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भारत गौरव गान / भारत चालीसा

भारत चालीसा या ।। गौरव-गान।। आर्य कवि पंडित जगदीशचन्द्र ”प्रवासी“ 1- हिमालय है भू-मण्डल में भारत देश महान। जहां खड़ा गिरिराज हिमालय मही मुकुट उत्तुंग उतान। अपने उज्जवल मुख-मण्डल से [ … ]

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01. अग्निहोत्र प्रस्तावना

देनेवाला देवता है। देवता दो प्रकार के हैं– जड और चेतन। चेतन देवों की पूजा को पंचायतन पूजा कहते हैं, तो जड़ देवों की पूजन विधि को अग्निहोत्र या हवन [ … ]

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02. अग्निहोत्र प्रक्रिया

अथ देवयज्ञः अथाचमन-मन्त्राः ओ3म् अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा।। 1।। इससे एक ओ3म् अमृतापिधानमसि स्वाहा।। 2।। इससे दूसरा ओ3म् सत्यं यशः श्रीर्मयि श्रीः श्रयतां स्वाहा।। 3।।                         (तैत्तिरीय आरण्यक प्र. 10/अनु. 32, 35) [ … ]

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03. आचमन

अथाचमन-मन्त्राः ओ3म् अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा।। 1।। इससे एक ओ3म् अमृतापिधानमसि स्वाहा।। 2।। इससे दूसरा ओ3म् सत्यं यशः श्रीर्मयि श्रीः श्रयतां स्वाहा।। 3।।                         (तैत्तिरीय आरण्यक प्र. 10/अनु. 32, 35)

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04. इन्द्रियस्पर्श मन्त्राः

अथ अङ्गस्पर्श-मन्त्राः ओं वाङ्म आस्ये ऽ स्तु। इस मन्त्र से मुख ओं नसोर्मे प्राणो ऽ स्तु।इस मन्त्र से नासिका के दोनों छिद्र ओं अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु।इस मन्त्र से दोनों आंख ओं कर्णयोर्मे [ … ]

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05. नेत्र कर्ण

अथ अङ्गस्पर्श-मन्त्राः ओं वाङ्म आस्ये ऽ स्तु। इस मन्त्र से मुख ओं नसोर्मे प्राणो ऽ स्तु।इस मन्त्र से नासिका के दोनों छिद्र ओं अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु।इस मन्त्र से दोनों आंख ओं कर्णयोर्मे [ … ]

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06. ओज-बल-शारीर स्वास्थ्य

अथ अङ्गस्पर्श-मन्त्राः ओं वाङ्म आस्ये ऽ स्तु। इस मन्त्र से मुख ओं नसोर्मे प्राणो ऽ स्तु। इस मन्त्र से नासिका के दोनों छिद्र ओं अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु। इस मन्त्र से दोनों [ … ]

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07. सङ्कल्पपाठः

अथ सङ्कल्पपाठः ओं तत्सत् श्रीब्रह्मणो द्वितीयप्रहरोत्तरार्द्धे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमें कलियुगे कलिप्रथम- चरणेऽमुक….. संवत्सरे, …..अयने, …..ऋतौ, …..मासे, …..पक्षे, …..तिथौ, …..वासरे, …..नक्षत्रे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तदेशान्तर्गते …..प्रान्ते, …..जनपदे, …..मण्डले, …..ग्रामे/नगरे, …..आवासे/भवने, मया/अस्माभिः दैनिक अग्निहोत्र-कर्म क्रियते। [ … ]

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08. स्तुति प्रार्थना उपासना

स्तुति – जो ईश्वर वा किसी दूसरे पदार्थ के गुण ज्ञान, कथन, श्रवण और सत्यभाषण करना है, यह ‘स्तुति’ कहाती है। स्तुति का फल – जो गुणज्ञान आदि के करने से गुणवाले [ … ]

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09. विश्वानि देव.. १..!!

ओ३म् विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव। यद् भद्रन्तन्न ऽ आसुव।। 1।। (यजु अ.30/मं.3)        हे सकल जगत् के उत्पत्तिकर्ता, समग्र ऐश्वर्ययुक्त, शुद्धस्वरूप, सब सुखों के दाता परमेश्वर ! आप कृपा करके हमारे [ … ]

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