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About Santasa

About Santasa

  1. वेद एवं वैदिक साहित्य में छिपे प्रबन्धन तकनीक को जो भारत में आयातीत विदेषी तकनीक से कहीं श्रेष्ठ है को उजागर करना सांतसा का मुख्य उद्देश्य है।
  2. सांतसा विषयों पर लेखन कार्य डॉ.त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय द्वारा यद्यपि 35 वर्षोंपूर्व ही किया जा चुका है किन्तु इन विषयों का जनसामान्य के लिए प्रकाशन लगभग 13 वर्षों पूर्व हो चुका था। 1996 में सांतसा त्रैमासिक का प्रकाशन आरम्भ ब्रह्मचारी अरुणकुमार ”आर्यवीर“ने किया। तब से इन विषयों पर कई पुस्तकों में एवं सांतसा के अंकों में पर्याप्त सामग्री समय-समय पर प्रकाशित की जा चुकी है। 2001 में सांतसा न्यास का पंजीकरण भी मुम्बई में कराया गया है। तभी से यह वेबसाईट बनाई गई है। इस विषय पर लिखे गए आलेखों पर परिचर्चा संगोष्ठियां कार्यशालाओं आदि का आयोजन प्रमुखता से भिलाई छत्तीसगढ़ एवं देश के अन्य विभिन्न प्रान्तों में भी कराया जाता आ रहा है।
  3. इक्कीसवीं सदी की सुखद भविष्य को साकार करनेवाली विधा का नाम है ‘सांतसा’। सांतसा वह विधा है जिसमें तकनीकी प्रगति की धारा को सांस्कृतिकता तथा सामाजिकता द्वारा (सांत) सीमित किया जाता है। एक तिहाई सांस्कृतिकता, एक तिहाई औद्योगिकता एवं एक तिहाई सामाजिकता है जिस तकनीक में वह सांतसा तकनीक है। वेद-दर्शन-उपनिषद आधारित भारतीय संस्कृति में छिपे तकनीकी एवं प्रबंधन तत्वों को जो विश्व को सुख, समृद्धि एवं शान्ति दिला सकता है का अन्वेषण, प्रकाशन इस साईट की प्रमुख विशेषताएं हैं।

स्व. डॉ.त्रिलोकीनाथ क्षत्रिय “भापा”

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  1. पी.एच.डी. (दर्शन – वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन).
  2. एम.ए. (दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन).
  3. बी.ई. (सिविल).
  4. एल.एल.बी.
  5. डी.एच.बी.
  6. पी.जी.डी.एच.ई.
  7. एम.आई.ई.
  8. आर.एम.पी. (10752).

जन्म: 5 सितम्बर 1940(37) – गुजराँवाला पंजाब (वर्तमान पाकिस्तान)

महानिर्वाण: 17 जनवरी 2010 – भिलाई, दुर्ग, (छ.ग.)

प्रणेता:

  1. ससाहित्यसकविताआप्ताभजनसकहानीवीरअभिमन्युनिश्चित्तःमरेगाकल्पिसनिबन्धमृत्युसांतसापत्रिकामेंछपे निबन्धतथाअन्यससूत्रसाहित्यगृहणीसफलतासूत्रपरीक्षासफलतासूत्रसफलजीवनसाथीसूत्रतथाअन्यसचिन्तनघेरोंकोघेरदोउन्मुक्तहोहीजाओगेअगाओकीकिताबबेकुबाअतिआत्मसाधनासतयुगसम्भवहैतथाअन्य।
  2. सइंजीनियरिंगसांतसाइंजीनियरिंग, 1) संस्कारइंजीनियरिंग, 2) सांतसाप्रबन्धन, 3) सइंजीनियरिंगव्यवहारप्रयोगभूतपूर्वमुख्यअभियन्ता(परियोजनाएं रूपमें), एवंअन्यविधाएं।
  3. ससंस्थाप्रसांतसंसदनव्यसंसदहवनसंसदआर्यसंसदसुस्वापसंसद।संस्कृतिसंसद।
  4. अमात्राकाव्यहव्यकव्य।
  5. प्रजतन्त्र।
  6. सशिविरविधासखेलकूद– करीब150 केन्दोंमेंविभिन्नबालसंस्कारशिविर।
  7. सचिकित्सा: 1) अतिस्पर्शन, 2) एकी, 3) मममम, 4) सर्वचिकित्सा।
  8. ससाधनाअतिआत्मसाधनाएकीयापूर्णसाधनाअगाओसाधनास्वयम्भूसाधनामोक्षयहींपेसुलभहैसाधनातथाअन्यसाधनाएँ।
  9. वेदविद्विधा(एप्लाईडवेद)
  10. सम्मान: 1) वेदविद्वानसम्मान(मुम्बई), 2) श्रमिकसाहित्यसम्मान, 3) उत्कृष्टबुजुर्गसेवासम्मान(बालमंचस्मुतिनगर), 4) गुरुजीसम्मान(साईंससंस्थानआदि।
  11. कुलप्रकाशितपुस्तकेंकरीबपैंतीस।
  12. अन्तर्राष्ट्रीयसेमिनारोंमेंआलेखप� नचार।राष्ट्रीयसेमिनारोंमेंआलेखप� नबारह
माता:स्व.लाजवन्ती।
पिता:स्व.लाला लद्धाराम सखूजा।
सुपत्नी:सुदेश (स्वदेश)।
सुपुत्र:अरुणकुमारनमितनिचित।
सुपुत्री:शुचि।

