अनुवाद कला (द्वितीय अंश) अभ्यास 7

(लट्)

१. दक्षिण की नदियाँ गरमी में सूख जाती हैं, परन्तु पंजाब की नदियाँ वर्षभर चलती हैं।
दाक्षिणात्याः सरितो निदाघे शोषं यान्ति, पाञ्चनद्यस्तु सरित आवर्षं स्रवन्ति।

२. उसे न तो विवेक ही है और न ही अपने मन की बात कहने का साहस। वह तो केवल हाँ में हाँ मिलाना जानता है।
नाप्यस्ति स विवेकी न च क्रमते मनोगतं निर्वक्तुम्। केवलं तथास्त्वित्युक्तमनुवदति।

३. वह बेचारी भिखारिन शीत के कारण सिर से पाँव तक ठिठुर रही है। इसे ज्वर भी हो रहा है।
तपस्वीनी सा भिक्षुकी शैत्येनापादचूलं वेपते ज्वरति च।

४. शेर दहाड़ता है, हाथी चिंघाड़ता है, कुत्ता भौंकता है, गधा हींगता है, घोड़ा हिनहिनाता है, बिल्ली म्याऊँ म्याऊँ करती है, मेंढक टर्राते हैं, साँप फुंकारते हैं, चिडिया चूँ चूँ करती है, गीदड़ चीखते हैं, गौएँ और भैंसे रँभाती हैं, कौए काँव काँव करते हैं भेड़िए गुर्राते हैं।
सिंहो गर्जति, हस्ती बृंहति, भषको भषति, गर्दभो गर्दति, तुरंगो ह्रेषते, मार्जारी पीवते, दर्दुरा रुवन्ति, भुजंगाः फुत्कुर्वन्ति, चटकाश्चीभन्ते, क्रोशन्ति क्रोष्टारः, रम्भन्ते गावो महिष्यश्च रेभन्ते, काकाः कायन्ति, वृकाश्च रेषन्ते।

५. क्या आप सर्दियों में भी ऊनी कपड़ा नहीं पहनते, और तो कुछ नहीं, जुकाम और निमोनिया का डर है।
किं भवान् शैत्येऽप्याविकसौत्रिकवसनानि न वस्ते? नान्यत्किञ्चित्परं प्रतिश्यायस्य पुप्फुसशोथस्य च भीतिर्वर्तते।

६. वह पढ़ने से जी चुराता है और समय पर मित्रों के साथ खेलने भी नहीं जाता।
अध्ययनाद् व्यपवर्ततेऽस्य चेतः। न च मित्रैः सह क्रीडार्थं समयम् अनुवर्तते।

७. दीपक बुझ रहा है क्योंकि इसमें तेल समाप्त हो गया है।
निर्वाति प्रदीपः, तैलनिषेकोऽस्य परिसमाप्यते।

८. ये सफेद घोड़े कितने सुन्दर हैं। दौड़ते भी क्या हैं, उड़ते हैं।
इमे कर्का अतिमनोज्ञाः। शङ्क एते धावन्त्यपि तूत्पतन्ति।

९. बँूदा बाँदी हो रही है, गरमी भी कम हो गई है, सैर के लिए सुहावना समय है।
मन्दमन्दं वारिकणिका वर्षति वारिवाहः। ह्रसितमूष्णम्। विहाराय रमणीयेयं वेला वर्तते।

१०. धनी लोग गरीबों पर सदा अत्याचार करते आए हैं। इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं, दूसरों का देयभाग छीनने से ही तो धन-संग्रह होता है।
धनाढ्याः सर्वदा दरिद्रान् अतिचरन्ति। नात्र किञ्चित् विस्मापकम्, अपरस्य देयम् आच्छिद्यैव हि धनसञ्चयः सम्भवति।

११. वह पिछले तीन वर्षों से उसी छोटे से मकान में रह रहा है और सुख अनुभव कर रहा है।
अद्य त्रीन् वत्सरान् स तदेवाल्पकं सदनमावसति, सुखं च समश्नुते।

१२. मैं दोपहर दो बजे से पाठ याद कर रहा हूँ। अभी तक याद होने में नहीं आया।
मध्याह्ने दिवादनात्प्रभृत्यहं पाठं स्मरामि। नाद्यापि पारयामि कण्ठे कर्तुम्।

१३. यह नन्हा सा पक्षी अपने बच्चे को चोगा दे रहा है। यह निष्कारण प्रेम का उदाहरण है।
इयं शकुन्तिका शावमुच्चितान् कणान् आशयति। इयमुपमा निष्कारणस्य प्रणयस्य।

१४. जुआ खेलनेवाला अवश्य नष्ट हो जाता है। जुआ बड़ा भारी व्यसन है और व्यसनी की लोकयात्रा सुखमय नहीं हो सकती।
अवश्यं प्रणश्यति दुरोदरः। द्यूतं च नामति दुर्वहं व्यसनं, न कदापि व्यसनिनो लोकयात्रा सुखमयी भवितुं शक्नोति।

१५. आजकल जनता मनुष्य की योग्यता का अनुमान उसके पहरावे से करती है, इसीलिए वेशभूषा में अधिकाधिक रुचि हो रही है।
अद्यत्वे जनता मनुष्यस्य योग्यतां वेषेणानुमिनोति, अतो वेषभूषायां भूय एवाभिवर्धते रुचिः।

१६. यदि सब मोहल्लेवाले थोड़ा थोड़ा भी इस गरीब को दें तो इसका अच्छा निर्वाह हो सकता है। जल की बूँद बूँद गिरने से घड़ा भर जाता है।
यदि सर्वे रथ्यास्थाः स्वल्पमात्रमपि दरिद्रायास्मै दास्यन्ति तर्हि निर्वहणमस्य सम्भविष्यति। जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः।

१७. हमारे देश का जल वायु ऐसा विचित्र है कि वर्षा ऋतु में एक क्षण में ठंड़ी हवा चलती है और क्षण में कड़ाके की धूप निकलती है।
अस्मद्देशे वातावरणमेवं विलक्षणं वर्तते यत् वर्षर्तौ क्षणेनातिशिशिरो वहति समीरः, क्षणेन च रविरतितीक्ष्णं तपति।

१८. व्यायाम से मनुष्य में स्फूर्ति और बल आता है। शरीर स्वस्थ रहता है और चित्त एकाग्र।
व्यायामेन मनुष्यः स्फूर्तिं लभते तथा चोर्जयते। शरीरं स्वस्थं भवति चित्तं चैकाग्रम्।

१९. आपकी बातचीत प्रकृत विषय से कोई सम्बन्ध नहीं रखती। आप अपना समय गँवा रहे हैं।
युवयोः संभाषा प्रकृतं नानुसरति, युवां समयाकुरुथः।

२०. जब भूचाल आता है, कहीं पृथ्वी उभर आती है, कहीं धँस जाती है, कहीं गहरे गड्ढ़े पड़ जाते हैं और पानी निकल आता है।
यदा भूः कम्पते तदा क्वचिद् इयमुदञ्चति क्वचिन्न्यञ्चति, क्वचिच्च महागर्ताः सञ्जायन्ते जलं च प्रस्रवति।

२१. आकाश पर बादल छा रहे हैं और बिजली कड़क रही है।
अवस्तीर्यते नभस्तलं वारिदैः, ह्रादते च ह्रादिनी।

२२. तेरा पड़ोसी गरीब है, तू उसे सहायता क्यों नहीं करता?
भवतः प्रतिवेशी दरिद्राति, स कथं नाभ्युपपद्यते भवता?

२३. क्या दूध पक गया? श्रीमन् ! दूध पक रहा है।
किं शृतं क्षीरेण? अङ्ग श्राति पयः।

संकेतः-
१. चलती हैं = वह् भ्वा. उ., स्रु भ्वा., स्यन्द् भ्वा. आ.।
२. तथास्त्विति = साधु साध्विति।
४. शेर दहाड़ता है = गर्ज्। हाथी चिंघाड़ता है = बृंह् भ्वा. प.। कुत्ता भौंकता है = बुक्क, भष् भ्वादि. प.। गधा हींगता है = गर्द्, रास् भ्वा. आ.। घोड़ा हिनहिनाता है = हेष्, ह्रेष् भ्वादि. आ.। बिल्ली म्याऊँ म्याऊँ करती है = पीव् भ्वा. प.। मेंढक टर्राते हैं = रु अदा., प्र+वद् भ्वा.। साँप फुंकारते हैं = फूत्कुर्वन्ति। चिडिया चूँ चूँ करती है = चीभ् भ्वा. आ.। गीदड़ चीखते हैं = क्रुश् भ्वा. प.। गौएँ और भैंसे रँभाती हैं = भ्वा. आ.। कौए काँव काँव करते हैं = कै भ्वा. प., वाश् दिवा. आ.। भेड़िए गुर्राते हैं = रेष्।
५. ऊनी कपड़ा = आविकसौत्रिक-वि.। जुकाम = प्रतिश्याय, पीनस-पुं.। निमोनिया = पुप्फुसशोथ-पुं। नहीं पहनते = परि+धा, वस् अदा. आ.।
७. तैलनिषेकोऽस्य परिसमाप्यते = स्नेहोऽस्य परिसमाप्तः।
८. इमे कर्का अतिमनोज्ञाः। शङ्क एते धावन्त्यपि तूत्पतन्ति। यहाँ श्वेता, शुक्लाः आदि नहीं कह सकते। कर्क शब्द ही श्वेत अश्व के विषय में निहित है।
९. ह्रसितमूष्णम् = उष्ण का यहाँ भावप्रधान प्रयोग किया है जैसे कालिदास ने शाकुन्तल में किया है- “अनुभवति हि मूर्ध्ना पादपस्तीव्रमुष्णम्”।
१०. देयभाग छीनने = आ+छिद् रुधा., आ+मृश् तुदा.।
११. मकान = गृह, गेह, निकेतन, सदन, सद्मन्, वेश्मन्, उदवसित, भवन, शरण, अगार, मन्दिर-नपुं। त्रीन् वत्सरान् = में हुई द्वितीया ही न्याय है विभक्त्यान्तर नहीं।
१३. इयमुपमा निष्कारणस्य प्रणयस्य = दिगियमकारणस्य स्नेहस्य।
१४. अनुमान = अनु+मि स्वा. उ., अनु+मा जुहो. आ., तर्क् चुरा.। पहरावे = वेष, आकल्य-पुं., नेपथ्य-नपुं.।
१६. मोहल्लेवाले = विशिखावास्तव्याः, रथ्यास्थाः। यहाँ ‘रथ्यापुरुषा’ नहीं कर सकते, कारण कि ‘रथ्यापुरुषा’ साधारण, अल्पाक्षर अथवा अनक्षर पुरुष को कहते हैं।
२०. क्वचिन्न्यञ्चति = निषीदति।
२१. पड़ोसी = प्रतिवेशिन्। गरीब = दरिद्रा अदा. प.।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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