अनुवाद कला (द्वितीय अंश) अभ्यास 10

(लङ् लकार)

१. शिव के धनुष को झुकाकर राम ने जनक की पुत्री सीता से विवाह किया (लङ् लकार)। उसी समय भरत लक्ष्मण और शत्रुघ्न का माण्डवी ऊर्मिला और श्रुतकीर्ति से विधिपूर्वक विवाह हुआ।
शाङ्करं धनुरानमय्य रामो जनकात्मजां सीतां पर्यणयत्। तदैव भरतो लक्ष्मणश्शत्रुघ्नश्च माण्डवीमुर्मिलां श्रुतकीर्तिं च यथाविध्युदवहन्।

२. विदेश को जाता हुआ वह अपने मित्रों से अच्छी तरह से गले लगाकर मिला।
विदेशं प्रस्थितोऽसौ निर्भरं सुहृदः कण्ठे आश्लिष्यत्।

३. न्यायाधीश ने मुकद्दमे पर खूब विचार करके अभियुक्त पुरुषों को छः (६) वर्ष की कैद का दण्ड दिया।
अभियोगं पर्याप्तं विमृश्याधिकरणिकोऽभियुक्तानां षडब्दान् कारावासमादिशत्।

४. देवताओं और राक्षसों में परस्पर स्पर्धा थी, और वे प्रायः एक दूसरे से लड़ा करते थे।
देवानसुरा अस्पर्धन्त, प्रायश्चायुध्यन्त।

५. पुराने क्षत्रिय पीड़ितों के रक्षा के लिए सशस्त्र सदा तैयार रहते थे पर निर्दोष पर हाथ नहीं उठाते थे।
पूर्वे क्षत्रियाः आर्तरक्षायै शश्वदुदायुधा आसन्। परं न कदापि निर्दोषं प्रहर्तुकामाः अभवन्।

६. कुमार को इन्द्र की सेना का नायक नियुक्त किया गया।
कुमार इन्द्रानीकस्याग्रणीपदे न्ययुज्यत।

७. उन्होंने यश का लोभ किया, पर वे इसे प्राप्त न कर सके।
यशसि तेऽलुभ्यन्, परं तन्नाप्नुवन्।

८. उन्होंने दूसरों की सम्पत्ति को लोभ की दृष्टि से देखा और वे पाप के भागी बने।
ते परकीयां सम्पदमभ्यधायन्, पापभाजश्चाभवन्।

९. उन्होंने कितनी ही चीजें मोल लीं, और उन्हें अधिक मोल पर बेच दिया और पचास रुपए लाभ उठाया।
तेऽनेकानि वस्तून्यक्रीणन्, तानि च बहुशो मुल्येन व्यक्रीणत, रुप्यकाणां च पञ्चाशतो लाभं प्राप्नुवन्।

१०. उन्होंने घोड़े को कीले से बाँध दिया और वे विश्राम करने चले गए। पीछे घोड़ा रस्से को तोड़कर दौड़ गया।
ते कीलकेऽश्वं बद्ध्वा विश्रमितुमयुः। पृष्ठतोऽश्वः सन्दानम् आच्छिद्याधोरत्।

११. साधुओं की संगति से उनके सब पाप धोए गए।
सर्वे तेषां पाप्मानोऽपूयन्त सद्भिः सङ्गेन।

१२. धीरे धीरे हम बूढ़े हो गए, और हमारी शक्तियाँ क्षीण हो गईं।
क्रमेणाजीर्याम करणवैकल्यं चायाम।

१३. हिन्दुओं ने शूद्रों का चिर तक तिरस्कार किया जिसका परिणाम यह हुआ कि बहुत से शूद्र ख्रिस्तमतावलम्बी हो गए।
आर्या एकजातीन् चिररात्रम् अवाक्षिपन्। तस्येयं परिणतिर्यद् बहव एकजातयः ख्रिस्तमतमूर्यकुर्वन्।

१४. घर जाते समय अचानक मैं उससे मार्ग में मिला।
यदृच्छया गृहं गच्छंस्तेनाहं मार्गेऽमिलम्।

