अनुवाद कला (द्वितीय अंश) अभ्यास 8

(लङ् लकार)

१. जब मैं घर में प्रविष्ट हुआ तो कोई भी अन्दर न था। इससे मुझे बहुत अचम्भा हुआ।
यदाहं गेहं प्रविष्टो नासीत् कोऽप्यन्तः। तेन जातं ममाश्चर्यम्।

२. भारत में अशोक नामक एक बड़ा सम्राट हो चुका है जो जीवमात्र पर दया करने के लिए प्रसिद्ध हुआ।
इह भारते वर्षेऽशोको नाम सम्राडासीत्, यो जीवमात्रस्यादयतेति लोके व्यश्रूयत।

३. दुष्यन्त ने हिरण का बहुत पीछा किया, पर वह इसे पकड़ न सका।
दुष्यन्तः सुष्ठु सारङ्गमन्वसरत्, परं नासादयत्।

४. वह शिकार खेलने के लिए निकल गया और घण्टों जंगल में घूमता रहा।
स मृगयां निरगच्छत्। बह्वीश्च होरा वनमभ्रमत्।

५. गुरु ने शिष्य को उसकी ढिठाई के लिए बुरा भला कहा। सहपाठियों ने भी उसकी खूब निन्दा की।
गुरुरन्तेवासिनं तस्य धार्ष्ट्येन निरभर्त्सयत। सहाध्यायिनोऽपि भूयस्तमतर्जयन्त।

६. मैंने षड़यन्त्रों के बुरे परिणाम से उस अवगत कर दिया है।
षड्यन्त्राणां दुष्परिणतिं तमहं प्राबोधयम्।

७. मैंने उससे सच सच कह देने के लिए बहुत अनुनय विनय किया, पर वह न माना और अपनी बात पर डटा रहा।
तमहं सत्यभाषणाय बहुशोऽन्वनैषम्। परं स नाङ्ग्यकरोत् स्वप्रवादे चावास्थात्।

८. प्रजा राजा में पूर्णतया अनुरक्त थी। सर्वत्र विद्या का प्रसार था और शान्ति का साम्राज्य था।
प्रजा प्रजेश्वरे निरवशेषमन्वरज्यत्। सर्वतो विद्यायाः प्रसारः शान्तेश्च साम्राज्यमासीत्।

९. गवर्नर महोदय के आने पर सड़कें साफ हों गईं और उनपर पानी छिड़काया गया। आने जानेवाले लोगों को परे हटा दिया गया।
आगते भोगपतौ सममृज्यन्त मार्गाः प्रौक्ष्यन्त च। पथिकाश्चापावर्ज्यन्त।

१०. भारत में ब्राह्मणों को वैराग्य (वैराग्येण) और संन्यासपूर्ण जीवन के लिए सर्वदा सम्मान मिलता था।
भारते ब्राह्मणा वैराग्येण संन्यासिजीवनेन च सर्वदा सममान्यन्त।

११. प्रत्येक द्विज के बालक को उपनयन कर चुकने के बाद सब विद्याएँ सिखाईं जाती थी।
प्रत्येकं द्विजस्यापत्यम् उपनयनोत्तरं सर्वा विद्या अध्याप्यन्त।

१२. मन्त्रियों ने विद्रोहियों को पकड़ने की आज्ञा दी।
मन्त्रिणो राजद्रोहिणामासेधमादिशन्।

१३. कैदियों ने अपना अपराध मान लिया और इसलिए क्षमा कर देने के बाद वे छोड़ दिए गए।
आसिद्धाः स्वव्यलीकमभ्युपायन्। ततश्च क्षान्त्वा ते निर्मुक्ताः।

१४. उससे कई एक प्रश्न पूछे गए, परन्तु वह एक का भी सन्तोषजनक उत्तर न दे सका। डींगे इतनी मारता था।
तं कतिपय प्रश्नान् अपृच्छन्। नैकस्यापि सन्तोषजमुत्तरं दातुम् आर्हत् सः। आत्मना व्यकत्थत।

१५. अनावृष्टि के कारण खेती सूख गई और खाद्य पदार्थों का भाव बहुत बढ़ गया।
अवग्राहेण शस्यं शुष्कीभूतं खाद्यपदार्थाश्च महार्घ्यभवन्।

१६. कहते हैं कि विन्ध्याचल को पार करनेवाला पहला आर्य ‘अगस्त्य’ था।
अनुश्रूयते यद् आर्येष्वगस्त्यो नामर्षिरिदम्प्रथमतया विन्ध्यगिरिमत्ययात्।

संकेतः-
२. जीवमात्रस्यादयतेति लोके व्यश्रूयत = यहाँ कर्मत्व की विवक्षा में ‘जीवमात्रमदयत’ ऐसा भी कह सकते हैं।
३. हिरन = हरिण, मृग, कुरङ्ग, एण-पुं.।
५. ढिठाई = धार्ष्ट्य, वैयात्य-नपुं.। बुरा भला कहा = तर्ज् भ्वा. पर. तर्ज् भर्त्स् चुरा. आ.।
६. बुरे परिणाम से = दुष्परिणाम-पुं., दुष्परिणति-स्त्री.। यहाँ द्वितीया का प्रयोग करना है।
७. अनुनय विनय किया = अनु+नी भ्वा.।
८. अनुरक्त थी = अनु+रञ्ज् (कर्मकर्तरि)।
१०. सम्मान मिलता था = सम्+मन् णिच् (कर्मणि)।
९. आगते भोगपतौ सममृज्यन्त मार्गाः प्रौक्ष्यन्त च = यदि किसी धातु के पूर्व कोई उपसर्ग लगा हो, तो पहले उस धातु का लङ्लकार का प्रयोग बनाकर बाद में उस प्रयोग के पूर्व उपसर्ग लगाया जाता है। जैसे ऊपर के वाक्य में मृज् का लङ् (कर्मवाच्य लकार) का प्रथमपुरुष बहुवचन ‘अमृज्यन्त’ बना वैसे ही उक्ष् का लङ् (कर्मवाच्य) ‘औक्ष्यन्त’ हुआ और फिर प्र उपसर्ग लगाकर पौक्ष्यन्त बना।
१३. कैदियों = आसिद्धाः, बद्धाः, बन्दयः-स्त्री., बन्द्यः -स्त्री.। अपराध = अपराध, मन्तु -पुं.। आगस् व्यलीक = नपुं.। मान लिया = अभि+उप+इ अदा., प्रति+पद् दिवा.।
१५. अनावृष्टि = अनावृष्टि स्त्री., अवग्रह, अवग्राह-पुं.। खेती = शस्य।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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