अनुवाद कला (द्वितीय अंश) अभ्यास 1

(लट् लकार)

१. सदवृत्त छात्र जब भी अपने गुरु से मिलता है, हाथ जोड़कर श्रद्धा से नमस्कार करता है और आशीष प्राप्त करता है।
सच्चरित्रश्छात्रो यदापि गुरुणा समापद्यते, तदा तदाऽञ्जलिमाधायाऽभिवादयते, आशीश्च प्रतिपद्यते।

२. आप बहुत जल्दी बोल रहे हैं। मुझे समझ नहीं आता कि आप क्या कह रहे हैं।
त्वरिततरां प्रभाषसे, नाहं किमपि त्वदुक्तमवबुध्ये।

३. दण्ड ही प्रजाओं पर शासन करता है। दण्ड के भय से ही ये सुमार्ग पर चलती हैं।
दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वाः। दण्डभयेनैवेमाः सुपथगा भवन्ति, नो चेत् कापथम् आश्रयन्ति।

४. बच्चा माता के दर्शन के लिए उत्कण्ठित है, इस कारण उसका मन न खेल में लग रहा है न खाने में।
मातृदर्शनायोत्कण्ठते बालः। अतो न खेलने नाप्यदने प्रीणात्यस्य मनः।

५. उसे सुरा पीने की लत पड़ गई है। इसके साथ ही वह आचार से गिर गया है।
शीधुनि प्रसजति सः भ्रश्यति चाचारात्।

६. कुम्हारिन अपने बर्तन को सराहती है। इसमें पक्षपात ही कारण है, क्योंकि वह गुणदोष की विवेचना नहीं करती।
कुम्भकारी सर्वं कान्तमात्मीयं पश्यति। पक्षपात एवास्य कारणं, यतो हि न सा गुणदोषान् विविङ्क्ते।

७. आप देखते नहीं कि अपने वचन का आप ही विरोध कर रहे हो। वचन विरोध उन्मत्त प्रलाप सा हो जाता है। यह आप जैसों को शोभा नहीं देता।
किं न पश्यसि स्वोक्तिं विप्रतिषेधसीति। वदतो व्याघातो ह्युन्मत्तप्रलाप इव भवति। न चैष भवादृशेषूपपद्यते।

८. आश्चर्य है सुशिक्षित मनवाले ब्राह्मण भी ऐसे व्यवहार करते हैं। उनसे इनकी संभावना नहीं होनी चाहिए।
आश्चर्यं यत्संस्कृतमतयो द्विजातयोऽप्येवं व्यवहरन्ति। नैतत्तेषु सम्भाव्यते।

९. आप को पुत्रजन्म पर बधाई हो।
दिष्ट्या पुत्रलाभेन वर्धते भवान्।

१०. तू दूसरों की आँख के तिनके को तो देखता है पर अपनी आँख के शहतीर को नहीं।
(खलः) सर्षपमात्राणि परच्छिद्राणि पश्यति। आत्मनो बिल्वमात्राणि पश्यन्नपि न पश्यति॥

११. अनाड़ी कारीगर जब एक अंग को जोड़ने लगता है सो दूसरा बिगड़ जाता है।
कुकारुकस्यैकमनुसन्धित्सतोऽपरं च्यवते।

१२. अन्न से भरपेट विद्यार्थी ऊधम मचाते हैं।
ओदनस्य पूर्णाश्छात्रा विकुर्वते।

१३. सूर्य के चले जाने पर निश्चय ही कमल अपनी शोभा धारण नहीं करता।
सूर्याऽपाये न खलु कमलं पुष्यति स्वामभिख्याम्।

१४. प्रातः से लेकर मेंह बरस रहा है और थमने में नहीं आता। इससे घर से बाहिर निकलना भी कठिन हो गया है।
प्रातः प्रभृति वर्षति देवः, न चैष विरमति।

१५. माता अपने बच्चे के लिए जब चपाती बनाती है तो उसके बनाने में उसे वह आनन्द आता है जो बच्चे को उसके खाने में नहीं।
अम्बा बालाय रोटीं रन्धयति यदा, तदा यस्तस्याः प्रमोदस्तद्रन्धने, न तथा स बालस्य भवति तदास्वादे।

१६. पक्षी आकाश में ऐसे निःशंक होकर उड़ रहे हैं मानों वे इस अनन्त अन्तरिक्ष के स्वामी हैं।
खे खगा एवं निःशङ्कीभूयोत्पतन्ति, यथेमा अधिपा अनन्ताऽम्बरस्य।

१७. मूर्ख बकवास कर रहा है। यह ऐसी बेतुकी बातें किया करता है कि जिन्हें सुनते ही हँसी आ जाती है।
प्रलपत्येष वैधेयः। एष इत्थमसम्बद्धं प्रलपति यच्छृत्वैव जनस्य जायते हासः।

१८. मैं तुम्हें इतने समय से ढँूढ रहा हूँ। तुम कहाँ गुम हो जाते हो।
इमां वेलां त्वामन्विष्यामि। क्व निलीयसे?

