अनुवाद कला (द्वितीय अंश) अभ्यास 5

(लट्)

१. जिसे तू मोमबत्ती समझता है वह चर्बी की बत्ती होती है।
यां सिक्थवर्तिरिति वेत्थ सा वसादशा भवति।

२. नगर के बाहिर मैदान में लोग इकट्ठे हो रहे हैं, कारण कि आज महात्मा गान्धी का जन्मदिन है। अभी थोड़ी देर में पं. जवाहरलाल नेहरू महात्मा जी के चरित्र पर व्याख्यान देंगे।

बहिर्नगरमुपशल्ये जनाः समजन्ति, यतोऽयं महात्मनो गांधिमहोदयस्य जनिदिवसोऽस्ति। अचिरादेव पण्डितजवाहरलालनेहरूमहोदयः महात्मचरितमधिकृत्य प्रवक्ष्यति।

३. जो दुष्टों के साथ मेल करता है, वह गिर जाता है। उसकी बुद्धि उलट जाती है और लोक में उसकी निन्दा होती है।
यो दुर्जनैः सह सम्पृच्यते स च्यवते। बुद्धिस्तस्य विपरिवर्तते निन्द्यते च स लोके।

४. वह प्रायः सूर्य निकलने पीछे उठता है, इसलिए सुस्त और बीमार रहता है। और यह बात भी है कि वह अँधेरी तंग गली में रहता है।
प्रायः स सूर्योदयोत्तरं प्रबुध्यतेऽतोऽलसो रुग्णश्च भवति अन्यच्च स तमोऽवगुण्ठितायां संकटायां च प्रतोलिकायां वसति।

५. वह किसी का भी विश्वास नहीं करता, सदा शङ्कित रहता है। चित्त की शान्ति इसके भाग्य में नहीं।
स न कस्यापि प्रत्ययं याति, शश्वच्च शङ्कते। तेन चेतःस्वास्थ्येऽस्य भागो न।

६. हठी आदमी निन्दा की परवाह नहीं करता, जिस बात को पसन्द कर लेता है, जहाँ अपना चित्त जमा देता है उससे कभी नहीं टलता।
कामवृत्तिर्जनो न वचनीयं गणयति। यदप्यभिनन्दति, यत्रैवाभिनिविशते न कदाचिदपि ततो विचलति।

७. जो लक्ष्मी के पीछे भागता है लक्ष्मी उससे परे भागती है और जो विरक्त महानुभाव इसकी उपेक्षा करता है यह उसके चरणचुम्बन करती है, पर तिरस्कार को प्राप्त होती है।
यो लक्ष्मीमनुव्रजति तं सा परिहरति, ये तु विरक्ताः पुरुषोत्तमास्ताम् उपेक्षन्ते तच्चरणमेषा चुम्बयति।

८. अराजक जनपद में जल में मछलियों की तरह दुर्बलों को अधिक बलवाले खा जाते हैं और समस्त राष्ट्र कर्णधार रहित नौका की तरह नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है।
अराजकजनपदे जले मत्स्यवद् दुर्बला बलिभिरुपभुज्यन्ते समग्रराष्ट्रं च कर्णधाररहितनौरिव विप्लवते।

९. यद्यपि यह बीमारी से क्षीण हो गया है तो भी अब धीरे धीरे ताकत पकड़ रहा है।
रोगेण ग्लानोऽप्यसौ मन्दमन्दमुल्लाघते।

१०. अधिक वर्षा के कारण इस मकान की छत टपकती रहती है जिससे हम बहुत तंग आ गए हैं, सब सामान भीग गया है।
अतिवृष्टेश्छदिरस्य सदनस्य प्रश्च्योतति, येनातङ्कामः। अभिषिक्तश्च सर्वः परिग्रहः।

११. मेरे पेट में गुड़गुड़ हो रही है। कुछ दर्द भी रहती है। कुछ वात का जोर है।
कर्दति में कुक्षिः किंचिद् व्यथते च। वातोऽपि प्रकुप्यति मात्रया।

१२. यह लड़का बागों से निकले हुए घोड़ों की तरह जहाँ चाहता है चला जाता है।
बालोऽयं प्रग्रहमुक्तोऽश्व स्वैरं व्रजति।

१३. वह (सच्चा) विजयी है जिसके वश में शत्रु आसानी से आ जाता है। जो दो में से एक के बचने पर विजयी होता है, वह वस्तुतः हार गया है।
यस्य सिध्यत्ययन्तेन शत्रुः स विजयी नरः। य एकतरतां गत्वा विजयी विजित एव सः।।

१४. मनुष्य अभिन्न हृदय मित्र में जैसे विश्वास करता है वैसे बन्धु अथवा भाई में भी नहीं।
यथा नरा निरन्तरचित्ते सखौ विस्रम्भन्ते न तथा भ्रातुषु बन्धुषु वा।

१५. इस स्त्री के रोग की कोई चिकित्सा नहीं। अब यह नष्ट हुई समझिए। इसका बचाव नहीं हो सकता।
अशक्य उपायो व्याधेरस्याः। विनष्टा नामेयमिति मन्तव्यम्। नास्याः प्रत्यापत्तिरस्ति।

१६. यदि तू मांस खाता है, तुझे इससे कुछ लाभ नहीं, हां शास्त्र का विरोध अवश्य होता है।
यदि मांसमश्नासि, नेदं तवोपकरोति, केवलं शास्त्रमतिचर्यते।

संकेतः-
२. इकट्ठे हो रहे हैं (समजन्ति) = सम् अव् इ, सम् अज् भ्वा. पर.। सम् वृत् भ्वा. आ.। एकी भू। एकत्री भू अत्यन्त भ्रष्ट है। यहाँ च्नि नहीं हो सकता।
३. दुष्टों के साथ मेल करता है = सम् सृज् दिवा. आ.। सम् प्रतुज् दिवा. आ.। सम् गम् भ्वा. आ.। सम् पृच् (कर्म कर्ता अर्थ में)। बुद्धि उलट जाती है = विपरि वृत् भ्वा. आ.। विपरि अस् दिवा. पर.। विपरि इ अदा. पर.।
५. हठी आदमी = कामवृत्ति। निन्दा की = वचनीय नपुं.। परवाह नहीं करता = ईक्ष्, गण्।
६. पसन्द कर लेता है = अभि नन्द् भ्वा. पर.। जहाँ अपना चित्त जमा देता है = यत्रैवाभिनिविशते।
८. नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है = विप्लवते।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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