अनुवाद कला (प्रथम अंश) अभ्यास २

१. देवापि , शन्तनु और वाल्हीक ये प्रतीक के पुत्र थे |
= देवापि: शन्तनु: वाल्हीकश्च प्रातीका: आसन् |

२. कर्ण और अश्वथामा पाण्डवों के जानी दुश्मन थे |
= कर्ण: अश्वथामा च पाण्डवानां प्राणद्रुहौ दुर्हृदौ आस्ताम् |

३. अच्छा यहि ठहरा कि राम श्याम और में अपना झगडा गुरुजी के सामने रख देंगे |
= इदं तावद् व्यवस्थितं राम: श्यामोsहं च विवादपदं गुरवे निवेदयिष्याम: |

४. तुम ने और तुम्हारे भाई ने परिश्रम से धन कमाया और योग्य व्यक्तियों को दिया |
= त्वं त्वदीयश्च भ्राता परिश्रमेण धनम् आर्जयतं पात्रेषु च प्रत्यपादयतम् |

५. तू और मैं इस कार्य को मिलकर कर सकते हैं , विष्णुमित्र और यज्ञदत्त नहीं |
=त्वमहं च इदं कार्यं सम्भूय कर्तुमर्हाव:, विष्णुमित्र: यज्ञदत्तश्च न |

६. न तुझे और न मुझे भविष्यत् का ज्ञान है , क्योंकि हमें आर्षदर्शन प्राप्त नहीं है |
= न त्वमायतिं प्रजानासि न चाहं न हि आवयो: आर्षं दर्शनं समस्ति |

७. न तुम और न ही तुम्हारा भाई जानता है कि स्वाध्याय में प्रमाद हानि करता है |
= न त्वं प्रजानासि न तव भ्राता यद् स्वाध्याये प्रमाद: रेषति |

८. इस समय न राजा और न ही प्रजा प्रसन्न दीखते हैं , कारण कि सभी कर्तव्य से विचलित हो रहें हैं |
= एतर्हि न च राज्ञा न च प्रजया प्रसीद्यते यतो हि सर्वैः कर्तव्याद् विचल्यते |

९. इस दुश्चेष्टित का तुम्हें और उन्हें उत्तर देना होगा |
= त्वं वा ते वा दुश्चेष्टितम् इदम् अनुयोज्या: सन्ति |

१०. बहू और सास की खटपती रहती है , इसलिये घर में शान्ति नहीं |
= वधू: श्वश्रूश्च नित्यं कलहायेते अत: गेहे शान्तिर्न गाहते |

११. यह बल का काम या तो भीम कर सकता है या अर्जुन ; कोई और नहीं |
= अस्मिन् बलकार्ये भीम: समर्थ: अर्जुनो वा नेतर: |

१२. कहा नहीं जाता कि मैं उन्हें जीतू अथवा वे मुझे जीते |
= न कथ्यते यद् अहं वा तन जयेयं वा ते माम् |

१३. मैं जानता हूँ या ईश्वर जानता है कि मैंने तुम्हे धोखा देने की चेष्टा नहीं की |
= अहं जाने ईश्वरो वा यद् अहं त्वां वञ्चयितुं नाचेष्टे |

१४. देवदत्त ने या उसके साथियों ने कल यह ऊधम मचाया था |
= देवदत्तो वा तत्सहाचरा वा ह्य: इमम् उद्धमम् आचरन् |

१५. भूमि पर पडे हुए उस महानुभाव के शरीर को न कान्ति छोडती है , न प्राण , न तेज और न पराक्रम |
= भूमौ पतितं तस्य महानुभावस्य शरीरं न कान्ति: जहाति न प्राणा: न तेज: न च पराक्रम: |

संकेत :-
यहाँ ऐसे वाक्य दिये गये हैं जिनमें एक ही क्रिया के अनेक कर्ता हैं-युष्मद्, अस्मद् और इनसे भिन्न राम, श्याम, यद् तद् आदि। कर्ताओं के अनेक होने से क्रियापद से बहुवचन तो सिद्ध ही है। पुरुष की व्यवस्था करनी है। कर्ताओं में से यदि एक अस्मद् हो तो क्रिया से उत्तम पुरुष होगा, यदि अस्मद् न हो और युष्मद् हो तो मध्यमपुरुष होगा, राम, श्याम, यद् तद् के अनुसार प्रथमपुरुष नहीं। जैसे-इदं तावद् व्यवस्थितं रामः श्यामोऽहं च विवादपदं निर्णयाय गुरवे निवेदयिष्यामः । इस (अभ्यास के सातवें) वाक्य में अस्मद् के अनुसार ही क्रिया से उत्तम पुरुष हुआ। इसी प्रकार चौथे वाक्य में युष्मद् के अनुसार क्रिया से मध्यम पुरुष होगा-त्वं च भ्राता च परिश्रमेणार्थमार्जयतं पात्रेषु च प्रत्यपादयतम्।
१. प्रातीपाः।
२. अश्वत्थामन् नकारान्त है; प्राणद्रुहौ दुहृदौ।
५. संभूय।
६. न त्वमायतिं प्रजानासि न चाहम् न ह्यावयोरार्ष दर्शनं समस्ति (सम्-अस्ति)। ऐसे वाक्यों में कुछ विशेष वक्तव्य नहीं। यहाँ दोनों वाक्य नर्ञ्थक (निषेधार्थक) हैं। पहले में कर्ता के अनुसार क्रियापद दे दिया जाता है और दूसरे में नहीं। वह गम्यमान होता है। वक्ता संक्षेप-रुचि होने से उसे नहीं कहता। विवक्षितार्थ का स्पष्ट बोध होने से वह अधिक पद सा प्रतीत होता है। इसलिये भी उसे छोड़ देने की ही शैली है।
७. हिनस्ति, रेषति।
९. त्वं वा ते वा दुश्चेष्टितमिदमनुयोज्याः सन्ति। इसको यों भी कह सकते हैं-त्वं वा दुश्चेष्टितमिदनुयोज्योऽसि ते वा। निष्कर्ष यह है कि विकल्पार्थक वाक्यों में चाहे पूर्व वाक्य में क्रियापद रखें चाहे उत्तर वाक्य में वाग्व्यवहार में किञ्चित् भी क्षति नहीं होती। जहाँ क्रिया पद होगा वहीं के कर्ता के अनुसार पुरुष और वचन होंगे।
१०. वधू, स्नुषा; श्वश्रू; नित्यं कलहायेते; निकेतन, निवेशन, शरण, सदन, गृह, गेह-नपुं.।
१३. वञ्चयितुम्, प्रतारयितुम्, अतिसन्धातुम्, विप्रलब्धुम् ।
१४. दृदेवदत्तो वा तत्सहाया (सहचराः) वा ह्य इममुद्धममाचरन् ।

अनुवाद कला मूल लेखक: आचार्य चारुदेव शास्त्री
अनुवाद डॉ. शीतल जी पोकार (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, रोजड़, गुजरात)
टंकन प्रस्तुति: ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर“, आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद तेलंगाना।

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