संकेतः-
इस अभ्यास का और इस अंश में दिए गए दूसरे अभ्यासों का लक्ष्य यह है कि विद्यार्थि को धातुरूपावलि का यथेष्ट परिशीलन हो जाए। सभी धातुओं के भिन्न भिन्न लकारों के रूप एक समान मधुर और मञ्जुल नहीं होते, इसलिए यहाँ यह नियम नहीं किया गया है कि किसी एक धातु का ही प्रयोग किया जाए और उसी अर्थवाला दूसरी धातु का नहीं। हमारा प्रयोजन सुन्दर भाषा रचना में कुशलता उत्पन्न कराना है व्याकरण के विविध रूपों को सिखाना ही नहीं। अतः प्रथम वाक्य के अनुवाद में विद्यार्थी नमस्कार क्रिया को कहने के लिए नम्, प्र+नम्, वन्द, अभिवादि, नमस्य धातुओं में से जौन सी चाहे प्रयोग कर सकता है।
१. गुरु से मिलता है = गुरुणा समापद्यते (संगच्छते)।
२. त्वरिततरां प्रभाषसे, नाहं किमपि त्वदुक्तमवबुध्ये। = बोल रहा है, खा रहा है, पी रहा है, सुन रहा है, उड़ रहा है- इन सबके अनुवाद में लट् का ही प्रयोग होता है। प्रभाषते, खादति, पिबति, शृणोति, उत्पतति। आजकल कई लोग इसके स्थान पर शतृ, शानच् प्रत्ययों का प्रयोग करते हैं और साथ में अस् का लट् लकारान्त रूप- प्रभाषमाणोऽस्ति, खादन्नस्ति, पिबन्नस्ति, शृण्वन्नस्ति, उत्पतन्नस्ति, यह प्रयोगिक व्यवहार के विरुद्ध है। वर्तमान काल की सन्तत क्रिया को भी लट् लकार से ही कहना चाहिए। क्यों कि वर्तमान काल का लक्षण “प्रारब्धोऽपरिसमाप्तश्च कालो वर्तमानकालः” ऐसा किया है।
३. आश्रयण = आ+श्रि भ्वा.।
४. मातृदर्शनायोत्कण्ठते बालः। = मा तुराध्यायति डिम्भः, सोत्कण्ठं स्मरति मातुः शिशुकः।
५. शीधुनि (मधुनि) प्रसजति सः भ्रश्यति (भ्रंशते) चाचारात्।
६. विवेचना नहीं करती = न विविङ्क्ते। विच् रुधा. उ.।
७. किं न पश्यसि स्वोक्तिं विप्रतिषेधसीति। = स्वोक्तं विरुणत्सीति स्ववचो व्यहंसीति। वदतो व्याघातो ह्युन्मत्तप्रलाप इव भवति (विप्रलापो ह्युन्मत्तप्रलपितमनुकरोति)। न चैष भवादृशेषूपपद्यते।
९. दिष्ट्या पुत्रलाभेन वर्धते भवान्। = इस बात को कहने का यही शिष्टसम्मत प्रकार है।
१४. थमने = वि रम् भ्वा. प.। प्रातः प्रभृति वर्षति देवः, न चैष विरमति। वर्षा भवति आदि प्रयोग व्याकरण सम्मत होते हुए भी व्यवहार के प्रतिकूल हैं। संस्कृत में वर्षा नित्य बहुवचनान्त है जिसका अर्थ ‘बरसात’ है सो “वर्षा भवन्ति” संकृत होगी पर अर्थ होगा “बरसात है”। देव = इन्द्र, पर्जन्य, मेघ। इन्द्रवाची या मेघवाची कोई न कोई शब्द ‘वर्षति’ का कर्ता होना चाहिए।
१५. (चपाती) बनाती है = रन्धयति रध् दिवादि परस्मैपदी है।
१८. इमां वेलां त्वामन्विष्यामि (संवीक्षे)। क्व निलीयसे (क्वान्तर्धत्से)। यहाँ “इमां वेलां” में अत्यन्त संयोग में द्वितीया हुई है। इसके स्पष्टतर बोध के लिए विषय प्रवेश में कारक प्रकरण देखो!

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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