला दात्राणि सहादाय क्षेत्रं यान्ति।

६. तुम सर्वथा निर्दोष चित्र (आलेख्य) बनाते हो? यह तुम्हें किसने सिखाया?
त्वं सर्वथा निर्दुष्टमालेख्यमालिखसि। अत्र केनाभिविनीतोऽसि।

७. इस कुएँ (उदपान) का जल (पानीय, सलिल, उदक) स्वादु (सरस) है। जी चाहता है पीते ही जायें।
सुरसमस्योदपानस्योदकम्, पातुमिच्छाम्यनवरतम्।

८. उनका सबका बर्ताव (वृत्त) घटिया (जघन्य) है। उसमें मिठास (दाक्षिण्य) कुछ भी नहीं, गँवारपन (ग्राम्यत्व) अक्खड़पन (औद्धत्य) ज्यादा है।
जघन्यं तेषां वृत्तम्। न तस्मिन् किञ्चिदपि दाक्षिण्यमस्ति, ग्राम्यत्वौद्धत्ययोस्तु बाहुल्यम्।

९. तुम्हें अपनी जिह्वा पर कुछ भी वश नहीं। हर समय अनापशनाप (असमञ्जस) बकते रहते हो। इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा।
अनियन्त्रितं ते तुण्डम्। सर्वकालमसमञ्जसं वक्षि। नानेनेष्टं परिणामं यास्यसि।

१०. मैं उनका कुशल (सुख) पूछने जा रहा हूँ। कई दिन से उनके दर्शन नहीं हुए, अतः चित्त (चित्त, स्वान्त, मानस) अशान्त है।
तान्सुखं प्रष्टुं यामि। दिनपूगस्तेषां दृष्टानाम्। अतोऽशान्तं मे स्वान्तम्।

११. वह पिता की मृत्यु (मरण, निधन ) सुनकर बड़ा दुःखी हुआ। कुछ समय तक बेहोश रहा, फिर शीतलोपचार से धीरे धीरे होश में आया।
पितरमुपरतं श्रुत्वास्य दुःखाधिक्यं जातम्। मुहूर्त्तमस्य लुप्तासीत्संज्ञा, पुनस्तु शीतलोपचारेण मन्दं-मन्दं प्रत्यागता।

१२. इन दोनों की आकृति (संस्थान) ऐसी मिलती है मानो ये दोनों सगे भाई हैं।
संस्थानेऽनयोस्तथा संवदतः, यथेमौ सोदर्यावेव।

१३. काफिले का नेता जहाज के डूबने से (नौव्यसने) मर गया। बहुत से समुद्री व्यापारी (सांयात्रिक पुं.) भाग्यवश बच गये।
दिवङ्गतः सार्थवाहो नौव्यसने। सांयात्रिकास्तु बहुशो दैवाद् रक्षिताः।

१४. नाविक (कैवर्त, कर्णधार पुं.) यात्रियों को सुख से पार पहुँचाता है।
सुखं पारं नयति यात्रिकान् कैवर्तः।

१५. उम्बेकाचार्य ने सच कहा है कि कल्याण एक दूसरे के पीछे चले आते हैं।
अवितथमुक्तमुम्बेकाचार्येन यत् सानुषङ्गाणि कल्याणानि।

१६. घोड़े पर काठी डाल, मुह में लगाम दे, रिकाबों में पैर धर और बागें हाथ में ले वह हवा हो गया।
अश्वे पर्याणमारोप्य मुखे खलीनं दत्त्वा, पादधान्योः पादौ न्यस्य वल्गांश्च हस्तेनादाय स वातरंहसा निरयात्।

१७. लक्ष्मण ने कहा- मैं कुण्डलों को नहीं जानता, बाहुबन्धों को नहीं जानता, पर नूपरों को पहचानता हूँ, क्योंकि मैं नित्य (सीता के) चरणों में नमस्कार किया करता था।
लक्ष्मणोऽवदत् ‘‘नाहं जानामि केयूरे नाहं जानामि कुण्डले। नूपुरे त्वाभिजानामि नित्यं पादाभिवन्दनात्।

संकेत :-
२. वहत् । (गृहं) स्वर्गीकर्तुमलम्।
४. यहाँ मूल में ‘समुद्रपल्वलयोः’ ऐसा समास है, यद्यपि क्रम के अनुसार पल्वल (नपुं) पहले आना चाहिए था, पर ‘समुद्र’ अभ्यर्हित होने के कारण समास में पहले रखा गया है।
५. सस्यलावाः कृषीवला दात्राणि सहादाय क्षेत्रं यान्ति। अण् कर्मणि चेत्यनेन क्रियायां क्रियायामण। सस्यं लविज्यन्तीति सस्यलावाः।
६. त्वं सर्वथा निर्दुष्टमालेख्यमालिखसि। अत्र केनाभिविनीतोऽसि?
९. अनियन्त्रितं ते तुण्डम्। सर्वकालमसमञ्जसं वक्षि।
११. यहाँ ‘‘पितरमुपरतं श्रुत्वा’’ ऐसा भी कह सकते हैं।
१३. सार्थवाह। दैवात्।
१४. पारं नयति।
१६. अश्वे पर्याणमारोप्य, मुखे खलीनं दत्त्वा, पादधान्योः पादौ न्यस्य प्रग्रहांश्च (वल्गाश्च) हस्तेनादाय स वातरंहसा निरयात्। पादधानी स्त्री. है।
१७. तान्सुखं प्रष्टुं यामि। दिनपूगः (अहर्गणः) तेषां दृष्टानाम् । अतोऽशान्तं मे स्वान्तम्।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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