अनुवाद कला (प्रथम अंश) अभ्यास 12

(क्रियाविशेषण का काम करने वाले कुछ प्रत्यय आदि)

१. वह कुछ अच्छा ही पकाती है (पचतिकल्पम्)। थोड़ा ही समय हुआ वह इस कला में प्रवृत्त हुई।
पचतिकल्पं सा, अचिरादेव प्रवृत्ताऽस्यां क्रियायाम्।

२. यज्ञदत्त की बहिन उससे अधिक अच्छा गाती है (गायतितराम्), यद्यपि दोनों ने एक साथ (समम्) गाना सीखना आरम्भ किया।
यज्ञत्तात् स्वसा गायतितराम्। यद्यपि सममेवाऽरब्धाऽनयोर्गानशिक्षा।

३. कहने को तो वह गाता है, पर वस्तुतः चिल्लाता है।
गायति ब्रुवं, क्रोशति चाञजसा।

४. वह खाक पकाती है (पचति पूति)। सब रोटियाँ अधजली और सूखी हुई हैं।
पचति पूति। सर्वा रोटिका अवदग्धाः कर्कशाश्च संवृत्ताः।

५. वह गजब का पढ़ाने वाला है, एक बार सुनी हुई व्याख्या सदा के लिये मन में घर कर लेती है।
स दारुणमध्यापयति, सकृत् श्रुताऽपि व्याख्याऽत्यन्त्याय हृदि पदं करोति।

६. पकाती क्या है घर वालों का सिर। इसे तो रसोई में बैठने का भी अधिकार नहीं।
पचति गोत्रम्। अनर्हेयं रसवतीप्रवेशस्य।

७. ये परले दर्जे के अध्यापक ही नहीं (न केवलं काष्ठाध्यापकाः), सब शास्त्रों और कलाओं में निपुण भी हैं।
नैते केवलं काष्ठाध्यापकाः, अपि कुशलाः समस्त शास्त्रकलासु।

८. यह बालक बहुत अच्छा पढ़ता है (पठतिरूपम्), न बहुत जल्दी पढ़ता है और न हि कोई अक्षर छोड़ता है। मधुर और स्पष्ट उच्चारण करता है।
अयं माणवकः पठतिरूपम्। न निरस्तं पठति न च ग्रस्तम्। मधुरमम्लिष्टं चोच्चारयति।

९. वह क्या पढ़ता है जो उदात्त के स्थान अनुदात्त उच्चारण करता है।
स किमधीते य उदात्ते कर्तव्येऽनुदात्तं करोति।

संकेत :-
३. गायति ब्रुवं क्रोशति चाञ्जसा। यहाँ ‘ब्रुव’ अच् प्रत्ययान्त प्रातिपदिक है, प्रत्यय नहीं। यह कुत्सा अर्थ में प्रयुक्त होता है। {‘ब्रुव’ आदि के इन अर्थों में प्रयोग में तिङो गोत्रादीनि कुत्सनाभीक्ष्ण्ययोः (८/१/२७), पूजनात्पूजितमनुदात्तम् (८/१/६७), कुत्सने च सुप्यगोत्रादौ (८/१/६९) ये पाणिनीय सूत्र ज्ञापक हैं। ‘‘पचति गोत्रम्’’ में पुराने व्याख्याकार पचति का अर्थ पञ्चति, पञ्चयति (प्रपञ्चयति) लेते हैं। पर यह अर्थ अन्यत्र कहीं भी नहीं पाया। कोषकारों को भी यह अविदित है।)
४. पचति पूति। सर्वा रोटिका अवदग्धाः कर्कशाश्च संवृत्ताः।
५. स दारुणमध्यापयति, सकृच् च ताऽपि व्याख्याऽत्यन्ताय हृदि पदं करोति।
६. पचतिगोत्रम्। अनर्हेयं रसवतीप्रवेशस्य।
८. अयं माणवकः पठतिरूपम्। न निरस्तं पठति न च ग्रस्तम्। मधुरमम्लिष्टं चोच्चारयति।
९. स किमधीते य उदात्ते कर्तव्येऽनुदात्तं करोति। यहाँ ‘किम्’ क्षेप में है, प्रश्न में नहीं। समास न होने से स्वतंत्र पद है।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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