अनुवाद कला (द्वितीय अंश) अभ्यास 3

(लट्)

१. तारों को देखकर वह मौनव्रत तोड़ता है।
नक्षत्रं दृष्ट्वा वाचं विसृजति।

२. शेरों की गरज और हाथियों की चिंघाड़ से विन्ध्य का महान् जंगल गूंज रहा है।
कण्ठीरवरवैः करिबृंहितैश्च विन्ध्याटवी प्रतिध्वनति।

३. घर के मूल पुरुष के निःसन्तान मर जाने पर उसकी सम्पत्ति राजा को प्राप्त होती है।
अनपत्ये मूलपुरुषे मृते सति तस्य ऋक्थं राजगामी भवति।

४. भारत में जो दिन रात परिश्रम करते हैं उनको भी दिन में दो बार पेटभर खाने को नहीं मिलता।
येऽपि नाम भारते वर्षे नक्तन्दिवं श्राम्यन्ति तेऽपि दिनस्य द्विरुदरप्रं भोक्तुं न लभन्ते।

५. बेसमझ लोग जहाँ तहाँ थूक देते हैं। दुर्भाग्य से ऐसे लोग भारत में बहुत हैं।
निर्बुद्धयो नरा इतस्ततो निष्ठीव्यन्ति। दौर्भाग्येनैवं जना भारते बहुशो भवन्ति।

६. जो व्यायाम करते हैं वे मोटे नहीं होते और न बीमार होते हैं।
ये व्यायच्छन्ते ते न मेदन्ते, न च रुज्यन्ते।

७. उसे बहुत सबेरे उठने की आदत है। उठते ही वह शौच जाता है। तदनन्तर दातुन कर सैर के लिए निकल जाता है और लौटने पर कुछ विश्राम कर स्नान करता है।
स महति प्रत्यूषे बुध्यते। संजिहान एवावश्यकं करोति, ततो दन्तान् धावित्वा स्वैरविहारं निर्याति। प्रत्यागत्य चेषद् विश्रम्य स्नाति।

८. हे लक्ष्मण देखो चम्पा में परम धार्मिक बगुला धीरे धीरे पग धरता है, इस डर से कि कहीं जीवहत्या न हो जाए।
पश्य लक्ष्मण चम्पायां बकःपरमधार्मिकः। शनैः शनैः पदं धत्ते जीवानां वधशङ्कया॥

९. शरद् ऋतु में धान पक जाता है, काश फूलती है और कमल खिलते हैं और चन्द्रमा भी अनूठी शोभा को धारण करता है।
शरदि शालयः पच्यन्ते, काशः पुष्प्यति, पङ्कजानि च विकसन्ति। सुधासूतिरपि किमपि कामनीयकं धत्ते।

१०. अग्नि कभी इन्धन से तृप्त नहीं होती और समुद्र नदियों से।
नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां नापगानां महोदधिः।

११. जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है वहाँ देवता रमण करते हैं। जिन घरों को तिरस्कृत कुलाङ्गनाएँ शाप देती हैं वे ऐसे नष्ट हो जाते हैं मानो मारी से।
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। जामयो यानि गेहानि शपन्त्यप्रतिपूजिताः। तानि कृत्याहतानीव विनश्यन्ति समन्ततः॥

१२. विदेश को जाते हुए पुत्र के सिर को माता चूमती है और स्नेहभरी आँखों से उसकी ओर एक टक देखती है।
विदेशं प्रति प्रस्थितमात्मजं शिरस्युपजिघ्रत्यम्बा। वीक्षते च तमनुरागिणाऽनिमेषेण च चक्षुषा।

१३. महाराज युधिष्ठिर के अश्वमेध यज्ञ में भगवान् श्रीकृष्ण अतिथियों के चरण धोते हैं और खाना परोसते हैं।
महाराजयुधिष्ठिरस्याऽश्वमेधयागे भगवान् श्रीकृष्णोऽभ्यागतानां चरणं निर्णेनेक्ति भोजनं च परिवेविष्टे।

१४. गरमी की ऋतु में पहर भर का पका हुआ शाक पानी छोड़ देता है और खट्टा हो जाता है, कुछ दुर्गन्ध भी देने लगता है।
शुचौ यातयामः श्राणः शाकः शुच्यति पूयते च कलया।

१५. कुएँ को खोदनेवाला कुएँ की मिट्टी से पहले लिप्त हो जाता है, पीछे वहीं से निकाले हुए जल से शुद्ध हो जाता है। इसी प्रकार अपशब्द को प्रयोग करनेवाला मनुष्य दोष का भागी बनता है। पर अनेक साधु शब्दों के प्रयोग से पवित्र हो जाता है।
कूपखानकः कूपस्य मृदावकीर्णो भवति। सोऽप्सु संजातासु तत एव तं गुणमासादयन्ति। एवमेवापशब्दभाग् दुष्यति, भूयसा च शब्दप्रयोगेण पूयते।

१६. बूढ़ा गाड़ीवान कमजोर बैलों को पैनी से मार मार कर हाँक रहा है। बेचारे को अधिक काम के कारण पसीना आ रहा है।
प्रवयाः प्राजकः प्राजनेनाभिघातमभिघातं मन्दानृषभान् प्राजति। वशकः कार्याधिक्यात् स्विद्यति।

संकेतः-
२. शेरों की गरज = कण्ठीरवरवैः। हाथियों की चिंघाड़ = करिबृंहितैः।
६. ये व्यायच्छन्ति ते न मेदन्ते, न च रुज्यन्ते। रुज सकर्मक (तुदादि) धातु है। अतः यहाँ कर्म कर्ता अर्थ में प्रयोग किया गया है।
७. स नित्यं प्रातस्तरां जागर्ति (स महति प्रत्यूषे बुध्यते) यहाँ लट् ही ‘शील’ को भी कह देता है, अतः “तदस्य शीलम्” कहने में कुछ प्रयोजन नहीं। देखो- इमामुग्रातपवेलां प्रायेण लतावलयवत्सु मालिनीतीरेषु ससखीजना शकुन्तला गमयति (अभिज्ञान शाकुन्तल, तृतीय अङ्क)। संजिहान में अर्थ शय्या के परित्याग का है। यहाँ स्वैरविहारम् द्वितीया भी व्यवहार के अनुकूल है।
१२. विदेशं प्रति प्रस्थितमात्मजं शिरस्युपजिघ्रत्यम्बा = यहाँ आत्मज में द्वितीया और शिरस् में सप्तमी ही शिष्ट व्यवहार के अनुगुण हैं।
१३. चरण धोते हैं = निर्णेनेक्ति (निज्. जुहो. उभय.)। खाना परोसते हैं = परिवेविष्टे (विष्. जुहो. उभय.)।
१५. मनुष्य दोष का भागी बनता है = दुष्यति। पवित्र हो जाता है = पूयते (पू क्र्याादि. उभय.)
१६. प्रवयाः प्राजकः प्राजनेनाभिघातमभिघातं मन्दानृषभान् (ऋषभतरान्) प्राजति। ऋषभतराः = भारवाहने मन्दशक्तयोःनड्वाहः।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *