अनुवाद कला (द्वितीय अंश) अभ्यास 2

(लट्)

१. आज भी शिव हलाहल विष को नहीं छोड़ता, (आज भी) कछुआ पीठ पर पृथ्वी को उठाए हुए है, (आज भी) समुद्र दुस्तर वड़वानल को धारण किए हुए है। पुण्यात्मा जिसे अंगिकार कर लेते हैं, उसे पूरा करते हैं।
अद्यापि नोज्झति हरः किल कालकूटं कूर्मो बिभर्त्ति धरणीं खलु पृष्ठकेन। अम्भोनिधिर्वहति दुर्वहवाडवाग्निमङ्गीकृतं सुकृतिनः परिपालयन्ति।

२. मेंह बरसानेवाला है, अतः स्कूल बन्द हो गया है और विद्यार्थी अपने अपने घरों को जा रहे हैं।
पुरा वर्षति देवः, संवृत्तो विद्यालयः, विद्यार्थिनश्च यथास्वं गृहाणि यान्ति।

३. जो जुआ खेलता है, वह पछताता है। शिष्ट समाज जुए को निन्दा की दृष्टि से देखता है।
यो दीव्यति स परिदेवयते। द्यूतं च गर्हन्ते शिष्टाः।

४. निःसन्देह वह सच्चा नेता है जो ईश्वर से बताए हुए अपने कर्तव्य की पूर्ति में प्राणों की बाजी लगा देता है।
निःसन्देहं स यथार्थनेताऽस्ति, य ईश्वराज्ञापितनियोगानुष्ठाने प्राणानपि पणते।

५. गौएँ पानी पीती हैं और मेंढक टर टर करते जाते हैं।
पिबन्त्येवोदकं गावो मण्डूकेषु रुवत्स्वपि।

६. मैं तुम्हें युद्ध के लिए ललकारता हूँ। अभी बल और अबल का निर्णय होता है।
आह्वये त्वा युधे, बलाबलमत्र निर्णीयते।

७. कई लोग वैराग्य के प्रभाव में आकर छोटी अवस्था में ही संन्यास लेते हैं।
कतिपये जना वैराग्यावेशेनाल्पवयस एव प्रव्रजन्ति।

८. जो पुरुष अपने आप से लज्जित होता है वह सबका गुरु बन जाता है।
य आत्मनापत्रपते भृशं नरः स सर्वलोकस्य गुरुर्भवत्युत।

९. मुनि हथेली में लिए हुए अभिमन्त्रित जल से आचमन करता है।
मुनिः प्रहस्ते प्रगृहीतेनाभिमन्त्रितेनोदकेनाचामति।

१०. नाच न जाने अँगन टेढ़ा।
स्वं कञ्चुकमेव निन्दति प्रायः शुष्कस्तनी नारी।

११. देवदत्त तो यज्ञदत्त का पासंग भी नहीं। कहाँ राजा भोज कहाँ कुबड़ा तेली।
देवदत्तो यज्ञदत्तस्य षोडशीमपि कलां न स्पृशति। क्व भोजराजः क्व च कुब्जस्तैली।

१२. ये भाव जितेन्द्रिय पुरुष पर भी प्रभाव डालते हैं, इसलिए नाच रंग और एकान्त में स्त्रीसंग आदि से परे रहना चाहिए।
अमी भावा यतात्मानमपि स्पृशन्ति। अतो नृतिः, रङ्गो विजने च स्त्रीसंसर्गो वर्जनीयाः।

१३. मुझ पर व्यभिचार का दोष लगाने से मेरे मर्मों पर चोट लगती है और कोई मिथ्या अभियोग इतना दुःख नहीं देता।
अक्षारणा मे मर्माणि स्पृशति, अन्यद् मिथ्याभिशंसनं न तथा तुदति।

१४. मेरी दाईं बाँह फड़कती है, इसका यहाँ कैसे फल हो सकता है।
स्फुरति मे सव्येतरो बाहुः, कुतः फलमिहास्य।

१५. जिसने ज्ञानाग्नि से सब कर्मों को जला दिया है उस पडित को पाप छूता नहीं।
ज्ञानाग्निना दग्धकर्माणं न पण्डितं तं पाप्मा स्पृशति।

१६. एक बड़ा दोष है, मुझे भोजन नहीं पचता है, सुन्दर बिस्तरे पर भी निद्रा नहीं आती।
एकः खलु महान्दोषः। ममाहारः सुष्ठु न परिणमति, सुप्रच्छदनायां शय्यायां निद्रां न लभे।

संकेतः-
२. पुरा वर्षति देवः, संवृत्तो विद्यालयः, विद्यार्थिनश्च यथास्वं गृहाणि यान्ति। (यथायथं गृहानभिवर्तन्ते) यहाँ ‘पुरा’ के योग में निकट भविष्यत् के अर्थ में लट् का प्रयोग हुआ है। यावत्पुरानिपातयोर्लट्
३. जुए को निन्दा = द्या, देवन, दुरादर-नपुं.। यो दीव्यति स परिदेवयते। द्यूतं च (देवनं च) गर्हन्ते शिष्टाः। यहाँ शिष्टसमाजः कहने की रीति नहीं। हां, शिष्टलोकः शिष्टजनः कह सकते हैं।
४. अपने कर्तव्य की पूर्ति में प्राणों की बाजी लगा देता है = नियोगानुष्ठाने प्राणानपि पणते।
११. देवदत्तो यज्ञदत्तस्य षोडशीमपि कलां न स्पृशति। (देवदत्तो यज्ञदत्तस्य पादभागमपि न भवति)।
१५. उस पडित को पाप छूता नहीं = न पण्डितं तं पाप्मा स्पृशति।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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