१५. इन्होंने मुझे वह स्थान छोड़ने को विवश किया।
ते मां बलादिमं प्रदेशमत्याजयन्।

१६. उसने मुझे वैद्यक पढ़ने के लिए प्रेरित किया, मैं उसका कृतज्ञ हूँ।
स वैद्यकाध्ययनाय मां प्राचोदयत्। तस्याहं कृतविदस्मि।

१७. हमने ऋषि से नम्र निवेदन किया कि आप हमें धर्म का व्याख्यान करें।
तत्र भवन्तोऽस्मान् धर्मं व्याख्यायुरित्येवं व्यज्ञापयाम ऋषीन्।

१८. उन्होंने वीरता दिखाई और शत्रु को हरा दिया।
ते पराक्रमन्त द्विषतश्च पराजयन्त।

१९. यदि तुम आसानी से परीक्षा में उत्तीर्ण हो सकते थे तो तुमने शिक्षक क्यों रखा?
यदि त्वया परीक्षा सहेलं शक्योत्तरीतुं तर्हि किमर्थं शिक्षकमयुङ्क्थाः?

२०. यदि वह सारा का सारा रुपया दे सकता था, तो उसने दीवाला क्यों दे दिया?
यदि सक्षमोऽयमासीत् सकलर्णस्यपाकरणे, निर्धनत्वं कथमुदघोषयत्?

संकेतः-
१. शिव = शिव, शङ्कर, पिनाकिन्, कपर्दिन् धूर्जटि, त्रिपुरारि-पुं.। धनुष = धनुष, चाप, कोदण्ड, कामुक, शरासन-नपुं., चाप-पुं.। विवाह = उद्+वह, परि+नी, उप+यम, हस्ते कृ।
२. अच्छी तरह से गले लगाकर मिला = पीडितं पर्यष्वजत पर्यरमत, आश्लिष्यत्, उपागूहत् मित्राणि। सुहृदः = द्वितीया बहुवचन।
४. अस्पर्धयन्त = स्पर्ध् धातु सकर्मक और अकर्मक भी है दोनों प्रकार के शिष्ट प्रयोग देखे जाते हैं।
५. पीडित = आर्त। सशस्त्र सदा तैयार रहते थे = शश्वदुदायुधा आसन्।
८. दूसरों की सम्पत्ति को लोभ की दृष्टि से देखा = परकीयां सम्पदमभ्यध्यायन्। और वे पाप के भागी बने = अपतन् पापे भागिनोऽभवन्।
१३. शूद्रों = एकजाति, वृषल-पुं.। तिरस्कार = अवज्ञा पर., अव+क्षिप् उ., अव+धीर् उ.।
१४. यदृच्छया गृहं गच्छंस्तेनाहं मार्गेऽमिलम् = यह स्मरण रखना चाहिए कि मिल् अकर्मक है, अतः तमहममिलम् अशुद्ध है।
१५. ते मां बलादिमं प्रदेशमत्याजयन् = ण्यन्त त्याजि और ग्राहि धातुओं की द्विकर्मकता भी शिष्टसम्मत है। “प्रदेशं त्यक्तुमबाधन्त माम्” यह संस्कारहीन होने के कारण त्याज्य है।
१६. स वैद्यकाध्ययनाय मां प्राचोदयत् = यहाँ ‘वैद्यकमध्येतुम्’ अशुद्ध होगा।
१७. नम्र निवेदन किया = वि+ज्ञप्। धर्म का व्याख्यान = अनु+शास्, वि+आख्या, वि+आकृ।
१८. द्विषतश्च पराजयन्त = यहाँ उपपराभ्याम् से उत्साह अर्थ में आत्मनेपद हुआ है।
२०. दीवाला क्यों दे दिया? = ऋणशोधनाक्षमतां किमिति राजद्वारे न्यवेदयत्?, निर्धनत्वं कथमुदघोषयत्?, अकिंचनत्वं किमिति व्यानक्? (वि+अञ्ज्-लङ्)।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद सुश्री दीक्षा (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर ”, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *