अनुवाद कला (द्वितीय अंश) अभ्यास 14

(लङ् लकार)

१. नौकर को सारी रात जागना पड़ा कारण कि नगर में अफवाह फैल गई थी कि बाहर से चोर आए हुए हैं।
नियोज्यः सर्वरात्रमवशमजागः, नगरे ह्यप्रथत प्रवादो बाह्यतश्चौराः समागता इति।

२. इस निर्धन मनुष्य को अपनी सम्पत्ति वापस लेने के लिए बहुत कष्टों का सामना करना पड़ा। वर्षों के पीछे उसका यत्न सफल हुआ।
दरिद्रोऽयं जनः स्वं रिक्थं प्रत्यापत्तुं बहुनि कृच्छ्राण्यन्वभवत्। वर्षेषु तदीयो यत्नोऽफलत्।

३. नटखट बालक ने मधुमक्खियों के छत्ते को हाथ लगाया ही था, कि मक्खियों ने उसे डंक मार मार कर व्याकुल कर दिया।
चपलो बालः क्षौद्रपटलं यावदेवास्पृशत् तावदेव स मधुमक्षिकाभिर्दंशैर्व्याकुलीकृतः।

४. वर्षा का होना था कि चारों ओर मेंढक टर्राने लगे।
वृष्टिमात्रे देवेऽभितः प्रारटन् भेकाः।

५. वह घोड़ा जिसे साईस सिधा रहा था उसके हाथ से छूट गया और भाग निकला।
यमश्वमश्वपालो व्यनयत्स वल्गाभ्यो निरमुच्यत दिशश्चाभजत।

६. कल अधिक ठण्ड के कारण मुझे बहुत अधिक जुकाम हो गया। और थोड़ा सा ज्वर भी। सारा दिन सिर चकराता रहा।
ह्योऽतिशैत्याद् अतितरां प्रतिशीनोऽभवम्। इषच्चाज्वरम्। आदिनं शिरोभ्रमिर्जायते स्म।

७. कुत्ते एक हड्डी पर लड़ पड़े और उन्होंने एक दूसरे को खूब घायल किया।
श्वानोऽस्थिशकलेऽकलहायन्त, अन्योऽन्यञ्च गर्हितमक्षिण्वन्।

८. जब मैंने देखा कि ठेकेदार अपनी प्रतिज्ञा से फिर रहा है तो मैंने उसे बहुत फटकारा।
यदाहमजानां कृतसंविज्जनो वितथप्रतिज्ञोऽभवदिति, तदाहं तं बलवद् उपालभे।

९. रायसाहिब लाला लक्ष्मणदास ने अपनी स्थिर व अस्थिर सम्पत्ति को एक ट्रस्ट के अधीन कर दिया और अपने उच्छृङ्खल लड़कों को जायदाद में कुछ भी भाग नहीं दिया।
राजमान्यः श्रीलक्ष्मणदासो निजं स्थावरं जङ्गमं च वस्तुनिवहं न्याससमितौ समार्पयत् सुतांश्चोद्वृत्तान्दायाद्ये निरभजत्।

१०. जब दीपक का तेल समाप्त हो गया तो वह बुझ गया।
स्नेहक्षये निरवाद्दीपः।

११. जब चोर ने देखा कि घर का स्वामी जाग उठा है तो वह दुम दबाकर भाग गया।
यदैकागारिको गृहपतिं जागरितमपश्यत्तदा भीतवत् सहसापाक्रामत्।

१२. मूसलाधार वर्षा होने के कारण मैं घर से शीघ्र नहीं चल सका और कालेज मेंं आध घण्टा लेट पहुँचा।
धारासारैरवर्षद् देव इति नाहमाशीयो गेहात् प्रयातुमुदसहे।

१३. इस वृद्ध मनुष्य के जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव आ चुके हैं। इससे हम बहुत कुछ सीख सकते हैं।
एष स्थविरो बहुशः समृद्धिं व्यृद्धिं चाश्नुत। अर्होऽयमस्मान् बहूवदेष्टुम्।

१४. कल मैं सौभाग्यवश बाल बाल बचा। मेरे दाएँ पाँव के पास से साँप सरकता हुआ निकल गया।
ह्योऽहं दैवानुग्रहेण कथं कथमपि जीवितसंशयादमुच्ये। पादोदरो मत्पादान्तिकादत्यसर्पत्।

१५. डाकुओं को फाँसी की आज्ञा हुई।
लुण्टाका उद्बध्य मार्यन्तामित्यादिशन्नधिकृताः।

१६. कपड़ा सस्ता हो गया है, पर सोने का भाव बढ़ रहा है।
पटोऽर्घतोऽपतत् स्वर्णं त्वर्घति।

१७. ज्योंहि परदा उठा, उपस्थित लोगों ने हर्ष से तालियाँ बजाईं और सारा हॉल गँूज उठा।
यदैव प्रतिसीरा संहृता, तदैवोपस्थिताः सहर्षं तालानददुः। आस्थानी च प्राणदत्।

संकेतः-
१. सर्वरात्रमवशमजागः = कृत्स्नां निशां जागरामकरोत् (प्रजागरमसेवत)।
६. बहुत अधिक जुकाम हो गया = अतितरां प्रतिशीनोऽभवम्।
९. अपनी स्थिर व अस्थिर सम्पत्ति को = निजं स्थावरं जङ्गमं च वस्तुनिवहम्, निजां स्थिरामस्थिराञ्च सम्पदं, स्थास्नु चरिष्णु चार्थजातम्।
११. तदा भीतवत् सहसापाक्रामत् = तदा भीतवत् तेनापवाहित आत्मा।
१३. एष स्थविरो बहुशः समृद्धिं व्यृद्धिं चाश्नुत = अयं जरठो वाराननेकान् पतनसमुच्छ्रायौ समवेत्)
१७. परदा = तिरस्करणी, जवनिका, (यवनिका)-स्त्री। उठा = संहृता। तालियाँ = तालानददुः।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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