अध्यात्म प्रबन्धन

आत्म से गहन स्तर के भी प्रबन्धन का नाम है अध्यात्म प्रबन्धन। इसके तत्व हैं- अ) यजन, ब) तप, स) तितिक्षा, द) मुमुक्षुत्व। इसमें यजन के चरण हैं- त्यागन, लक्ष्यन, संगठन। तप के चरण हैं- श्रम, सहन, सृष्ट, ज्ञान, ऋत, शृत, सत्य, श्री, यश। तितिक्षा के चरण हैं- इन्द्रियां अथर्वा, प्राण साम, मन यजुर्वेद, वाक् ऋग्वेद, जीवन विदम्, वेदी-वेदम्, अस्तित्व तपम्, प्रतिबोध ऋद्धम्, अवबोध सिद्धम्, अन्तर्बोध तितिक्षा। मुमुक्षुत्व के पूर्व चरण हैं- प्रज्ञा, मेधा, बोध्ाा, श्रद्धा, निष्ठा, इष्ठा, भा, प्रभा, विभा, आभा, प्रतिभा, गुहा चित्त, अहम्, मुमुक्षुत्व। इन चरणों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-

यजन :-       वह विधा यजन है जो शारीरिक भौतिक, सामाजिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक उन्नति देती है। इसमें दोषमार्जन, हीनांगपूर्ति तथा अतिशयाधान त्रि का अर्थात् संस्कार का भी प्रावधान है। यजन प्रबन्धन में सन्ध्या (ब्रह्मयज्ञ), हवन (देवयज्ञ), बलिवैश्वयज्ञ (संसाधन), पितृयज्ञ (पितर प्रबन्धन) तथा अतिथियज्ञ (योग्यता अनुभव दक्ष प्रबन्धन) का समावेश है। सन्ध्या तथा हवन इसके आधार प्रावधान हैं। बाकी तीनों शुभ अहसास (फील गुड) हैं।

सन्ध्या:- सन्धि पर की जानेवाली क्रिया को सन्ध्या कहते हैं। इसमें प्रावधान हैं अ) दोषमार्जनम् के, 1. सविता गुणों तथा विश्व देवों द्वारा दुरित (दोष, दुर्गुण) दूर भद्र भरपूर। 2. आदर्श वाक् से व्यवहार वाक् पवित्र, आदर्श प्राण से प्राण पवित्र, आदर्श चक्षु से चक्षु पवित्र, आदर्श रसना से रसना पवित्र और आदर्श नासिका से नासिका पवित्र। 3. नाभि, हृदय, कण्ठ, सिर ब्रह्म से मार्जित पवित्र। 4. सत् ब्रह्म से सिर पवित्र, तेज ब्रह्म से नेत्र पवित्र, सुख ब्रह्म से कण्ठ पवित्र, महान् ब्रह्म से हृदय पवित्र, उत्पत्तिकर्ता ब्रह्म से नाभि पवित्र, तप स्वरूप ब्रह्म से पग पवित्र, सत्य ब्रह्म से सिर पुनः पवित्र, खं ब्रह्म से सर्व पवित्र,

सहन :-       यह तप का आधर सत्य है। द्वन्द सहन तप है। द्वन्द है दुख-सुख,पीड़ा-हर्ष, मान-अपमान, मिलन-वियोग, दिन-रात, ग्रीष्म-ठंड, जन्म-मृत्यु, हार-जीत, पफेल-पास आदि। इन सब में सहज सरल रहना सहन है। उघोग में सहनशक्ति की गुणवता के संबंध् में अति महत्वपूर्ण भूमिका ह। अतंरिक्ष यात्रा, शोध्-कार्य, अतितायावस्था कार्य,बड़े निमार्ण, जल भीतर कार्य, सभी सहन चाहते है। सहन बिना विश्व कार्यो में गुणवता ही नहीं रह जाऐगी।

सुदृढ़ :-       इष्ट की रचना सुदृढ़ हैं। इष्ट नाम है उच्चमानुक मय का! उच्च मानक अनुरूप रचना करना कहलाता है। मानकों का पालन करते हुए मानकों के अनुरूप संकल्पना को व्यवहार ध्रातल पर यथार्थ उतारता ही सुदृढ़ है।

ज्ञान :-        विज्ञान ज्ञान का पूर्ण चरण है। वैज्ञानिक विध् िन्याय दर्शन का अव्यय ज्ञान का आधर है। प्रतिज्ञा हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन थे पांच अव्यय वैज्ञानिक विध् िके आधर तथ्य हैक्। अनेेक अनुरूप विश्लेषित तथ्यों का नाम विज्ञान हैै। ज्ञान वह है जो अभौतिकी होता है। आत्मा,स्व,घी,बुद्वि,सकल्प,मन,वाक्, प्राण, विश्व, देव आदि ज्ञान के क्षेत्रा हैं। रात्रि, विज्ञाप्ति, प्रज्ञति, सज्ञाप्ति, सुज्ञपि, स्वज्ञापि, आत्म रात्रि, अति आत्म ज्ञद्वि इसके क्रमशः उच्च होते स्तर है। सांस्कृतिक वैज्ञानिक विध् िके चरण हैः-

1. प्राण , 2. आत्मवत, 3. वेद,        4.आप्त, 5.    ब्रहमगुण अनुरूप, 6. शुभ ही शुभ।

उपरोक्त  अनुरूप संकल्पना प्राक्ल्पना है जो उघोग क्षेत्रा में कार्य का प्रांरभिक चरण है।

क्रतु :- शाश्वत प्राकृतिक नियमों तथा इसके अनुरूप ही मानव निर्मित उपनियमों का नाम क्रतु है।

