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Today's Words

सदा स्वस्थ जीने के गुर

१. ‘अथ’
अगाओ से आरम्भ है। अगाओ सारे परमात्माओं के गुणों के समूह से उपजा ‘‘एक’’ भाव है। विषय है निरोगिता। प्रयोजन है जीन का शुभ ही शुभ होना। सम्बन्ध है परम शुभ विचार तथा जीवन में हर पल निरोगिता से। अधिकारी है मानवमात्र जो स्वस्थ निरोग शतवर्ष जीना चाहते हैं।

२. ‘आयु’
शरीर, कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय, मन, बुद्धि, धी और स्वात्मा के सुसंयोग से विशिष्ट काल का नाम आयु है। ‘तन’ आयु का प्रतीक है। तन शब्द का अर्थ है ‘‘तब नहीं’’। दो तब होते हैं- एक आयु पूर्व दूसरा आयु पश्चात। इसका चित्र इस प्रकार है-
तब नहीं = तन = तब नहीं
अब नहीं = अब = अब नहीं
तन या तब नहीं = अब। आरम्भ अव्यक्त मध्य व्यक्त अन्त अव्यक्त है आयु।

३. ‘‘आयु लक्षण’’
१. सावयव ही, २. प्राणायतनमय, ३. संसृत (बहनेवाली), ४. नित्य युक्त ये आयु के चार लक्षण हैं।
सावयव धारणा क्षमता का नाम है। सारे अंगों का समायोजन धारण आयु द्वारा होता है। मृत्युभय या कठिनतम परिस्थितियों में सारे अवयव एक साथ कार्य करते हैं। उस अवस्था मानव अद्वितीय कार्य कर जाते हैं। प्राणायतन का अर्थ है- प्राण, अपान, समान, व्यान, उदान इन पंच मुख्य प्राणों तथा नाग, देवदत्त, धनंजन, कूर्म, कृकल इन पंच उपप्राणों की शक्ति का उपयोग। संसृत का अर्थ है दिवस-दिवस कम होते जाना। शतवर्षीय जीवनटंकी पल-पल टपकता समाप्त हो जाती है। नित्य युक्त का अर्थ है तब नहीं के दो क्षेत्रों में जो अब आत्मा तथा परमात्मा है उनसे आयुवान युजित है।

४. ‘शतायु’
वह ब्रह्म धरा, आप, तेज, वरुण तथा नभ इन पंच में समाविष्ट गन्धब्रह्म, रसब्रह्म, रूपब्रह्म, स्पर्शब्रह्म तथा शब्दब्रह्म है। पंच व्यवस्था जो सूक्ष्म तथा स्थूल स्तर की हैं का हितकारक है। वह अब-अब-अब है। प्रकटते ही अनन्त है। हम तन या तब नहीं अब उस ‘‘अब-अब-अब’’ ब्रह्म को स्वगन्ध से सुगन्धें शताधिक वर्ष तक, स्वरस से आस्वादें शताधिक वर्ष तक, स्वरूप से देखें शताधिक वर्ष तक, स्वस्पर्श से स्पर्शें शताधिक वर्ष तक, स्वशब्द से सुनें शताधिक वर्ष तक। वह ब्रह्म खम् तथा कम् प्रविष्ट प्राण ब्रह्म तथा वाक् ब्रह्म भी है। हम सदायी ब्रह्म को स्वप्राण से प्राणें शताधिक वर्ष तक, स्ववाक् से वाकें शताधिक वर्ष तक। ऐसे सप्त ब्रह्माविष्ट हम अदीन जिएं, स्वस्थ रहें शताधिक वर्ष तक।
इस शतायु में शत प्रतिशत हितायु तथा शत प्रतिशत सुखायु है।

५. ‘‘आयु प्रकार’’
आयु के पांच प्रकार हैं- १. शतायु, २. हितायु, ३. अहितायु, ४. सुखायु, ५. दुःखायु।
शतायु अर्थात शारीरिक, सामाजिक, मानसिक तौर पर स्वस्थ विशेष युवा जिसके शरीर में बल, इन्द्रियों में तेज, शुक्र में ओज, मन में मन्यु, संग में सह, वाक् में ज्ञान, बुद्धि में एका, धी में ध्येय, अस्तित्व (स्व) में अर्च, आत्म में ईड (परम परिष्कृति अवस्था की समर्पण भक्ति) हो वह शतायु, हितायु, सुखायु एक साथ है।
सुखायु अर्थात् शारीरिक, मानसिक, सामाजिक स्वस्थ, शिव मन, यशस्वी, पुरुषार्थी, पराक्रमी, ज्ञान-विज्ञान सम्पन्न, समर्थ इन्द्रिय, ऐश्वर्य युक्त, नियमानुसार कार्यसिद्ध प्राप्त करता सुखायु है।
दुःखायु अर्थात् शारीरिक, मानसिक, सामाजिक अस्वस्थ, अशिव मन, यशहीन, पुरुषार्थहीन, पराक्रमहीन, अज्ञानी, इन्द्रिय गुलाम, निर्धन, अनियमित कार्य असफल व्यक्ति दुःखायु है।
हितायु अर्थात् परहित भावना भरा, धन-सन्तुष्ट, अस्तेय भावयुक्त, सत्यमय, शान्तिमय, विचारपूर्वक ही कार्य करता, धर्म-अर्थ-काम त्रि का सावधानीपूर्वक पालनकर्ता, ब्रह्मगुण अर्चक, अध्यात्म साधना सिद्ध, दानी, मोक्ष लक्ष्य का ज्ञाता, ज्ञान तथा शान्ति का उपासक, तितिक्षु तपशील व्यक्ति हितायु है।
अहितायु अर्थात् रागयम, ईर्ष्यामय, मदमय, अभिमान भरा, कंजूस, अज्ञानी, त्रि-एषणा लिप्त, अतृप्त, भोगों द्वारा भोगा जा रहा, अशान्त व्यक्ति अहितायु है।

६. ‘रोग’
आयु अर्थात् शरीर, कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय, मन, बुद्धि, धी, स्व, आत्मा की असंगति आयु-भंग या रोग है। इससे अस्तित्व की ताजगी, चैतन्यता, नित्यता, सजगता में बाधा उत्पन्न होती है तथा इसके विपरीत लक्षण उत्पन्न होते हैं। पित्त-वात-कफ में असन्तुलन तथा तम, रज भी क्रमशः शारीरिक एवं मानसिक रोगों के कारण हैं।
रोगों के तीन प्रकार हैं- १. दोष उत्पन्न, २. कर्म उत्पन्न, ३. दोष-कर्म उत्पन्न। मिथ्या, आवेगकर, तामस, राजस आहार-विहार से दोष उत्पन्न रोग तथा मिथ्या, आवेगकर, तामस विचार व्यवहार से कर्म उत्पन्न रोग तथा मिश्र अल्प कारण होने से भी अत्यन्त बढ़ जानेवालों दोषों को भी कर्म उत्पन्न रोग कहते हैं। मानसिक तथा शारीरिक रोग उत्तरोत्तर एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। शारीरिक रोग मानसिक रोगों में और मानसिक रोग शारीरिक रोगों में परिवर्तित भी हो जाते हैं। ये परस्पर अन्तर्सम्बन्धित हैं। शरीर और मन मुख्यतः रोगों के आश्रय हैं। शरीर और मन के रोगों का मूलभूत कारण काल, इन्द्रियों, बुद्धि, धी का मिथ्यायोग, अयोग, अतियोग हैं।

७. ‘‘काल-मिथ्यायोग’’
काल समय के विस्तृत व्यापक रूप को कहते हैं। काल संधियों में विभक्त है। काल-संधियों के यथार्थ स्वरूप का ज्ञाता ऋत्विज कहलाता है। ऋत्विज आदर्श काल आयोजक है। संधियों में विभाजित काल के व्यक्त टुकड़े को समय कहते हैं। समय भी उपसंधियों में विभाजित है। मानव जीवन शतवर्षों में विभाजित है। शतवर्ष चार आश्रमों में विभाजित है। आश्रम संस्कारों में विभाजित है। हर वर्ष राशियों में विभाजित है। वर्ष मौसमों में विभाजित है। मौसम-मौसम के माध्यम से वर्ष पर्वों में विभाजित है। वर्ष बारह मासों में विभाजित है। मास दो पक्षों में विभाजित है। पक्ष सप्ताह में, सप्ताह दिवसों में, दिवस सन्ध्या-प्रभात में, सन्ध्या-प्रभात इड़ा-पिंगला-सुषुम्णा श्वास-प्रश्वास लयों में विभाजित है।
भारतीय संस्कृति में इन विभाजनों के अनुरूप ऋतु-यज्ञों, इष्टियों, पंच यज्ञों, कर्मों- (इड़ा- सरल, पिंगला- कठिन, सुषुम्णा- अध्यात्म) का आयोजन इनमें जीवन को सम करने के लिए है। यह आयोजन सद्योग या सत्ययोग है। यह ‘‘जीवन समय-आयोजन’’ है। यह स्वास्थ्यकर है क्योंकि मौसम-प्रभावों, संध्या-प्रभात-प्रभावों, पूर्णिमा-अमावस्या-प्रभावों, इड़ा-पिंगला-सुषुम्णा परिवर्तन प्रभावों को सम करता है तथा मानव को इन परिवर्तनों के दुष्प्रभावों से बचाता है। इस सत्ययोग के हिसाब से खान-पान, रहन-सहन, इष्टि-यज्ञ आदि न करके इसका उलट करना समय-मिथ्यायोग या काल-मिथ्यायोग है जो रोगकारक है। क्षीण-जीर्ण काय इमैन्युअल कांट (अज्ञेयवाद के प्रणेता प्रसिद्ध पाश्चात्य दार्शनिक) नियमित अनुशासनबद्ध दिनचर्या के कारण चौरासी वर्ष तक जीवित रहा। वेदों के भारतीय विद्वान श्री दामोदर सातवलेकर भी संस्कृति अनुशासनबद्ध जीवन के कारण न केवल शतायु हुए अपितु शताधिक वर्ष जिए।
इसके अतिरिक्त काल का मिथ्यायोग ग्रीष्म में मौसम का सर्द होना या सर्दी में गर्म होना या बारिश में मौसम शुष्क होना या शीत में मौसम आर्द्र रहना रागकारक है। ऋतु विपरीत आहार भी रोगकारक है। अतिकृत्रिम मौसम पैदा करके जो व्यक्ति गर्मी में सर्दी, सर्दी में गर्मी पैदा कर मौसम को सम करने का प्रयास करते हैं वे मिथ्यायोगी तारकासुर हैं। तारकासुर को धरती के लिए अमंगलकारी धूमकेतु के समान पैदा हुआ कालिदास ने कहा है। जिसने छैः ऋतुओं पर कब्जा कर लिया था। हवाओं को कैद कर लिया था कि उसकी इच्छानुकूल ही बहा करें। अपने उपवनों में उसने धूप का सीमित कर लिया था। अपने निवास को जंगल की श्रेष्ठ लकड़ियों से सजा लिया था। तारकासुर राक्षस था। कालमिथ्यायोग भी राक्षसी प्रवृत्ति है। राक्षस तारकासुर का वध ब्रह्मा ने किया था। कालमिथ्यायोग का वध ब्रह्मयोग से या ब्रह्मनियमानुसार जीने से होता है।

८. ‘‘बुद्धि धी मिथ्यायोग’’
इन्द्रियों के माध्यम से बुद्धि बोध ग्रहण करती है। धी विवेकपूर्वक बोधों का संष्लेषण करती है तभी अविद्या का नाश होता है। नित्य-अनित्य, सुख-दुःख, सत्य-असत्य, स्थायी-अस्थायी, चैतन्य-जड़, सत्-असत् की सही समझ न होना अविद्या या मिथ्यायोग है। सारे रोगों की यह जड़ है। नित्य को अनित्य मानना, अनित्य को नित्य मानना आदि-आदि मानसिक रोगों के कारण हैं। परमात्मा के विषय में मिथ्यायोग सबसे बड़ा मिथ्यायोग है। इस मिथ्यायोग के प्रमाणस्वरूप दूसरे, तीसरे, चौथे, पांचवे, छठे… दसवें, सौवे, करोड़वे माने भगवानों को पूजते लोग हर धर्मस्थल परमात्मा विषयक पागल प्रलाप करते हैं। इसके दुष्परिणाम वे कई अन्धविश्वासों से घिरे जगह-जगह मानसिक विक्षिप्तता प्रदर्शित करते रहते हैं।
धी मिथ्यायोग का कारण वैज्ञानिक विधि का पालन न करना है। प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन की पंच प्रक्रिया आधुनिक वैज्ञानिक विधि है। इसमें आप्तानुकूल, आप्तवत, प्रमाणसिद्ध जोड़ देने से सांस्कृतिक वैज्ञानिक विधि बनती है। सांस्कृतिक वैज्ञानिक विधि का प्रयोग बुद्धि-धी सद्योग है।

९. ‘‘इन्द्रिय मिथ्यायोग’’
इन्द्रियां पांच हैं। इन पांचों के विश्वदेवों के साथ त्रि-तैंतीस संयोग हैं। ग्यारह ग्यारह ग्यारह धरा-स्थानीय, अन्तरिक्ष-स्थानीय, द्यु-स्थानीय देवता है। जैसे वाक् के तैंतीस संघात हैं वैसे ही इन इन्द्रियों के विभिन्न तैंतीस संघात हैं। नासिका इन्द्रिय युजित तैंतीस गन्ध, रसेन्द्रिय युजित तैंतीस रस, रूपेन्द्रिय युजित तैंतीस रूप, स्पर्शेन्द्रिय युजित तैंतीस स्पर्श तथा कर्णेन्द्रिय युजित तैंतीस शब्द इन इन्द्रियों का विस्तार है। इन सबके मिश्र रूप अनुगुणित (फैक्टोरियल) पांच गुणा अनुगुणित तैंतीस हैं। इन्द्रियां ही मानव के विश्व व्यापार का आधार हैं।
इस विश्व व्यापार के तीन अवमूल्यन मानव शरीर में भी अवमूल्यन पैदा करके व्यक्ति को रोगी बनाते हैं। ये अवमूल्यन हैं- १. मिथ्यायोग, २. अतियोग, ३. अयोग।
मिथ्यायोग : इन्द्रियों के अर्थहीनयोग या निरर्थ योग या घटिया भाव योग यथा गाली-गलौच, कठोर, भीषण, अप्रिय (मन की नापसन्द), विपत्तिसूचक, तामस, द्वेषयुक्त, कुत्सित, घृणित इन्द्रिय सम्पर्क मिथ्यायोग है। आज के युग में इन मिथ्यायोगों की हर ओर भरमार है। इनसे बचना कठिन तपस्या का काम है।

१०. ‘‘शुभ-अशुभ’’
समस्त धर्मों की मूल भावना यह है कि समस्त अशुभ हमसे दूर हों एवं समस्त शुभ हमारे निकट हों। हम समस्त अशुभों से दूर रहें और शुभों के निकट रहें। इस मूल भावना में स्वस्थ आयोजनमय प्रसन्न जीवन का रहस्य भरा हुआ है।
सौ समान स्वस्थ व्यक्तियों को लिया गया। इन स्वस्थ व्यक्तियों की इस प्रयोग में सहमति थी। उन्हें पचास-पचास के दो भागों में बांट दिया गया। उनके मस्तिष्क की संवेदन तन्त्रिकाओं को हानिरहित आइसोटोपों से युक्त कर दिया गया जिससे उनमें भाव तरंग प्रवहण नापा जा सके। यह नापना आण्विक सूक्ष्मदर्शी से सम्भव था। उनमें से प्रथम पचास को स्पष्ट ज्ञात शुभ और अन्य पचास को स्पष्ट ज्ञात अशुभ विचार पुस्तकें दी गईं। पुस्तकों को उन्हें प्रतिदिन एक-एक विचार सार रूप में कम से कम इक्कीस मिनट तक सतत पढ़ना था। इक्कीस मिनट समय निर्धारण पूर्व के प्रयोगाधारित था। उनके जीवन के कार्य कलापों का सतत गहन निरीक्षण किया गया। परिणामों का विश्लेषण इस प्रकार का रहा-
१. विचार कहां पैदा हुए पता नहीं चला। २. मस्तिष्क से विचार संवेदन तन्त्रिकाओं के माध्यम से स्व-कोषिकाओं के इर्द-गिर्द फैल गए। ३. कोषिकाओं के झिल्ली के चक्र से विचार जिनेटिक कोड पर प्रक्षेपित हुए। ४. ये विचार जिनेटिक कोड पर (इक्कीस मिनट के कारण) स्थायी टंकित होते गए। इनका शुभ-अशुभ रूप बरकरार रहा। ५. इस टंकन के कारण कोषिका की क्रियाओं चय-अपचय शक्ति उत्सर्जन आदि पर काफी असर पड़ा। ६. शुभ विचार व्यक्तियों में चय-अपचय शक्ति उत्सर्ज आदि सहज सम रूप रहा तथा अशुभ विचार व्यक्तियों में चय-अपचय शक्ति उत्सर्ज असहज विषम रूप अस्त-व्यस्त रहा।
व्यक्तियों के जीवन व्यवहार निरीक्षण प्रभाव इस प्रकार रहा- १. अशुभ विचार व्यक्तियों की जीवन प्रणाली बिना आयोजन अस्त-व्यस्त होती गई। वे मानसिक रूप में अक्सर परेशान पाए गए। २. शुभ विचार व्यक्तियों का जीवन आयोजनमय, नियमित, समयबद्ध होने लगा। वे मानसिक शान्ति अनुभव करने लगे।
‘‘शुभ-प्रवेश अशुभ-निकास।
जीवन सुख-शान्ति का आवास।।’’

११. ‘‘अयोग अतियोग’’
इन्द्रियों का विषयों के प्रति अयोग या अतियोग रोगकारक होता है। जब पहली बार रूस के अन्तरिक्षयात्रियों को आवाजशून्य अन्तरिक्षयान में प्रयोग के लिए भेजा गया तो वे चौंककर वापस आ गए। उन्हें उसमें अपनी पलक सरसराने, हृदय की धड़कनों की आवाजें भी भयावनी लगीें। ज्यादा पढ़नेवाले लोगों का निकटदृष्टि से अतियोग होने से वे खराब हो जाती हैं और दूरदृष्टि के अयोग होने से वह भी खराब हो जाती है।
आवाज के क्षेत्र में किए गए प्रयोग बताते हैं कि पन्द्रह से पच्चीस की डेसिबल की आवाज में मानव की क्षमताएं सर्र्वाधिक होती हैं। इसी प्रकार प्रकाश, गन्ध, स्पर्श, रस की दहलीज सीमाएं हैं जिनपर मानव क्षमताएं सर्वाधिक होती हैं। यदि पांचों इन्द्रियों की दहलीज सीमाओं पर मानव रहे तो उसकी सर्वांगणीय क्षमता अधिकतम होगी। दहलीज सीमा से कमाधिक विक्षेप (अयोग-अतियोग) मानव के लिए हानिकर होता है। जिसप्रकार १६० डेसिबल से अधिक आवाज आदमी के कान के पर्दे फाड़ उसे बहरा बना देती है इसी प्रकार १६० एकांक गन्ध (प्रकाश के स्तर माप तक) नासिका को अवरुद्ध या बेकार कर सकती है। यही स्थिति अन्य इन्द्रियों के क्षेत्र में भी है। इन्द्रियों का अयोग या अतियोग स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव डालता है तथा रोगकारण है।

१२. ‘‘कर्म-त्रियोग’’
वाक्, मन, शरीर की प्रवृत्ति को कर्म कहते हैं। तीनों की अतिप्रवृत्ति अतियोग है। तीनों की न प्रवृत्ति अयोग है। तीनों की तमोमय प्रवृत्ति मिथ्यायोग है। शारीरिक मिथ्यायोग में मलमूत्रादि को बलात् रोकना या निकालना, अंगों को अनावश्यक रूप से टेढ़े-मेढ़े रखना, शरीर को अनावश्यक उपवास, मदिरापान, व्रत, अतिधूपसेवन, अतिशीतसेवन, अतिजलस्नान आदि द्वारा कष्ट देना आदि आते हैं। वाक् मिथ्यायोग में परा-पश्यन्ती-मध्यमा-वैखरी का एक न रहना अर्थात् चुगली, झूठ, अनावश्यक, अप्रिय, असंगत, कठोर वचन, असत्य भाषण आदि आते हैं। मन के मिथ्यायोग में भय, शोक, अवसाद, मोह, लोभ, अभिमान, ईर्ष्या, अनादर, अकल्याणभाव आदि आते हैं। कर्म के अयोग-अतियोग-मिथ्यायोग वाक्-मन और शरीर के रोगों के कारण हैं।

१३. ‘‘प्रज्ञा-अपराध’’
अतियोग, अयोग, मिथ्यायोग और कर्मत्रियोग का संयुक्त नाम प्रज्ञाअपराध है। इन्द्रियों के मिथ्यायोग, अतियोग, अयोग तथा वाचिक, मानसिक, शरीरिक (कर्म के) मिथ्यायोग, अतियोग, अयोग प्रज्ञापराध है। प्रज्ञापराध समस्त अशुभ कर्मों का बीज होने के कारण इससे शरीरिक एवं मानसिक रोग होते हैं। प्रज्ञापराध का वर्तमान प्रभाव वैज्ञानिकों द्वारा विज्ञानसिद्ध कर लिया गया है।
रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र ये सप्त धातुएं हैं। मज्जा के करीबी साम्य रखती धातु का वर्तमान नाम बोन मारो है। बोन मारो में से रक्त का उत्सर्ज होता है। उसका मूल उत्सर्जस्थान अज्ञात है। किन्तु यह सिर, फेफड़े तथा रीढ़ की हड्डी उत्सर्ज होता प्रतीत होता है। रक्त में रक्ताणु, श्वेताणु तथा जमाणु होते हैं। रक्ताणु हेमोग्लोबिन तथा ओषजन वाहक होते हैं। श्वेताणु रोग युद्धक तथा जमाणु रक्त के हवा के सम्पर्क में आने पर थक्काकरण (रक्त के जमने) का कार्य करते हैं। श्वेताणु रोगयुद्धक होने के कारण रोग बचाव में सहायक होते हैं। प्रति मिलीलीटर खून में ४० से ५० लाख रक्ताणु २.५ लाख जमाणु और ७ से ८ हजार श्वेताणु होते हैं। रक्ताणु में केन्द्रक नहीं होता अतः यह कोषिका नहीं है। श्वेताणु में केन्द्रक होता है। इसका एक प्रकार अमीबा की तरह गति करने में झिल्ली द्रव का दबाव आयतन बढ़ने की दिशा में बढ़ता है तथा वजन गति करता है। तन रक्त में बाह्य जीवाणु (रोगाणु) के प्रवेश करने पर यह उसे घेर खा जाने का कार्य करके स्व-स्वस्थ्य-संस्थान का शक्तिकरण करता है। रोगाणुओं की उपस्थिति में रक्त श्वेताणु बढ़ाने दौड़ता है तथा वहां रोगाणुओं श्वेताणुओं का महायुद्ध होता है। इसीलिए वहां सूजन होती है। श्वेताणुओं की हार का अर्र्थ है उनकी श्वेत पीताभ लाशें जिसे पीब या पस कहते हैं। त्वचा के नीचे वसा तह है। वसा तहयुक्त चमड़ी प्रथम रक्षा पंक्ति है तो श्वेताणु द्वितीय पंक्ति है। तृतीय पंक्ति है रोगाणुओं से संघर्ष बाद विजयी ‘‘न-तन’’ या ‘‘एण्टी-बॉडी’’।
श्वेताणुओं को प्रज्ञा-अपराध से महाखतरा है। विषय-ध्यान, संगेच्छा, काम, मोह, क्रोध, संमोह, स्मृति-भ्रंश, निर्र्बुद्धि-व्यवहार प्रज्ञापराध की जड़ है। अति आधुनिक वैज्ञानिक शोध में काम, मोह, क्रोधादि अवस्थाओं में पाया गया कि बोन-मारो (मज्जा) से रक्त उत्सर्ज के समय पीताभ सूक्ष्म कण भी उत्सर्ज होते हैं। ये पीताभ कण श्वेताणुओं पर बौछार आक्रमण करते हैं तथा उन्हें नष्ट करते हैं। इससे श्वेताणु उत्सर्ज में असन्तुलन याने सहसा उतार-चढ़ाव होते हैं जो रोगकारक हैं।
अलग प्रयोगों में यह पाया गया कि श्वेताणुओं का अतिउत्पादन रक्त में उनकी वृद्धि करता है पर साथ ही साथ रक्ताणुओं, जमाणुओं में कमी करता है और यह अति असंतुलन सतत जिनमें बढ़ता रहता है उन्हें ल्युकेमिया नामक रक्तकैंसर होता है जो लाइलाज है। शायद दीर्घकालीन प्रज्ञा-साध इसका इलाज हो..!!

१४. ‘‘प्रज्ञा साध’’
अतियोग, अयोग, मिथ्यायोग प्रज्ञापराध हैं जो निश्चिततः रोगकारक हैं। समयोग, सद्योग, ब्रह्मयोग प्रज्ञासाध हैं जो निश्चिततः आरोग्यकारक हैं। प्रज्ञासाध श्वेताणुओं के लिए महाहितकारक है। श्वेताणु संयमित, सन्तुलित, शान्त हो स्वस्वास्थ्य में वृद्धि करते हैं। वास्तव में ‘‘स्व-स्वस्थन’’ अतिजटिल सूक्ष्म धरातलीय आण्विक आयनिक मम, न तन, न मम संतुलन का विज्ञान है। वर्तमान विज्ञान की अधुनातन खोज के अनुसार विचार शरीर में विद्युत स्पन्दन पैदा करते हैं। इससे रासयायनिक द्रव्य (माध्यम) उत्सर्जित होते हैं। विचार उत्सर्जन प्रवहण द्वारा जीन टंकित होते हैं। जीन कोषिका सक्रिय करते हैं। कोषिका केन्द्रक में वंशज गुण तथा कोषिका जीवन रहस्य माइक्रो कंड्रिया में शक्तिस्रोत होते हैं जो कोषिका क्रियाशक्ति देते हैं। माइक्रोसोम प्रोटिन संश्लेषण करते हैं। शरीर सौ हजार से अधिक एन्झाइमों का बना है जो प्रोटिन है। इनके अतिरिक्त शरीर में हारमोन व्यवस्था है जो व्यक्ति के विचारों के अनुरूप होती है। विचारों या भावों को कृत्रिम रूप में हारमोन देकर प्रभावित भी किया जा सकता है। स्व-स्वास्थ्य संस्थान थायमस ग्रन्थि परिवर्तित टी श्वेताणु तथा अज्ञात स्थान उत्सर्ज बी श्वेताणु तथा दोनों के न मम वे प्रतिक्रिया जो सह होती है से बना है। इन श्वेताणुओं का आधार रक्ताणुओं तथा जमाणुओं सहित आधार कोषिकाएं या स्टेम सेल हैं जो मज्जा (बोन मारो) से उत्पन्न होते हैं। राकगाणुओं के नमम को माक्रोफेज (महाखाऊ) खा लेते हैं और एण्टीजन (न मम) एण्टीबॉडी (न तन) रोगाणुओं से लड़ने की शक्तिरूप में बदल जाता है। महाखाऊ के कारण स्टेम (आधार) रक्त कोषिका से थाइमस उत्सर्ज तथा अज्ञात स्थल उत्सर्ज (टी और बी लिम्फोसाईट) आपस में सहयोग करते त्रि-बन्धन बनाते हैं। इस बन्धन से टी लिम्फोसाईट का उत्सर्जन बढ़ जाता है और रोगाणुओं को पहचानने, बांधने (विपरीत आयन या जकड़खांचे द्वारा) और नष्ट करने की शक्ति भी बढ़ जाती है। इस महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया से जीनेटिक कोड़ द्वारा निर्देशित माइक्रोसोप क्षेत्र द्वारा उत्सर्जित ग्लाइकोप्रोटीन (शर्करा प्रोटीन मिश्र) स्व-स्वस्थन उत्प्रेरक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
जिस व्यक्ति का अस्तित्व तप-भरा, प्रतिबोध-ऋद्धिभरा, अवबोध-सिद्धिभरा, अन्तर्बोध-तितिक्षाभरा (सत्य हेतु मानसिक तपभरा) होता है वही व्यक्ति प्रज्ञा-साध होता है या उसकी प्रज्ञा ऋतम्भरा होती है। ऐसे व्यक्ति के विचारों के एकत्व, समत्वभाव कमसे कम इक्कीस मिनट तक सातत्य स्थिति के कारण जिनेटिक कोड़ पर टंकित होकर कोषिका क्रियाओं उत्सर्जों को समत्व तथा एकत्वपूर्ण करता है जिससे मानव का स्व-स्वास्थ्य संस्थान सशक्त होता है और मानव रोगमुक्त रहता है।

१५. ‘अन्तर्साधना’
अन्तस स्व, आत्म तथा ब्रह्म सानिध्य से निर्मित है। अन्तर्साधना अन्तस के गहनतम ब्रह्म पर सिद्ध होती है। यह देव व्यवस्था से प्रारम्भ होती है। देव उसे कहते हैं जो हमें बोध देते हैं। द्यौ, अन्तरिक्ष, धरा में ग्यारह-ग्यारह करके कुछ तैंतीस देव रहते हैं। ये ग्यारह-ग्यारह पंच समूहों में हमें अनुभव देते हैं। पाश्चात्य दार्शनिक जॉन लाक का सिद्धान्त है कि हमारा अस्तित्व एक आइना है जिसमें संसार चित्र आने-जाने का नाम अनुभव है। इस सिद्धान्त का नाम अनुभव-वाद है। वैदिक अनुभववाद लाक के सिद्धान्त का सूक्ष्मरूप या बीज रूप है और अधिक वैज्ञानिक है। पांच इन्द्रियों का सम्पर्क ग्यारह भू स्थानीय देवताओं ग्यारह अन्तरिक्षस्थानी देवों ग्यारह द्यौस्थानीय देवों से होता है। इनका विस्तार फैक्टोरियल पांच गुणा फैक्टोरियल तैंतीस होता है। इतने से हमारा बोध अस्तित्व या अनुभव अस्तित्व बना है। यह यास्कीय वैज्ञानिक अनुभववाद है। अन्तस से बाह्य तक इन देवताओं का तन्तुं तन्वम् विस्तार है। इस पूरे विस्तार को ब्रह्म-जागृत करने का नाम अन्तर्साधना है। इस साधना के पांच प्रारूप हैं। १. अन्तर्मौन, २. अन्तर्स्पर्श, ३. अन्तर्-रूप, ४. अन्तर्रस, ५. अन्तर्गन्ध। शब्दन, स्पर्शन, रूपन, रसन, गन्धन की क्रमशः इन्द्रियां कान, त्वचा, नेत्र, रसना, नासिका हैं। पंच-देव क्रमशः आकाश, वरुण, ज्योति, आप, पृथ्वी हैं। इन पांच साधनाओं में अन्तर्मौन साधना प्रारूप इस प्रकार है-
अ) अन्तर्मौन साधना :
१. स्थिरं सुखमासनम् : कुर्सी पर आरामपूर्वक बैठकर या साधना आसनों में किसी एक आसन में बैठकर या चैतन्यासन में शिथिलता पूर्वक लेटकर पूरे तन को सहज स्थिति में रखते, पीठ, गर्दन, सिर एक रेखा में रखने का नाम स्थिर सुख आसन है।
२. स्व-आकलन : बायां या दायां या दोनों हाथ सिर पर मूर्धास्थान हलका दबाव देते मूर्धन्य स्वर ऋ या लृ का उच्चारण करना। उच्चारण समय सिर में हुए प्रकम्पनों को अनुभव करना तथा उन्हें स्मरण रखना।
३. सुषुम्णा-स्वरन : आती जाती श्वास-प्रश्वास को तीन बार तटस्थ देखना फिर ऐच्छिक रूप से श्वास-प्रश्वास को क्रमशः बाएं-दाएं नथुनों से लेना या इसका प्रयास करना सुषुम्णा स्वरन है। इससे साधना की उपयुक्त स्थितियां सधती हैं।
४. आकाश मौन : आकाश को कानों से व्यापक रूप में मौन स्वर गूंज रूप में अनुभूत करना।
५. सर्वशब्द : आकाश में व्याप्त तथा आस-पास की सारी की सारी आवाजों को तटस्थ रहते सुनते जाना, सुनते जाना।
६. अनुगुणित तैंतीस शब्द : सारे आकाशीय शब्दों का एक-दूसरे से मिश्र रूप देखना। इसे शब्द उफान या ध्वनि उफान या आवाज उफान कहा जा सकता है।
७. तैंतीस शब्द : सारे शब्द तैंतीस मूल इकाइयों से बने हुए हैं। इन मूल इकाइयों की अनुभूति करना।
८. एक शब्द : किसी एक शब्द पर ध्यान।
९. अशब्द : निर्विषय हो जाना।
१०. आदि शब्द : सर्वत्र सम सहज शब्द अहसास।
११. अति शब्द : आदि शब्द का वह रूप इसमें व्याप्त है।
१२. अंगी शब्द : हमारे अंग-अंग में रचा-पचा आल्हादन शब्द।
१३. अंतस शब्द : विचार धरातली शब्द।
१४. स्व शब्द : परा स्थलीय शब्द।
१५. आत्म शब्द : परापार शब्द।
१६. ब्रह्म शब्द : शब्द है ब्रह्म। शब्द ब्रह्मभाव अन्तर्मौन साधना की सिद्धि है। इस भाव में यथा समय कम से कम इक्कीस मिनट तक रहना।
१७. स्थिति क्रम संख्या ३ और २ का दुहराव
अन्तर्मौन साधना के बिलकुल समानांतर अन्तर्स्पर्ष, अन्तर्-रूप, अन्तर्रस, अन्तर्गन्ध साधनाएं हैं जो स्पर्श है ब्रह्म, रूप है ब्रह्म, रस है ब्रह्म, गन्ध है ब्रह्म के रूप में सिद्धि देते हैं। अन्तर्साधना के लाभ इस प्रकार हैं :
१. पूर्णतः तनावमुक्ति प्राप्त होती है।साधना सिद्ध को कभी भी रक्तचापवृद्धि, हृदयरोग नहीं होगा। रक्तचाप या हृदयरोगी अगर इसे नियमित करते हैं तो क्रमशः रोगों का शमन होता जाएगा।
२. सर्व से अंश चिन्तन प्रक्रिया का विकास होता है। मानव में इससे विवेक का उदय होता है।
३. मानव तटस्थभाव चीजों को देखना सीखता है। इससे न्याय दृष्टि विकसित होती है। मानव पक्षपात रहित हो जाता है।
४. बोध संस्थान सशक्त होने से परिस्थितियों का मानव ठीक-ठीक आकलन करके उनका सामना अधिक सहज तरीके से करता है।
५. मानव चेतना का विस्तृतीकरण होकर वह मानव का सौम्यन करती है।
६. अन्तस सशक्त होने से स्व-स्वास्थ्य-संस्थान भी सशक्त होता है।
७. शुभ ही शुभ साधना होने के कारण जीनेटिक कोड पर टंकित हो जाने के कारण जीवन आयोजनमय सहज शान्त होता है। चयापचय तथा शक्ति उत्सर्ज सौम्य होने से विषय संग, क्रोध, सम्मोह, स्मृतिभ्रंश, बुद्धिनाश तथा सर्वनाश की नौबत नहीं आती है।
८. इन्द्रियां तथा इन्द्रियभाव सूक्ष्म अर्थात् सशक्त होते चले जाते हैं। पांचों इन्द्रियों में ब्रह्म-आत्म-स्व भाव तारतम्य से उनमें सामंजस्य होता है तथा इन्द्रियां क्रमशः देव-व्यवस्था व्यापक होती चली जाती हैं। इससे बोध संस्थान वैज्ञानिक होते शक्तिकृत होते जाते हैं।
९. जीवन में सामंजस्य के कई स्वर एक साथ उभरने लगते हैं। तथा जीवन आनन्दमय हो जाता है।

