अनुवाद कला (द्वितीय अंश) अभ्यास 12

(लङ् लकार)

१. यदि इस किले के सिपाही दो महिने और डटे रह सकते थे, तो उन्हें भोजन सामग्री क्यों न भेजी गई?
अस्य दुर्गस्य योद्धारश्चेन्मासद्वयं रणेऽभिमुखं स्थातुं समर्था आसन्, तदा भोज्यपदार्थास्तेभ्य कथं न प्राहीयन्त?

२. प्राचीन काल में तक्षशिला विश्वविद्यालय में दूर दूर के देशों के नवयुवक विद्या प्राप्त करने आते थे और अनेक विद्याओं, कलाओं और शिल्पों में सुशिक्षित किए जाते थे।
पुरा तक्षशिलाविश्वविद्यालये दूरेत्यदेशेभ्यो नवयुवका विद्याप्तये आयन्ति स्म, अनेकासु विद्यासु कलासु शिल्पेषु च सुशिक्षिताः क्रियन्ते स्म।

३. उसे तो इतना भी ज्ञान न था कि दो और दो चार होते हैं, इसलिए सर्वत्र धोखा खाता था और अनादर पाता था।
स नेदमपि व्यजानाद् द्वे च द्वे च पिण्डिते चत्वारि भवन्तीति। अतः सर्वत्र प्रातार्यतावाज्ञायत च।

४. जब उसे पता लगा कि उसने मुकद्दमा जीत लिया है, तब उसने अपने मित्रों में मिठाई बाँटी।
यदा सोऽवेत् तेनाभियोगो जित इति तदा वयस्येभ्यो मिष्टमवण्टत्।

५. जब अभियुक्त ने देखा कि उसके सम्बन्धियों ने मुकद्दमा चलाने के लिए वकील कर लिए है तो उसने दोषी होना अस्वीकार कर दिया।
यदाभियुक्तः प्रैक्षत, यन्मे सगन्धैर्व्यवहारे मत्पक्षं भाषितुं व्याभाषको नियुक्तस्तदा स स्वस्यापराद्धताम् अपालपत्।

६. जब हमने सुना कि हमारी उसने झूठी शिकायत की है तो हमने उससे बदला लेने की ठान ली।
यदा वयमशृण्म तेनास्मानुद्दिश्यान्यथैव सविलापं विज्ञापिताः, तदास्य प्रत्यपकर्त्तव्यमिति नो धीरजायत।

७. जब साहूकार ने देखा कि उधार लेनेवाला टालमटोल कर रहा है तो उसने दावा कर दिया।
यदा वार्धुषिको व्यजानात्, यदधमर्णो वाचो भङ्ग्योद्धारशोधनं परिहरतीति तदा स तं राजकुले न्यवेदयत्।

८. क्या नाविक ने इन मनुष्यों को इस मगरमच्छ वाली नदी को तैरकर पार करने से नहीं रोका था?
किं कैवर्त एतान् मानवान् तरणेन समकराया निम्नगायाः पारगमनान्न न्यवारयत्?

९. अध्यापक ने पूछा गंगा यमुना में मिलती है, या यमुना गंगा में। एक चतुर विद्यार्थी ने उत्तर दिया कि चूँकि मिलने के पश्चात् गंगा नाम शेष रहता है अतः यमुना गंगा से मिलती है।
अध्यापकोऽप्रश्नयत् किं गङ्गा यमुनया संगच्छते यमुना वा गङ्गयेति। पटुश्छात्र एकोऽवोचत्, यतोहि संगमानन्तरं गङ्गेत्येव नामावशिष्यते, ततो यमुनैव गङ्गया संगच्छते।

१०. उसने मुझसे अगले सोमवार तक रुपया लौटा देने का प्रण किया था पर पूरा नहीं किया।
स आगामिनं सोमवासरं यावद् धनप्रत्यर्पणं मे प्रत्यशृणोन्न च प्रतिश्रवमरक्षत्।

११. इस दूकानदार ने मेरे तीन पैसे मार लिए और आगे के लिए उस पर मेरा विश्वास उठ गया।
एष आपणिको मां पणत्रयाद् अवञ्चयत्, भाविने च मम तद्विषयः प्रत्ययभङ्गोऽभवत्।

संकेतः-
१. डटे रह सकते थे = प्रत्यवस्थातुमपारयन्। क्यों न भेजी गई? = प्र हि प्रस्था ण्यन्त, प्र इष् ण्यन्त।
४. मित्रों में = मित्रेभ्यः, वयस्येभ्यः (चतुर्थी)।
८. किं कैवर्त … न्यवारयत्? यहाँ “नदीं तीर्त्वा समुत्तरितुं न न्यवारयत्” यह वाक्य दुष्ट है ‘नदी’ यहाँ द्वितीया के प्रयोग से तीर्त्वा का अर्थ पार ही लिया जाएगा। दूसरे यहाँ ‘तुमुँन्’ का प्रयोग भी नहीं हो सकता क्योंकि यहाँ न्यवारयत् का कर्ता भिन्न है।
१०. प्रण = प्रतिज्ञा-स्त्री, प्रतिश्रव, संगर-पुं., प्रति ज्ञा, श्रु, आ श्रु।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *