अनुवाद कला (द्वितीय अंश) अभ्यास 9

(लङ् लकार)

१. राम और सुग्रीव की मित्रता बढ़ गई। क्योंकि दोनों का कार्य एकदूसरे की सहायता से बनता हुआ दीखा।
अमूर्च्छत्सख्यं रामसुग्रीवयोः। यतो मिथः साहाय्येन लक्षिता कार्यसिद्धिर्द्वयोः।

२. रात में अन्धेरा फैला हुआ था, और हम राह भटक गए।
अमूर्च्छन्निशि तमः पथश्चाभ्रशामहि।

३. देवताओं से समुद्र में मथकर अमृत निकाला गया और आपस में बाँट लिया गया।
देवैः सुधां क्षीरनिधिरमथ्यत, सा च सुधा मिथो व्यभज्यत।

४. जिन्होंने डींग मारी (जो अपने मुंह मियाँ मिट्ठू बने) वे नष्ट हो गए।
ये आत्मना व्यकत्थन्त, तेऽध्वंसन्त।

५. सूर्य जब पश्चिम से अस्त हो रहा था, तो वह जल्दी जल्दी अपने घर की ओर चला।
पश्चिमामवलम्बमाने दिवाकरे स गृहमुपगन्तुं त्वरिततरां प्राक्रामत्।

६. दिन छिपे (घर) आए हुए यात्री का जंगल निवासियों ने पूरा सत्कार किया।
सूर्योढस्य यात्रिण आरण्यका निकामम् आतिथ्यमन्वतिष्ठन्।

७. हनुमान् और दूसरे वानरों ने सीता की खोज में सारा वन छान मारा, पर सीता का कुछ भी पता न चला।
हनुमान् अन्ये च कपयो निखिलामटवीं मैथिलीं व्यचिन्वन्। परं न किञ्चित् तस्याश्चिह्नमं् अभ्यलक्षयन्।

८. मेरी अँगुली में सुई चुभ गई। जिससे अभी तक दर्द हो रहा है।
सूच्या ममाङ्गुलिरविध्यत, येनाद्यापि सरुजोऽस्मि।

९. मैं संसार में देर तक घूमा, इसी लिए मैं इस विचित्र सृष्टि के सौंदर्य को जान सका हूंँ।
सुचिरं व्यचरं भुवम्, तेन विजानामि विचित्रस्यास्य सर्गस्य सौंदर्यम्।

१०. नगर शत्रुओं से घेरा गया और इसका सर्वस्व लूटा गया।
नगरमरिभिररुध्यत, निखिलसंपच्चास्यामुष्यत।

११. एकाएक बारीश आ गई और सब गड़बड़ मच गई।
सहसा प्रावर्षद् देवः, प्रावर्त्तत च संक्षोभः।

१२. पृथ्वी ने जँभाई ली, और हजारोंं लोग आन की आन में इसके बीच समा गए।
पृथ्वी व्यजृम्भत, सहस्रशो जनाश्च निमिषमात्रेण तस्यां व्यलीयन्त।

१३. उस समय मुझे नीन्द नहीं आ रही थी, मैं देर तक आँखें मूँदे बिस्तर में लेटा रहा। और वही चिन्ता देनेवाली पुरानी घटना याद आती रही।
तदा मां निद्रा नागच्छत्, चिरमहं नेत्रे निमील्य शयनीये न्यपद्ये, उद्वेगकरं तमेव पूर्वव्यतिकरं चास्मरम्।

१४. न्यायाधीश ने दस अपराधियों को प्राणदण्ड दियाऔर बाकियों को आजीवन कारावास।
अक्षदर्शको दशाऽपराद्धान्वधदण्डमादिशत्, शिष्टांश्चामृत्योः कारावासम्।

१५. क्या तुम्हारे गाँव के लोगों ने पंचायत के चुनाव में विशेष दिलचस्पी नहीं ली?
किं युष्मद् ग्रामवासिनोऽस्मिन् विषये विशिष्टमादरं नाकुर्वन्?

१६. तब शंख और ढोल इस जोर से बजाए गए कि दूर ठहरे हुए हम लोगों के कानों में आवाज साफ सुनाई दी।
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च तथा तरसाभ्यहन्यन्त यथा सुदूरेऽपि स्थितानां नः श्रोत्रयोरमूर्छच्छब्दः।

संकेतः-
१. मित्रता = मैत्री-स्त्री., मैत्र्य, मैत्रक, सख्य-नपुं.।
३. अमृत = अमृत, पीयूष-नपुं., सुधा-स्त्री.।
७. विनय किया = अनु+नी भ्वा.।
६. अनुरक्त थी = अनु+रञ्ज (कर्मकर्तरि)।
१०. घेरा गया = रुध। लूटा गया = मुष्-क्र्याादि.।
११. बारिश आ गई = प्र+वृष् भ्वा.। गड़बड़ = संकुल।
१४. न्यायाधीशः = न्यायाध्यक्ष, आधिकरणिक, प्राड्विवाक-पुं.।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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