१६. ‘‘समय-भ्रंश रोग’’
समय जो सुनियोजित नहीं है मानव को समय-भ्रंश रोगों से युक्त कर देता है। आरम्भ अव्यक्त मध्य व्यक्त अन्त अव्यक्त समय का स्वरूप है। मध्य व्यक्त समय ही जीवन कहलाता है। जीवन में क्षेत्रविशेष में निर्धारित धर्म हेतु सतत श्रम का नाम आश्रम है। जीवन चार आश्रमों में सतत श्रम हेतु उपलब्ध है। पच्चीस वर्षों तक ब्रह्मज्ञान प्राप्ति हेतु श्रम, पच्चीस वर्षों तक आजीविका हेतु ब्राह्मण या क्षत्रिय या वणिक या शिल्पकार धर्म हेतु श्रम, पच्चीस वर्षों तक ब्रह्मज्ञानमय जीवन तथा ज्ञान वितरण हेतु श्रम, और अन्तिम पच्चीस वर्ष ब्रह्ममय साधना हेतु श्रम। इसके मध्य सोलह संस्कारों तथा संस्कारोचित कर्त्तव्यों हेतु श्रम का विधान वैदिक जीवन समय आयोजन है। इसके साथ दैनिक प्रति प्रातः सायं पंच यज्ञ एवं समय-समय पर ऋतु सन्धि आदि यज्ञों हेतु श्रम प्रावधान भी वैदिक समय आयोजन के भाग हैं। यह सम्पूर्ण कालयोग का समरूप है जो उम्र दोष, भूख-प्यास से उत्पन्न दोष, मृत्युदोषों को नियन्त्रण में रखता है। यह शतवर्ष काल का समयोग है। यदि इस आयोजन में समयभ्रंश होता है या इनका अतियोग, मिथ्यायोग, हीनयोग आदि होता है तो उसके अनुपातिक उल्लंघन के रूप में मानव में भूख-प्यास में व्यतिक्रम या भ्रंश होने से पेट तथा तन सम्बन्धी रोग, ब्रह्मचर्याश्रम कम या अधिक तथा गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासाश्रम आदि कमाधिक होने पर जरावस्थासम्बन्धी कमजोरियों का शीघ्र आना एवं संस्कार, पंच ऋतु यज्ञ आदि व्यवधानों के कारण, दैविक रोगों के कारण तथा उपरोक्त कारणों से भी शीघ्र या कम उम्र मृत्यु रोगों की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। समयभ्रंशता बचाव को आयुर्वेद में हेतु-सूत्र कहते हैं। हेतु-सूत्र महान समय आयोजन है। इसका महासूत्र है- ‘‘अस्थाई अब हम सतत अब ब्रह्म युजित हों। कृपया काल-मिथ्यायोग समयभ्रंश रूप में भी पढ़ें।

१७. ‘‘इन्द्रिय-भ्रंश’’
इन्द्रिय तथा उस इन्द्रिय के अर्थ के साथ समयोग स्वास्थ्यवृद्धिकारक है। अन्तर्साधना में इन्द्रिय का समरूप वितान दर्शाया गया है। इस रूप में व्यवधान इन्द्रियभ्रंश है। इस व्यवधान कास कारण अतियोग, मिथ्यायोग, हीनयोग है। मिथ्यायोग का विवरण पूर्व में दिया जा चुका है। हर इन्द्रिय की विषय को ग्रहण करने की एक सीमा है। उस सीमापार विषय ग्रहण करने के लिए संसाधनों की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार ग्रहण सीमा में एक दहलीज सीमा होती है जिससे अधिक में रहने से विभिन्न मानसिक एवं शारीरिक रोग इन्द्रियजन्य रोगों सहित हो जाया करते हैं। आवाज के क्षेत्र में १५ से २५ डेसिबल की आवाज में आवाज प्रभाव दृष्टि से मानव मस्तिष्क सर्वाधिक क्षमतायुक्त होता है। इससे कम या अधिक आवाज क्षेत्र होने पर मस्तिष्क क्षमता का ह्रास होता है। शरीर में कर्णेन्द्रिय में एक लचीलापन होता है। इस कारण से ९० डेसीबल आवाज के क्षेत्र आठ घण्टे लगातार रहने की सीमा तक कर्णेन्द्रिय स्व-स्वस्थता को पुनः प्राप्त कर लेती है। आठ घण्टे से अधिक सीमा पर उसकी क्षमता में स्थाई कमी होना शुरु होती है। इसी प्रकार और अधिक आवाज क्षेत्र में यह प्रभाव कम समय सीमा में ही देखा जा सकता है। आयुर्वेद इसे अतियोग कहता है जो रोगकारक है। कम आवाज क्षेत्र में प्रयोग नहीं किए गए हैं। पर आयुर्वेद का मानना है कि कम आवाज क्षेत्र भी मानव के लिए रोगकारक होता है। पढ़ने के क्षेत्र में आयुर्वेद की दृष्टि सिद्ध है। सतत निकट दृष्टि होने से मानव का दूर दृष्टि क्षेत्र हीनयोग होने के कारण नजर कमजोर हो जाती है तथा निकट दृष्टि के क्षेत्र में अतियोग हो जाने से वह भी कमजोर हो जाती है। अतियोग तथा हीनयोग कका पांचों इन्द्रियों पर अपने-अपने क्षेत्र प्रभाव पड़ता ही है। सारी इन्द्रियों के इकट्ठे अतियोग, हीनयोग का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।
इन्द्रियभ्रंश वात-पित्त-कफ के असन्तुलन का कारण होता है। इन्द्रियभ्रंश से इन्द्रियां कमजोर होती हैं। अतः ग्राह्य-अग्राह्य के सूक्ष्म भेद को पहचान नहीं पाती हैं। इस कारण से कफ-पित्त-वात का असन्तुलन होता है। स्वस्थ शरीर में अतिरिक्त पदार्थ कफज, वातज, पित्तज निकालने की सहज क्षमता होती है। इन्द्रियभ्रंश से हुई कमजोर इन्द्रिय के कारण यह क्षमता कम हो जाती है और त्रि असन्तुलन पैदा होता है जो रोगकारक है।
इन्द्रियभ्रंश मानस को भी प्रभावित करता है। मानस सत-रज-तम से निर्मित है। सत निःसन्दिग्ध रूप से लाभप्रद है। रज तम अपवादस्वरूप लाभप्रद और सामान्यतः हानिकर हैं। इन्द्रियभ्रंश से सत-रज-तम की समझ कम हो जाने के कारण इनका लाभप्रद स्वरूप समझ में नहीं आता है तथा हानि होती है।

