अनंत लक्ष्मण कान्हेरे

19 अप्रैल अनंत लक्ष्मण कान्हेरे का बलिदान दिवस है, जिन्होंने नासिक के क्रूर कलेक्टर जैक्सन को मौत के घाट उतार डाला था और जो नासिक और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है। अनंत कान्हेरे का जन्म महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के खेड़ तालुका के ब्राह्मणवाड़ी पोस्ट के अयानी गाँव में हुया था। अनंत के परिवार में माता पिता के अलावा दो भाई और दो बहनें थीं। उनकी प्राथमिक शिक्षा निज़ामाबाद से और अंग्रेजी शिक्षा औरंगाबाद से हुयी। बचपन से उन्हें पढने लिखने का इतना शौक था कि अपनी किशोरावस्था में ही उन्होंने ‘मित्र प्रेम’ नामक उपन्यास की रचना कर डाली जो इस आयु में उनकी मित्रता की पृष्ठभूमि में रचा गया था।

औरंगाबाद में शुरूआत में तो अनन्त अपने चाचा के साथ रहे पर बाद में गंगाराम मारवाड़ी नामक एक व्यक्ति के मकान में किराए पर रहने लगे। इस दौरान अनंत देश को स्वतंत्रता दिलाने के उद्देश्य से गठित विभिन्न गुप्त क्रांतिकारी संगठनों के सदस्यों के संपर्क में आये और उनके उद्देश्यों, निष्ठा और कार्यों से अत्यंत प्रभावित हुये। मदनलाल धींगरा द्वारा कर्जन वायली की हत्या की घटना ने उन्हें अत्यंत प्रभावित किया और वो भी ऐसे ही किसी क्रूर अधिकारी को मार लोगों को जागरूक करने का स्वप्न देखने लगे।

उस समय भारत और विशेषकर महाराष्ट्र का वातावरण ब्रिटिश विरोधी भावनाओं से ओतप्रोत था और नासिक जिला इन सबमें अग्रणी था। सावरकर बंधुओं द्वारा गठित अभिनव भारत ने नासिक के युवाओं में राष्ट्र के लिए सर्वस्व समर्पण करने की भावना कूट कूट कर भर दी थी। वीर सावरकर के बड़े भाई बाबाराव सावरकर की प्रेरणा से नासिक में और इसके आस पास के क्षेत्रों में कई छोटे छोटे विप्लवी संगठन कार्य कर रहे थे। इन्हीं में से एक था कृष्णजी गोपाल कर्वे उपाख्य अन्ना कर्वे द्वारा गठित गुप्त संगठन। अन्ना कर्वे नासिक के एक युवा अधिवक्ता थे जो मातृभूमि के लिए कुछ कर गुजरना चाहते थे और उन्होंने पंचवटी, नासिक के एक अंग्रेजी माध्यम विद्यालय के अध्यापक विनायक नारायण देशपांडे के साथ मिलकर इस गुप्त समिति का गठन किया था।

गंगराम मारवाड़ी भी ऐसे कुछ एक संगठनों से जुडा था और अनंत के मन की बात को भी जानता था। इसलिए अनंत को परखने के लिए उसने एक बार लोहे की तपती गर्म छड और एक बार बहुत देर से जल रहे लैम्प के शीशे को अनंत के हाथों में रख दिया पर अनंत ने उफ़ तक नहीं किया। इससे प्रभावित गंगाराम ने अनंत को कई संगठनों के सदस्यों से मिलाया पर अनंत को सबसे अधिक प्रभावित किया अन्ना जी कर्वे और उनकी समिति ने।

नासिक का अंग्रेज कलेक्टर जैक्सन इन सब गतिविधियों से वाकिफ था। और अधिक जानकारी एकत्र करने के उद्देश्य से वह भारतीयों से खूब मिला जुला करता था और दूसरे अधिकारीयों के इतर उसने अपनी ये छवि बना ली थी कि वो एक निष्पक्ष, सहृदय और दयालु अधिकारी है जो भारतीयों को गुलामों की तरह से नहीं देखता। वह सबसे यही कहता कि वह पूर्व जन्म में वेदपाठी ब्राह्मण था और इसी कारण वह भारतीयों और भारत के प्रति विशेष अनुराग अनुभव करता है। वह लोगों से मराठी में ही वार्तालाप करता था और अपने संस्कृत ज्ञान के बल पर उन सबको ये विश्वास दिला चुका था कि वह भारतीयों का हितैषी है और जो कुछ भी करता है, उनकी भलाई के लिए ही करता है। पर असल में उसका उद्देश्य आम लोगों को ये विश्वास दिलाना था कि अंग्रेजों के राज्य में वे सुखी हैं और अंग्रेज जो कुछ भी कड़ाई करते हैं, वह आम लोगों की भलाई के लिए ही होती है और भलमनसाहत की इसी आड़ में सरकार विरोधी गतिविधियों को कुचलना था।

जागरूक भारतीय जैक्सन की कुचालों से भलीभांति परिचित थे और धीरे धीरे उसकी काले और क्रूर कारनामों के कारण उससे हद से ज्यादा घृणा करने लगे थे। जैक्सन इतना धूर्त अधिकारी था कि अंग्रेजों द्वारा क़त्ल कर दिए गए भारतीयों को बीमारी से मरा हुआ दिखा देता था, जरा जरा सी बात पर लोगों को सख्त सजाये देता था और हद तो तब हो गयी जब उसने क्रांतिकारियों के मुक़दमे लड़ने वाले अधिवक्ता वामन सखाराम खरे को वकालत करने से प्रतिबंधित करवा दिया, उनकी संपत्ति जब्त कर ली, उन्हें जेल में डाल दिया और इस सीमा तक प्रताड़ित किया कि वो अपना मानसिक संतुलन खो बैठे। कवि गोविन्द के गीतों की १६ पृष्ठ की पुस्तिका प्रकाशित करने के आरोप में बाबाराव सावरकर की गिरफ्तारी, उन पर मुकदमा चलाये जाने और उन्हें उत्पीडित करने की घटना ने लोगों के सब्र का बांध तोड़ दिया।

अन्ना कर्वे की समिति ने इस पूरे मामले के रचियता जैक्सन को वर्ष 1910 के प्रथम माह में मारने का निश्चय किया परन्तु इसी बीच 1909 के अंत में ही जैक्सन को नासिक के कलेक्टर से मुंबई के कमिश्नर के पद पर प्रोन्नत कर दिया गया। कृष्णा जी कर्वे, विनायक देशपांडे और अनंत कान्हेरे ने जैक्सन को उसके मुंबई जाने से पूर्व ही ठिकाने लगाने का निश्चय किया। नासिक के लोगों ने जैक्सन को विदा करने के उपलक्ष्य में एक समारोह नासिक के ही विजयानंद थियेटर में आयोजित किया था और एक मराठी नाट्य प्रस्तुति ‘शारदा’ भी की जानी थी। अनन्त ने इसी अवसर पर जैक्सन को मारने का निश्चय किया और ये प्रण किया कि पकडे जाने की स्थिति में अपने साथियों को बचाने के लिए और अंग्रेजों के हाथ आने से बचने के लिए वो जहर खाकर प्राणोत्सर्ग कर देंगे।

यह भी तय किया गया कि यदि किसी कारणवश अनंत जैक्सन को मारने में असफल हो जाते हैं तो विनायक देशपांडे जैक्सन को मौत के घाट उतारेंगे। वक़्त जरुरत के लिए अन्ना जी कर्वे ने भी अपने पास हथियार रखने का निश्चय किया। वो 21 दिसंबर 1909 का दिन था जब जैक्सन उसके सम्मान में आयोजित नाट्य प्रस्तुति देखने आया और अवसर पाते ही अनंत ने वीर सावरकर द्वारा लन्दन से भेजी गयीं 20 रिवाल्वरों में से एक रिवाल्वर से उस पर हमला कर दिया और उसके सीने में 4 गोलुयाँ उतार दीं। जैक्सन घटनास्थल पर तुरंत ही मर गया। वहां मौजूद भारतीय अधिकारी पालिश्कर और अन्य लोगों ने अनंत को तुरंत पकड़ लिया जिससे उन्हें खुद को गोली मारने या जहर खाने का अवसर ही नहीं मिल सका।

18 वर्षीय अनंत कान्हेरे पर मुंबई की अदालत में मुकदमा चलाया गया और उन्हें फांसी की सजा सुनाई गयी। न्यायाधीश हिटन महोदय अनंत के व्यक्तित्व से इतना अधिक प्रभावित थे कि उन्होंने निर्णय में लिखा कि मैं इस व्यक्ति को फांसी की सजा सुनाने पर दुःख अनुभव कर रहा हूँ। 19 अप्रैल 1910 को अनंत को थाणे की जेल में फांसी दे दी गयी और उनके साथ साथ अन्ना जी कर्वे और विनायक देशपांडे को भी फांसी दे दी गयी और इस प्रकार ये तीनों माँ भारती की बलिवेदी पर बलिदान हो गए। ये पूरा केस इतिहास में नासिक षड्यंत्र केस के नाम से दर्ज है। इनमें से किसी का भी कोई सगा सम्बन्धी इनको फांसी लगने के समय मौजूद नहीं था और ना ही अधिकारीयों ने इनके शव इनके परिवारीजनों को सौंपे। जेल अधिकारीयों ने ही अनंत और उनके साथियों के शवों को जला दिया और अवशेषों को थाणे के निकट समुद्र में फेंक दिया गया।

अनंत की स्मृति में नासिक के एक चौक का नाम अनंत कान्हेरे चौक और गोल्फ क्लब मैदान का नाम अनंत कान्हेरे मैदान रखा गया है जहाँ विभिन्न खेलों का प्रशिक्षण प्राप्त करने की भी सुविधा दी जाती है। इस हुतात्मा को उनके बलिदान दिवस पर शत शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।

(साथ में दिया चित्र तब का है जब जैक्सन की ह्त्या के बाद अनंत को पकड़ने पर पुलिस ने उन्हें रस्सियों से जकड कर उनकी परेड करायी थी)।

~ लेखक : विशाल अग्रवाल
~ चित्र : माधुरी

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