अनुवाद कला (प्रथम अंश) अभ्यास 13

(अकारान्त पुंलिङ्ग शब्द)

१. यह काया क्षणभंगुर है। सभी आने वालों को जाना है।
कायः सन्निहितापायः। आगमाः सापगमाः।

२. यह सच है कि हम मर्त्य हैं, पर अपने पुरुषार्थ (उद्योग, उद्यम, अभियोग) से अमर हो सकते हैं।
सत्यं मर्त्या वयम् अभियोगेन तु शक्ताः स्मोऽमरभावमुपगन्तुम्।

३. प्रातः काल के सूर्य (बालार्क, अरुण) की अमृत भरी किरणें (किरण, कर, मयूख) आँखों को तरावट देती हैं और शरीर में नई स्फूर्ति (परिस्पन्द) का संचार करती हैं। बालार्कोऽमृतमयैर्मयुखैर्लोचने प्रफुल्लयति, देहे च परिस्पन्दं संचारयति।

४. आज एक पुण्य दिन है कि आप जैसे शास्त्र-वेत्ता के दर्शन हुए।
अद्य पुण्यो वासरो यद् भवादृशः शास्त्राज्ञो दृष्टः।
५. सभी संग्रह समाप्त होने वाले हैं, सारी उन्नति का अन्त अवनति है और सभी संयोगों का अन्त वियोग है।
सर्वे क्षयान्ता निचयाः, पतनान्ताः समुच्छ्रयाः। संयोगा वियोगान्ताः।

६. किया हुआ यत्न सफल होता है और समृद्धि (अभ्युदय) का कारण होता है।
अनुष्ठितो ह्यायासः कृती भवति, अभ्युदयं च जनयति।

७. आकाश में पक्षी (पतंग, पत्त्ररथ, शकुन्त) स्वेच्छा से विहार करते हैं और परमेश्वर की सुन्दर सृष्टि (सर्ग) का जी भर कर (मनोहत्य, निकामम्, आ तृप्तेः) दर्शन करते हैं।
स्वैरं विहरन्ति वियति विहगाः विश्वेशस्य च सुरम्यं सर्गमा तृप्तेरालोकयन्ति।

८. वसन्त में कोयल (पिक) जब पञ्चम स्वर से गाती है तो वोणा के स्वर भी फीके पड़ जाते हैं।
वसन्ते यदा पिकः पञ्चमेन स्वरेणापिकयति तदा विपञ्चीस्वरा अपि विरसी भवन्ति।

९. सिंह (मृगेन्द्र, मृगाधिप) ने हाथी (गज, मतङ्गज, दन्तावल) पर धावा किया, पर पीछे से एक शिकारी ने विषैले बाण से सिंह को मार दिया।
आक्रमत् मतङ्गजं मृगेन्द्रः पृष्ठतस्तु विषेषुणा मृगराजं व्यापादयद् व्याधः।

१०. प्रकाश (आलोक) किसे नहीं भाता, अन्धेरा किसे पसन्द आता है ?
आलोकः कस्यानभीष्टः ? अन्धकारश्च केनाभीष्टः ?

११. यज्ञदत्त की डरावनी आँखें हैं और देवदत्त की शान्त, दोनों सगे भाई हैं।
यज्ञदत्त उग्रदर्शनो देवदत्तश्च सौम्यदर्शनः। उभावपि सौदर्यौ।

१२. कृपा करके मेरी प्रार्थना (प्रणय) को न ठुकराइये। मैं इसके लिये आप का जीवन भर आभारी रहूंगा।
कृपया प्रणयं मे मा निराकार्षीः। आजीवनं ते कृतज्ञो भविष्यामि।

१३. जो लोग अनन्यभक्त होकर मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, (मुझ में) नित्य लगे हुए उन लोगों के योगक्षेम का मैं प्रबन्ध करता हूँ।
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये नराः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।

१४. वेद का ज्ञान (वेदाधिगम) कामना के योग्य है वैसे ही वैदिक कर्मयोग भी।
काम्यो हि वेदाधिगमः कर्मयोगश्च वैदिकः।

१५. आप जरा घोड़े की बागों को पकड़े, ताकि मैं उतर जाऊँ।
ध्रियन्तां तावत्प्रग्रहाः, यावदवरोहामि।

१६. शिव इस लोक में हमारा कल्याण करे, वह हमारा सहारा (आलम्ब पुं.) है।
शिवो हीहास्तु शङ्करोऽस्माकम्। स एवालम्बोऽस्माकम्।

१७. इतने विस्तार से कथन करना लिखो-पढी नागरिक जनता की बुद्धि का तिरस्कार है।
एतावान् वाक्प्रपञ्चः साक्षरस्य नागरकस्य जननिवहस्य प्रज्ञाधिक्षेप इव।

संकेत :-
इस अभ्यास में और इससे अगले अभ्यासों में सुबन्त रूपावलि का अभ्यास कराने के लिये वाक्य संगृहीत किये गये हैं। इस (१३ वें) अभ्यास में अकारान्त पुल्लिंग शब्दों का ही प्रयोग करना चाहिये, उन्हीं के पर्याय इकरान्त आदि का नहीं। इन अभ्यासों का दूसरा प्रयोजन है विद्यार्थी के शब्दकोष को बढ़ाना और लंग का विस्तृत बोध कराना।
२. सत्यं मर्त्या वयम्, अभियोगेन तु शक्ताः स्मोऽमरभावमुपगन्तुम्। ‘पुरुषार्थ’ संस्कृत में ‘उद्यम’ अर्थ में नहीं आता। हाँ ‘पौरुष’ इसके लिये उचित शब्द है, पर वह नपुंसक है। अद्य पुण्यो वासरो यद् भवादृशः शास्त्रज्ञो दृष्टः। दिवस और वासर दोनों पुं. और नपुं. हैं।
८. वसन्ते यदा पिकः पञ्चमेन स्वरेणापिकायति तदा विपञ्ची-स्वरा अपि (वीणानिक्वणा अपि) विरसीभवन्ति। कै गै शब्दे भ्वादी ॉॉ-यज्ञदत्त उग्रदर्शनो देवदत्तश्च सौम्यदर्शनः। उभावपि सोदर्यौ।
१५. ध्रियन्तां तावत्प्रग्रहाः, यावदवरोहामि।
१७. एतावान् वाक्प्रपश्चः साक्षरस्य नागरकस्य जननिवहस्य प्रज्ञाधिक्षेप इव । (प्रवीणा नागरा नागरकाः। वुञ्)

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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