कन्सल्टेंसी: अध्यात्म संस्थान 145, जुनवानी रोड़, स्मृतिनगर, भिलाई छ.ग. 490020

पता: प्रसांत भवन, बी 512, सड़क 4, स्मृतिनगर, भिलाई, जि.दुर्ग, छत्तीसगढ़ 490020  दूरभाष: (0788) 2392884

वेद कार्य :

  1. वैदिक आचार मीमांसा पर शोध प्रबन्ध।
  2. प्रथमम्: ऋग्वेद के पहले मन्त्रकी विस्तृत व्याख्या- प्रकाशित।
  3. अयोध्या विजय सूत्र: वैदिक परिभाषाओं का प्रकाशन।
  4. दशरूपकम् परियोजना प्रबन्धन: पंचम वेद आधारित पर्ट का विकास।
  5. वैदिक सम्प्रेषण सिद्धान्त का विकास।
  6. वैदिक नेतृत्व संकल्पना का जर्मनी के जान आफ्टर एडेयर के एक्शन लीडरशिप से भी ठोस विकास।
  7. संस्कार प्रबन्धन का विकास।
  8. पर्यावरण के वैदिक स्वरूप पर पुस्तक प्रकाशन।
  9. वैदिक शून्य त्रुटि विध्ाा का विकास जो आधुनिक शून्य त्रुटि सिद्धान्तों से ज्यादा व्यापक है।
  10. वैदिक परिवार परिभाषाओं का प्रकाशन।
  11. वैदिक इरगानॉमिक्स का विकास।
  12. वैदिक ”पच्चीस-पचहत्तर“सिद्धान्त का विकास जो आधुनिक ए.बी.सी. सिद्धान्त से ज्यादा ठोस है।
  13. वैदिक पितर क्षमतावृद्धि सिद्धान्त जो पीटर लारेंस के क्षमतावृद्धि सिद्धान्त से उच्च है का विकास।
  14. वेदों का वेद के अन्तर्गत चारों वेदों के उभयनिष्ट मन्त्रों का संकलन।
  15. ओ3म् प्रबन्धन: 101 से भी ज्यादा प्रबन्धन विधाएं।
  16. पुरोहितम् शिक्षा प्रारूप का विकास।
  17. वैदिक सिद्धान्तानुरूप ”हृदय चिकित्सा पद्धति“का विकास एवं उसके सार का प्रकाशन।
  18. वैदिक वैज्ञानिक विधि का विकास जिसमें वर्तमान वैज्ञानिक विधि समाविष्ट है।
  19. गीगो- गारबेज इन गारबेज आऊट सिद्धान्त के खिलाफ गीगो- अर्थात् गॉड इन गॉड आऊट सिद्धान्त का विकास।
  20. वैदिक गृहणी आधारित ‘गृहव्यवस्था’तथा ”गृहणी सफलता सूत्रों“का विकास।
  21. सांतसा (सांस्कृतिक तकनीक सामाजिक) पत्रिका के रूप में वैदिक प्रबन्धन विधाओं का 5 वर्षों तक आधार लेखन।
  22. वैदिक ‘सुस्वाप’सुरक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण का श्रमिकों में प्रसार।
  23. पूरे देश में दिल्ली, नागपुर, रायपुर, कलकत्ता, बैंगलोर, दुर्गापुर, मुम्बई, राउरकेला, जमशेदपुर, चेन्नई, रांची, भिलाई आदि शहरों में राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनारों में उपरोक्त वैदिक सिद्धान्तों पर आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण।
  24. भिलाई इस्पात सयंत्र के सैकड़ों अधिकारियों तथा हजारों श्रमिकों को उपरोक्त सिद्धान्तों का प्रशिक्षण।
  25. भिलाई, दुर्ग, रायपुर, मुम्बई, दिल्ली, बरेली, वाराणसी, गाज़ियाबाद, सौसर, बिलासपुर, राजहरा, कोहका, दुर्ग, उज्जैन, नागपुर, जबलपुर, भोपाल, लखनऊ आदि में उपरोक्त सिद्धान्तों पर भाषण।
  26. भाषा भारती, आर्य जगत् (दिल्ली), स्कान (रांची), सृजन, विकास, परियोजना पराग, ट्रांजेक्शन (भिलाई), आर्य सेवक (नागपुर), अवनी (वाराणसी), लोक यज्ञ (बीड), अग्निदूत (दुर्ग), स्वस्ति पंथा (ज्वालापुर), आर्य मित्र आदि पत्र-पत्रिकाओं में उपरोक्त सिद्धान्ताधारित आलेखों का प्रकाशन।
  27. प्रबन्धन सांस्कृतिक तकनीक संसद, नव्य संसद, हवन संसद आदि में वैदिक सिद्धान्तों पर सैकड़ों गोष्ठियों द्वारा प्रसार।
  28. भापा के भजन“नाम से वैदिक आध्यात्मिक भजनों का तीन सीडियों में ध्वनिमुद्रण।