अनुवाद कला (द्वितीय अंश) अभ्यास 6

(लट्)

१. मांगना तो मरने का दूसरा नाम है। तो क्या मैं अब दूसरे के अन्न से निर्वाह करुँ। भाग्य के बदल जाने पर मनुष्यों का बार बार तिरस्कार होता है।
याञ्चा हि पर्यायो मरणस्य, किमिदानीं परान्नेनात्मानं यापयामि। भाग्ये विपरितवृत्ते सति मनुष्या असकृत् तिरस्कृता भवन्ति।

२. इस संसार के चलते हुए जीव के अपने कर्मों का फल ही पाथेय होते हैं।
इतः संसारात् प्रतिष्ठमानस्य जीवस्य स्वकर्मविपाक एव पाथेयं भवति।

३. जब वृक्ष की जड़ें नंगी हो जाती हैं वह हिल जाता है और कुछ काल के पीछे उखड़ जाता है।
यदा वृक्ष आविर्मूलो भवति, तदा स विह्वलति, किञ्चित्कालोत्तरं चोद्वर्त्तते।

४. जो यह विचारकर खाता है कि यह मेरे अनुकूल है और यह अनुकूल नहीं है, वह बीमार नहीं होता।
य इदं ममोपशेते इदं नोपशेत इति विविच्यान्नमश्नाति स नाभ्यमयति।

५. जब कोई यह सुनता है कि मेरा मित्र मेरी चुगली करता है तो उसे अपार पीड़ा होती है।
यदा कश्चिन्निशाम्यति मित्रं मे मां परोक्षं निन्दति, तदा भृशं दुख्यति।

६. अनार और आँवले की खटास को छोड़कर सभी खटास गरमी करती है।
सर्वमम्लं पित्तं प्रकोपयत्यन्यत्र दाडिमामलकात्।

७. मैं राज्य नहीं चाहता, स्वर्ग नहीं चाहता, मोक्ष नहीं चाहता, मैं तो दुःख से पीडित प्राणियों की पीड़ा का शमन चाहता हूं।
न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम्। कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्॥

८. जो क्षत्रिय देश के हित से प्रेरित होकर बिना स्वार्थ के युद्ध करते हैं और शत्रुओं को मार भगाते हैं वे निश्चय ही स्वर्ग को जाते हैं।
ये राजन्या राष्ट्रहितप्रयुक्ताः स्वार्थमनुसन्धाय संग्रामयन्ते द्विषतश्च पराणुदन्ते ते नाकं सचन्ते।

९. ये खिलाड़ी लड़के अभी तक खेल रहे हैं। इन्हें अपनी पढ़ाई की कुछ भी परवाह नहीं।
अधुनापि कुमारयन्तीमे कुमारा आक्रीडिनः पाठेष्वनवहिताः।

१०. यज्ञ में जो पशु का वध है वह कल्याण के लिए पाप का आरम्भ है, ऐसा हमारा विचार है। दूसरों का इससे भिन्न विचार है।
यज्ञे पश्वालम्भः श्रेयसामर्थे पापीयान् आरम्भ इति पश्यामः। अपरेऽत्र विप्रतिपद्यन्ते।

११. जब राजा अपनी प्रजाओं को कर आदि से अत्यन्त पीड़ित करता है तब वे उसके विरुद्ध उठ खड़ी होती हैं।
यदि नृपतिः प्रजाः करादानादिनाऽत्यन्तं कदर्थयति, तदा तास्तस्मिन्नपरज्यन्ते व्युत्तिष्ठन्ते च।

१२. जो दूसरों के धन का लालच करता है वह पतित हो जाता है।
ये परस्वेषु गृध्यन्ति ते पतनमृच्छन्ति।

१३. यह बढ़ई लकड़ी काट रहा है, वह आरे से चीर रहा है और फिर यह तीसरा छीलता जाता है और चौकोन बनाता जाता है।
एष वर्धकिर्वधयति काष्ठम्, असावारया चृतति, अयमपरस्तृतीयस्तक्ष्णोति चतुरस्रं च करोति।

१४. वह बीमार नहीं है, बीमार होने का बहाना करता है।
नहि स आतुरः, आतुरलिङ्गी स भवति।

१५. अब एकान्त बना दिया गया है, अब मैं आपसे अपनी बीती कहता हूँ।
कृतो वीकाशः। सम्प्रति स्वं वृत्तमाचक्षे।

१६. कई एक भिक्षु बालों को नोचते हैं, मैले कुचैले वस्त्र पहनते हैं और बार-बार उपवास करते हैं। इस प्रकार अपने आप को विविध क्लेश देते हैं, इसे वे आवागमन से छूटने का उपाय समझते हैं।
कतिपयभिक्षुकाः केशान् लुञ्चन्ति, मलदूषितानि वसनानि धरन्ति, असकृच्चोपवसन्ति, एवमात्मानं नानाविधं क्लिश्नन्ति, अयमेव संसरणान् मुक्तेरुपाय इति मन्यन्ते।

संकेतः-
३. हिल जाता है = वि+ह्वल् भ्वा. पर.। उखड़ जाता है = उद्+वृत् भ्वा. आ.।
५. यदा कश्चिन्निशाम्यति मित्रं मे मां परोक्षं निन्दति, तदा भृशं दुख्यति = सुख दुःख तत्क्रियायाम् कण्ड्वादिः (तदा जायते नामास्योत्तमा रुक्)
८. ये राजन्या राष्ट्रहितप्रयुक्ताः स्वार्थमनुसन्धाय (प्रयोजनमुद्दिश्य अगृह्यमाणकारणाः) संग्रामयन्ते द्विषतश्च पराणुदन्ते ते नाकं सचन्ते। संग्रामे युद्धे चुरा. आ.।
९. अपनी पढ़ाई की कुछ भी परवाह नहीं = अध्ययनं नाद्रियन्ते। कुमार क्रीडायाम् चुरा.। आक्रीडिनः में ताच्छील्य में णिनि हुआ है।
१०. यज्ञे पश्वालम्भ में श्रेयसामर्थ्ये पापीयानारम्भ इति पश्यामः, अपरेऽत्र विप्रतिपद्यन्ते।
११. तब वे उसके विरुद्ध उठ खड़ी होती हैं = तस्मिन् (तं प्रति) विकुर्वते। वि+कृ यहाँ आत्मनेपद में ही साधु होगा। यहाँ वह अकर्मक है। कदर्थयति = वाघते, उपपीडयति। व्युत्तिष्ठन्ते = प्रकुप्यन्ति। उद्+स्था का अर्थ चेष्टा है अतः आत्मनेपद हुआ, ‘वि’ का अर्थ ‘विरोध’ है।
१२. गृध् तथा लुभ् दोनों अकर्मक हैं।
१३. असावारया = असौ आरया।
१४. नहि स आतुरः, आतुरलिङ्गी स भवति = आतुरतां व्यपदिशति।
१५. कृतं निर्मक्षिकम् (कृतं निःशलाकम्, कृतो वीकाशः)। सम्प्रति स्वं वृत्तमाचक्षे।
१६. नोचते हैं = लुञ्च् भ्वा.। मैले कुचैले = कञ्चराणि, मलदूषितानि, मलिनानि। क्लेश देते हैं = क्लिश्नाति। आवागमन = संसरण।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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