अनुवाद कला (द्वितीय अंश) अभ्यास 4

(लट्)

१. शब्द नित्य है ऐसा वैयाकरण मानते हैं, पर नैयायिक शब्द को अनित्य मानते हैं। नित्य शब्द को वैयाकरण स्फोट कहते हैं।

शब्दं नित्यमातिष्ठन्ते वैयाकरणाः, तार्किकास्तु शब्दा अनित्या इति प्रतिजानते। वैयाकरणा नित्यं शब्दं ‘स्फोट’ इति व्याहरन्ति।

२. वह दिन प्रतिदिन शिथिल होती जा रही है। न जाने इसे क्या रोग खाए जा रहा है।
साऽनुदिनमङ्गैर्हियते, न जाने केन रोगेण ग्रस्यत इव।

३. तुम्हारा यह कहना संगत नहीं कि बढ़ा हुआ बल संसार में शान्ति का साधन है। ऐसा बल तो श्मशान की ही शान्ति स्थापित कर सकता है।
नैतद् त्वदुक्तं सङ्गच्छते यदुन्नतं बलं संसारे समाधेः साधनं वर्तते, अपि त्वीदृग्बलं श्मशानशान्तिमेव निधातुमर्हति।

४. जब पर और अवर ब्रह्म के दर्शन हो जाते हैं, हृदय की गाँठ खुल जाती है, सारे संशय कट जाते हैं और इस (द्रष्टा) के सब कर्म क्षीण हो जाते हैं।
भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥

५. अँधेरा मानो शरीर से चिपट रहा है और आकाश मानो अञ्चन की वर्षा कर रहा है।
लिम्पतीव तमोऽङ्गानि वर्षतीवाञ्जनं नभः।

६. यह समझ में नहीं आता है कि मनुष्य अपने भाई बन्धुओं के प्रति पाप करने का कैसे साहस करता है। जब हम मनुष्य के अत्याचारों को देखते हैं तो कहना पड़ता है कि मनुष्य अत्यन्त क्रूर है।
इदं हि बुद्धिं नोपारोहति मानवो बन्धुषु भ्रातृषु चैनः समाचरितुं कथं क्रमते। मानवीयानि नृशंसानि वर्तनानि समीक्षामहे यदा तदेदं वक्तव्यं भवति यत् क्रूरतमोऽयं मनुष्यः।

७. जायदाद का विभाग एक बार ही होता है, कन्या (विवाह में) एक बार ही दी जाती है।
सकृदंशो निपतति सकृत्कन्या प्रदीयते।

८. मूर्ख द्वारा अच्छी भूमि पर बोया हुआ बीज फलता फूलता है। धान का समृद्धिशाली होना बोने वाले के गुणों पर निर्भर नहीं है।
चीयते बालिशस्यापि सत्क्षेत्रपतिता कृषिः। न शालेः स्तम्बकरिता वप्तुर्गुणमपेक्षते॥

९. रात को चमकता हुआ चाँद किसे प्यार नहीं, सिवाय कामी और चोर के।
रात्रौ रोचमान इन्दुः कस्य न प्रियोऽत्र कामुकात् कुम्भीलकाच्च।

१०. यदि छात्र को सीखने की इच्छा न हो तो गुरु उसे कुछ भी नहीं सिखा सकता। तुम घोड़े को पानी के पास तो ले जा सकते हो, पर उसे पानी नहीं पिला सकते यदि उसे प्यास न हो।
यद्यनेच्छुश्छात्रश्शिक्षायां तर्ह्यनर्हो गुरुरपि तच्छिक्षायाम्। शक्यमश्वस्य जलान्तिके प्रापणं, परमशक्यमतृषितस्य तस्य जलपानम्।

११. उसकी बुद्धि ऋचाओं में खूब चलती है, पर नव्य न्याय में अटकती है।
क्रमते तस्य बुद्धिऋर्क्षु नव्यन्याये तु प्रतिहन्यते।

१२. वेदान्ती लोग कहते हैं कि माया असम्भव को सम्भव करने में समर्थ है। प्रातिभासिक जगत् का यही कारण है।
“असम्भवस्य सम्भवो मायया शक्यः” इति वेदान्तिनः। इदमेवास्ति निमित्तं प्रातिभासिकस्य जगतः।

१३. वे लोग जितना कमाते हैं उतना ही खा लेते हैं, अन्त में कष्ट पाते हैं।
य उत्पन्नभक्षिणस्तेऽन्तेऽवसीदन्ति।

१४. जब मैं देखता हूँ कि संसारभर में हिंसा उत्तरोत्तर बढ़ रही है तो मुझे संसार की शान्ति की कुछ भी आशा नहीं दिखती।
यदेक्षेऽहं जगत्युत्तरोत्तरं वर्धमानां हिंसां, तदा नाशंसे लौकिकाय शमाय।

१५. ऐसा नहीं होता कि भिखारी हैं इसलिए हाँडी नहीं चढ़ाते, हिरन है इसलिए जौ नहीं बोए जाते।
न हि भिक्षुकाः सन्तीति स्थाल्यो नाधिश्रीयन्ते, नहि मृगाः सन्तीति यवा नोप्यन्ते।

संकेतः-
१. प्रतिज्ञा क्र्याादि. आ., सम्+गृ तुदा. आ., आ+स्था भ्वा. आ.।
२. अस् भ्वा. आ.।
३. संगत नहीं = न संगच्छते।
६. इदं वक्तव्यं भवति कृत्याश्च (अष्टा.३/३/२७२) से तव्य प्रत्यय हुआ।
७. अत्यन्त क्रूर = क्रूरतमः।
१०. इसे प्यास न हो = तृष् दिवा. पर.

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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