१८. ‘‘प्रज्ञा-अपराध रोग-प्रभाव’’
प्रज्ञा अपराध के कारण मानसिक विक्षेप पैदा होते हैं। इससे सूक्ष्म धरातलीय प्रभाव होते हैं जो कालान्तर में रोग में बदल जाया करते हैं। सत-रज-तम गुण मानस को प्रभावित करते हैं। इन्द्रियभ्रंश प्रभाव सत-रज-तम के असन्तुलन से पता चलता है। प्रज्ञा इससे कहीं अधिक सूक्ष्म धरातलीय है। प्रज्ञा अपराध से- १. धी-भ्रंश, २. धृति-भ्रंश, ३. स्मृतिभ्रंश होते हैं। स्मृतिभ्रंश से बुद्धिनाश और बुद्धिनाश से सर्वनाश तक का सफर होता है। धृति-भ्रंश से स्व-नाश से सर्वनाश सफर तय होता है। स्मृति आत्म से युजित है। धृति भी आत्म से स्व के माध्यम से जुड़ी है। धी-भ्रंश आत्मभाव व्यवधान या आत्महना भाव पैदा करता है। आत्महना भाव का सातत्य अति कालान्तर में जिनेटिक बीमारियों को उत्पन्न करता है।
परमात्मा ने आत्महना लोगों के लिए अन्धे तमस से आवृत एक लोक बनाया है। यह लोक वास्तव में भयावह न ठीक होनेवाली बीमारियों का लोक है। धीभ्रंश, धृतिभ्रंश, स्मृतिभ्रंश विक्षिप्तता रोगकारक भी हैं जिनमें तारतम्य टूट जाता है।
‘‘प्रज्ञा साध’’ होना उपरोक्त बीमारियों का इलाज है।

१९. ‘‘वेग अवरोध रोग’’
वेद कहता है इस शरीर रथ का सुखम् रूप आरोहण हेतु है। यह शरीर वास्तव में सुखं रथम् है। इसमें हर ग्रहण सुखद है तथा हर त्याग सुखद है। त्यागने का सुख हमें तब पता चलता है जब कभी यह सुख हमसे छिन जाया करता है। किसी की डकार किसी कारण से भीतर ही रुक जाए तो मानव को कितनी परेशानी और घबराहट होती है। यही स्थिति मल-मूत्र अवरोध की भी है। निष्कासन योग्य वस्तुओं का निष्कासन न होना कष्टकर तथा असुविधाजनक होता है। जिस प्रकार यह अवरोध विपरीत लक्षणकर है उसी प्रकार निष्कासन योग्य पदार्थों को सप्रयास रोकना भी हानिकारक है। मल, मूत्र, मलवायु, उल्टी आदि निष्कासनीय है। इनके रोकने से निम्नलिखित व्याधियां उत्पन्न होती हैं।
मूत्रवेग अवरोध : तलपेट में दर्द, लिंग में दर्द, अल्पमूत्रता, सिरदर्द, वृक्कशूल।
मलवेग अवरोध : पक्वाशय शूल, आन्त्र-शूल, सिर दर्द, अपानवायु कोप, कब्ज, मरोड़, दर्द।
मलवात अवरोध : अपान दबाव घबराहट, मल-मूत्र अवरोध, थकान, आंत दर्द।
उल्टी अवरोध : चिनचिनाहट, अरुचि, घबराहट, नाक से पानी बहना, सूजन, रक्ताल्पता।
छींक अवरोध : चिनचिनाहट, अरुचि, दम घुटना, सिर दर्द, आंशिक पक्षाघात, नाक से पानी आना।
डकार अवरोध : घबराहट, हिचकी, हृदय या छाती में जकडन सा लगना।
जम्हाई अवरोध : वात लक्षण, कम्पन, परेशानी, अंग सिकुड़न,
अश्रु अवरोध : नेत्र रोग, मोतियाबिंद, हृदयरोग, भोजन में अरुचि।
समस्त प्राकृतिक त्यागन शरीर के सुखम् आरोहण का मूल है। इनमें ऐच्छिक व्यवधान पैदा करना शरीर को दुःखम् कर देता है।

२०. ‘‘ग्रहण वेग अवरोध’’
हर सहज ग्रहण शरीर को सुखद है। उपवास का गलत अर्थ प्रचलन में हो जाने से भारत में बीमारियों की वृद्धि हुई है। उपवास का सरल अर्थ है निकट वास या गहन वास। मानव का गहनवास तब होता है जब वह आधिभौतिक (शरीरस्तर), आधिदैविक (इन्द्रिय तथा देव स्तर) आध्यात्मिक (स्व-आत्मा स्तर) सहज शान्त होता है। उपवास का वर्तमान प्रारूप शरीर स्तर पर मानव को असहज अशान्त करता है। अतः निकटवास या गहनवास के द्वार ही बन्द कर देता है। इस लिए इसे उपवास न कह ‘अपवास’ या ‘दुःखवास’ कहना उचित है। भूख, प्यास, श्वास को अकारण रोकना सुखम् शरीर को दुःखम् करने के कारण अवैदिक है। इनसे निम्नलिखित अपवास लक्षण या रोग पैदा होते हैं।
भूख को रोकना : अन्न प्रणियों का प्राण है। इसे आवश्यक होने पर ग्रहण न करना पेट में स्राव असन्तुलन उत्पन्न करके चयापचय तथा ओषजन ग्रहण कार्बन द्विओषिद त्यागन स्तर तक अस्त-व्यस्तता उत्पन्न करता है। अतः इससे शक्तिहीनता, चक्कर आना, अंग दर्द, भोजन अरुचि, अनिद्रा, सिरदर्द आदि लक्षण पैदा होते हैं।
प्यास को रोकना : जल ही जीवन है, जीवन को लालसा है जिसकी वह जल है। स्पष्ट है जलाभाव सीधे जीवनशक्ति को दुष्प्रभावित करता है। जल की अल्पता के कारण मुंह और गला सूखना, बहरापन, थकावट, अवसाद, हृदयरोग, वृक्करोग, त्वक्रोग होने की सम्भावनाएं हैं।
मेहनत बाट श्वास रोकना : इससे प्राण कुपित होते हैं, प्राण के साथ अपान भी कुपित होते हैं। रक्त में ओषजन की मात्रा का असन्तुलन होने के कारण हृदय के कपाट (वाल्वों) पर अधिक दबाव पड़ता है। हृदयरोग की सम्भावना बढ़ जाती है।
आती निद्रा को रोकना : सहज शान्त, गहन शान्त, अन्धकार में अभानित होना निद्रा है। निद्रा रोकने का प्रयास करने से अंग टूटना, शक्तिहीन होना, तन्द्रा, सिरदर्द, चिड़चिड़ापन, नेत्रों में भारीपन, जंभाई आना आदि लक्षण पैदा होते हैं।

