अनुवाद कला (द्वितीय अंश) अभ्यास 13

(लङ् लकार)

१. मेले में इतनी भीड़ थी, कि दम घुटा जाता था। कई एक बच्चे और बूढ़े कुचले गए और बीसियों स्त्रियाँ बेहोश हो गईं।
मेलके एतावाञ्जनसंबाधोऽभवद् यच्छ्वसितुमपि नालभ्यत। अनेके बालाः वृद्धाश्चावामृद्यन्त परा गगगविंशतिश्च स्त्रियो निश्चेतना अजायन्त।

२. मैं उसकी बात को सुनकर हँसे बिना न रह सका।
तद्वचो निशम्य हासं नियन्तुं नापारयन्।

३. उसके दाहिने गिट्टे में मोच आ गई।
दक्षिणस्तस्य गुल्फोऽभिहतसन्धिरभवत्।

४. मेरी बाँह उतर गई है, और मुझे असह्य वेदना हो रही है।
मम भुजा विसंहिता, असह्याञ्च वेदनामन्वभवम्।

५. उसके सम्बन्धियों ने उस पर कलंक का टीका लगाने में कुछ उठा न रक्खा। पर उसने अपने कुल की लाज बचा ली।
तत्सगन्धास्तं दूषयितुं सर्वात्मना प्रायस्यन्। परं तेन रक्षितं कुलयशः।

६. हत्यारे ने बच्चे का गला घोंटकर उसे मार डाला। और उसके भूषण उतारकर चम्पत हो गया।
जाल्मः शिशोः कण्ठं निपीड्य श्वासञ्च निरुध्य तं व्यापादयत्। तदाभरणानि चादाय पलायत।

७. पहलवानों ने लँगोट कस लिए और अखाड़े में उतर पड़े और चिर तक कुश्ती लड़ते रहे।
बद्धपरिकरा मल्ला अक्षवाटमवातरन् चिरं च नियुद्धमयुध्यन्त।

८. अन्त में अंग्रेजों की भेद-नीति का जादू चल गया और देश के कोने कोने से मुसलमानों ने विभाजन की मांग की, जिसके परिणामस्वरूप कांग्रेस को विभाजन स्वीकार करना पड़ा।
अन्ततः आङ्ग्लानां भेदनीतिरूपा माया फलिता देशस्य च कोणतो यवनैर्विभाजनाय याञ्चा कृता। तत्फलस्वरूपेण कांग्रेसपक्षस्य विभाजनस्वीकारेऽगतिकता जाता।

९. बालक बैलगाड़ी के नीचे आकर मर गया, जिसपर पुलिस ने गाड़ीवान को पकड़ लिया।
कम्बलिवाह्यकेनाक्रान्तोऽर्भक उपारमत्। ततो रक्षकैः शाकटिको निरुद्धः।

१०. उस राजा ने पासवाले देश पर कई आक्रमण किए, पर वह हर बार पराजित हुआ।
स भूपतिरुपान्तवर्त्तिनं नीवृतमसकृदवास्कन्दत्, परं प्रतिवारं पराभवत्।

११. जिस सन्दूक का ढक्कन टूट गया था, उसकी सब चीजें चूहों ने कुतर डालीं।
यस्य समुद्गकस्य पिधानमभज्यत, तस्य सर्वानर्थानाखवो न्यकृन्तन्।

१२. वह इस प्रकार जोर से रोने लगा, मानों उसे बहुत अधिक दर्द हो।
स तथोच्चैः प्रारोदत्, यथासौ महत्या पीड्याा ग्रस्त इवासीत्।

१३. प्रताप ने लड़ते-लड़ते मर जाना ठीक समझा, पर अकबर की अधीनता स्वीकार न की।
प्रतापोऽकबरेण समम् आयोधनेनात्मनो निधनं वरमपश्यत्, न पुनस्तदायत्तताम्।

१४. तुम्हें इस दुकान से लेन-देन बन्द किए कितना समय हुआ?
अद्य कियान् कालोऽनेनापणेन संव्यवहारं त्यक्तवतस्ते।

संकेतः-
४. भुज और बाहु दोनों ही पुंल्लिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग हैं। स्त्रीवत्विवक्षा में टाप् होने पर भुजा रूप होगा।
५. कलंक का टीका लगाने में = तं दूषयितुम्। कुछ उठा न रक्खा = सर्वात्मना प्रायस्यन्। कुल की लाज बचा ली = रक्षितं कुलयशः।
७. बद्धपरिकरा मल्ला अक्षवाटमवातरन् चिरं च नियुध्यमयुध्यन्त = यहाँ ‘नियुद्ध’ युद्धविशेष है, युद्ध सामान्य नहीं। अतः समानधातु से बने हुए क्रियापद के होने पर ‘कर्म’ का प्रयोग निर्दोष है।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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