सत्य :-       आठ प्रमाणोे द्वारा परिपुष्ट, ट्टतु तथा ट्टतु सम्भतः यथावत ज्ञान सत्य हैैैै। वस्तु जैसी है वैसा ही उसको जानना तथा वैसा ही उसका उपयोग करना सत्य प्रयोग है।

जिस उघोग में यजनम सिद्धांतों सहित तपम के श्रम, सहन, सृष्ट, ज्ञान, ट्टतु, मृत, सिद्वातों के अनुरूप कार्य होता है वह मानव समूह वचन, गति, लक्ष्य, विषय, मन आदि सम होता है। तथा यह समूह आदर्श कार्य समूह होता है। तथा ऐसा उघोग श्री की प्राप्ति करता है।

श्री :- श्री नाम है उस परिशुद्व लाभ का जो व्यक्ति किसी को अपेक्षित लाभ देकर उसकी स्वतः स्पूतः, सद्भावना के अंर्तत प्राप्त करता है। श्री समृद्वि पूर्णतयः शांति दायक तथा संतोषदायक होती है।

यश :-  यश कार्य की गुणतवता का पुरस्कार है। कार्य की गुणवता के आधर तत्व श्रम, सहन, सृष्ट, ट्टतु, ज्ञान, सत्य ही है। इनके अनुरूप किया गया हर कार्य निर्दोष, सुचारू प्रणालीयुक्त, न्युनतमक आरमन परेशानियों युक्त, न्यूनतम समय में इष्ट कार्य क्षमता प्राप्त तथा दीर्घायु होता है। ऐसा कार्य तथा ऐसा कार्य करते कर्मचारी लोगों की श्रृदा को प्राप्त होते है इसलिए उनके कार्यो की यश खुशबु हवा की दिशाओं की विपरीत भी बड़ी दूर-दूर तक पफैलती जाती है।

तितिक्षम-मुमुक्षम :-    मानसिक शक्तियों के उच्चतर का प्राप्त करके जाना और इस प्राप्ति पथ पर आई बाधाओं अंतरोधें को सहल सहन करना तितिसा है। वर्षो की सपत एक लगन साध्ना से तितिसा सिद्व मानव मुमुक्षय के क्षेत्रा में कदम रखता है। कान का कान, त्वक की त्वक, आंख की आंख, रसना की रसना, नासिका की नासिका, प्राण का प्राण, वाक की वाक, इन्द्रियों की इन्द्रियाँ है। इन्हें अति इन्द्रियां कहा जाता है। इन इन्द्रियों के सहज शांत अंकप स्वरूप से सारे शब्द स्पर्श, रूप, रस, गंध्, प्राण, वाकन के सदरूप अभिवयक होते है। इनके सद्रूप भावात्मक रूप में चारों वेदों में दिए हुए है। इन वेदों से इन्द्रियों को सिक कर लेना जीवन के जीवन में वेदों के सन्तार्थं, ज्ञानर्थ, उपयोगार्थ तथा लागानार्थ अवतरित कर जीवन को विद् कर देता है। तथा इसी से जीवन वेदी वेद हो जाती है। इस स्थिति अस्तित्व से समस्त द्वैत तिरोहित हो जाते है। अतः आध्यात्म तत् सिद्व हो जाता है तो अतिप्रतिनोध् सहज क्रियांए ट्टध्मय हो जाती है। इस ट्टद्विमयता का न उपयोग ही उपयोग ही इनका सद् उपयोग है। अतः यह अतिवनोध् को सिद्वि मय कर देता है। यह अति उच्च उफर्जा सम्पन्ता है। इस सम्पन्ता का सुरक्षण अति अंर्तनोध् अस्तित्व को परम सम् सौम्य तितिसम कर देता है। तितिक्षय साध्ने के साथ ही साथ परिज्ञा, मेघा, बोध, श्रद्वा, निवण, इवण, भा-प्रभा, विभा, आभा, प्रतिभा, गुहाचित, अहंम्, भी क्रमशः ऋतम्भरा, श्रृतंमरा, बुद्वमरा, श्रृद्वमरा, घृतंमरा,विघृमरा, प्रभंगमरा, विमृगंमरा, आमुगभरा, ट्टजंभरा, विट्टजंमरा, कारण भरा, सकल्प भरा अशंतः होते जाते है। क्रतु क्रतु से संकल्प तक बारंम्बार कर्म-विचार क्रमशः साध्ते थे पूर्णतः समसिद्व होते है। यह समसिद्वता मस्तिष्क मस्तिष्क-अतंस को इलस समन्वित कर देती है। इस स्थिति पूरे तन, मन, मानस, अलंस, मस्तिष्क की कोषिका, न्यूरान-न्यूरान एक दिव्य लक्ष्य सहज अप्रयास वितर्त होते है। साधक ब्रहम-इडस ब्रहम डस्वी होता है। उसमें ब्रहम् इडस उतरता है। यही अवस्था मुमुक्षुत्व है। भौतिकतः यह सर्वोच्च सिद्धावस्था है।

अध्यात्मक प्रबंध्न के चार चरणों यजनम, तपम, तितिसम, मुमुसम से गुजर कर उस सतिमौम मानव का विकास होता है जो हर कार्य हर क्षेत्रा में चाहे वह कर्मं का हो प्रबंधन का हो, शिल्प का हो, गृहस्थ का हो, परिवार का हो, नियोजन का हो- सफलता ही सफलता प्राप्त करता है। अध्याय प्रबंधन सर्व प्रबंधन भी कहा जा सकता है। अध्याय प्रबंधन के किसी क्षेत्रा, किसी परियोजना असपफल होन को प्रश्न ही नही उठता है।

स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय

पी.एच.डी. (दर्शन – वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)

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