२१. ‘‘समग्र रोग निवारण तरीका’’
किसी वस्तु को यथावत न समझना समस्त बीमारियों की जड़ है। जो वस्तु जैसी है उसको वैसा ही समझना तथा उसका वैसा ही प्रयोग करना या उससे वैसा ही व्यवहार करना प्रज्ञा साध होना है। प्रज्ञासाध व्यक्ति दूसरे की उन्नति में प्रसन्न, आनन्दमय, अभय, शान्त, अहंकार-रहित, स्वाभिमानी, अद्वेषी, अहिंसामय अर्थात् प्रज्ञा अपराध रहित, शान्त इन्द्रिय, स्मरणशक्ति सम्पन्न, देशकाल-स्थान, परिस्थिति तथा अध्यात्म ज्ञान अनुरूप आचरण करनेवाले, अध्यात्म ज्ञान सम्पन्न और सद्वृत का पालन करते हैं। प्रज्ञासाध व्यक्ति ईर्ष्या, शोक, भय, क्रोध, अहंकार, हिंसा और द्वेष आदि के आवेग प्रवहणों तथा टंकनों से जिनेटिक कोड या तन्तुं तन्वम् घटिया न करने के कारण चय-अपचय विसंगतियों तथा शरीर के अंगों विशिष्टतः मस्तिष्क तथा हृदय में रक्त प्रवहण के सहज आधिक्य होने के दुष्प्रभाव से बचे रहते हैं। इसी कारण उनके समस्त अंगों में रक्त प्रवहण सदा समुचित पर्याप्त रहता है अतः उन्हें रोगाणुओं का घर नहीं बनने देता है। आवेगों के कारण जब हृदय में रक्ताधिक्य होता है तो धमनियों में तीव्र प्रवहण के कारण वह तलछट छोड़ता है जो कालान्तर में हृदयाघात का कारण बनता है। इसी प्रकार मस्तिष्क में रक्ताधिक्य से वहां धमनियों में तलछट से अवरोध होने के कारण मस्तिष्काघात होता है। हृदयाघात और मस्तिष्काघात के मध्य की अवस्थाओं में शरीर के अंग विभिन्न रोगाणुओं का शिकार होते हैं तथा कई बामारियों को जन्म देते हैं। इसी के समानान्तर रक्त अल्पता से ग्रन्थियों के स्राव दुष्प्रभावित होने से मधुमेह, पथरी, वातज जमाव (प्यूरिन जमाव) आदि रोग होते हैं। उच्च रक्तचाप तथा कम रक्तचाप के कारण भी हृदय या मस्तिष्क में आवेग के कारण रक्ताधिक्य का बारम्बार होना है।
इस प्रकार प्रज्ञासाध होने का मूल मन्त्र ‘यथावत’ सदा स्वस्थन का आधार है।

२२. ‘‘संग-असंग’’
यह विज्ञानसिद्ध तथ्य है कि स्व-स्वस्थन शक्ति स्वस्थ सामाजिक सम्बन्धों की संख्या के समानुपाती होती है। जितने अधिक स्वस्थ सामाजिक संम्बन्ध व्यक्ति के होते हैं उतनी ही अधिक उसमें रोगों से लड़ने की या स्व-स्वस्थन की शक्ति होती है। स्वस्थ सामाजिक सम्बन्ध दुर्जनों के साथ नहीं रखे जा सकते। दुर्जनों के साथ रखे गए सम्बन्ध स्व-अस्वस्थन करते हैं।
दुर्जनों के लक्षण हैं- विचार, मन, संकल्प, आचरण से पापमय व्यक्ति, अनावश्यक, असत्य, मर्मभेदी, उपहास करनेवाले, लोभी, धूर्त, दूसरों की उन्नति सहन न करनेवाले, कामुक, जड़-मूर्ख, दूसरों का अनादर तथा निन्दा करनेवाले, अपने ही शत्रुभावों को पोसनेवाले, अपना जिनेटिक कोड गलत सोच-सोच कर विकृत कर लेनेवाले, दया रहित, मानवतारहित, अधार्मिक, अतार्किक तथा अधम व्यक्ति। इनसे मित्रता हमेशा स्व-स्वास्थ्य संस्थान को कमजोर करके शरीर को रोगों का घर बना देती है। इसके विपरीत जो व्यक्ति बुद्धि, विद्या, अवस्था, शील, धीरता, स्मरणशक्ति, धारणा, ध्यान, समाधि में लगनशील तथा परिपक्व या श्रेष्ठ, वृद्ध तथा निःशक्त जनों की सेवा करनेवाले, दूसरों के स्वभाव का आदर करनेवाले, शारीरिक तथा मानसिक दुःखों से मुक्त, शंकारहित, मानवतामय, उत्तमवाक्, शान्त, सत्यवादी, सत्याचरणी, उत्तम बातों के उपदेशक और पुण्यात्मा हों उनसे मित्रता हमेशा स्व-स्वस्थ्य-संस्थान को शक्तिकृत करती है और रोगमुक्त स्वस्थ जीवन को देनेवाली होती है।
सत्संग हमेशा मानव को श्रेष्ठ पथ की प्रेरणा देता है तथा शिशुओं का स्वस्थ तथा अस्तित्व पहचान संकट रहित विकास करता है। यह कल्याणकर पथ है।

२३. ‘‘सद्व्यवहार आरोग्य द्वार’’
सद् व्यवहार आरोग्यता का द्वार है। सद् व्यवहार मानव को स्थैर्य एवं सन्तुलन देता है। उसे सहज शान्त करता है। इस सद्व्यवहार से प्राप्त शान्ति से मानव के रक्त का संचरण शरीर के हर अंग में सम और सौम्य होता रहता है। अतः चय-अपचय पोषण, पालन, ग्रहण, निष्कासन सम होता है इसलिए मानव स्वस्थ होता है। कुछ सद् व्यवहार इस प्रकार के हैं- अ) १. देव, २. गो, ३. विद्वान्, ५. उम्र, ६. ज्ञानवृद्ध, ७. सिद्ध, ८. आचार्य, ९. विनयवृद्ध, १०. कुलवृद्ध से गुणग्रहण के कारण उनका अर्चन।
देव से उदात्त गुणदान, गो से दुग्धदान कल्याण, स्नेहन, विद्वान् से ज्ञानसूत्रों का लाभार्थ, सत्तार्थ, विचारार्थ तथा ज्ञानार्र्थ प्रयोग, गुरु से अपनों तथा दूसरों का अज्ञान दूर करना, उम्रवृद्ध से भविष्यदृष्टि, ज्ञानवृद्ध से ज्ञानसूत्र, सिद्ध से साधना विधियां, आचार्य से गुणमय आचरण की विधियां, विनयवृद्ध से अभिवादनशीलता, और कुलवृद्ध से कुलीनता सीखना चाहिए।
ब) शौच नियमों का १. द्वादश द्वार शुद्धि, २. त्रय (केश, दाढ़ी-मूंछ, नख) कर्तन, ३. वस्त्रशुद्धि, केश संवारना, तेल मार्जन, अंगशुद्धि, ४. जीर्णवस्त्र, हड्डी, कांटा, कर्तित या झड़े केश, तृण, कूड़ा-कर्कट सफाई नियमबद्ध होकर करनी चाहिए। स्वच्छ साबुत वस्त्र धारण करने चाहिएं।
स) प्रतिदिन अंगों पर तेल मर्दन, बालों में कंघी, ऋतु अनुकूल सुगन्ध प्रयोग, होमादि करना चाहिए।
द) आगन्तुक से प्रथम बात करना, प्रसन्नमुख रहना, पर आपत्ति का निराकरण करना, समयोजित अल्प, हितकर, मधुर, उदात्त वचनों का प्रयोग करना चाहिए।
ई) पर उन्नति कारणों में प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए किन्तु पर फल प्राप्ति में कभी प्रतिस्पर्धा नहीं करनी चाहिए। क्रोधी को विनय से, भयभीतों को आश्वासन से, दीनदुःखियों को उपकार से जीतने का भाव रखना चाहिए।
फ) सत्यप्रतिज्ञ, शान्तिप्रधान, समानदृष्टा, निश्चिन्त, निडर, बुद्धिमान, उत्साही, चतुर, क्षमायुक्त आस्तिक होना चाहिए।
य) निम्नलिखित न करें- १. असत्य बोलना, २. परधन ग्रहण, ३. शत्रुता, ४. पाप, ५. परदोष कथन, ६. अधार्मिक, राजा, शत्रु, पागल, पतित, भ्रूणहत्यारे, दुष्ट के साथ बैठना, असुरक्षित वाहन में बैठना, उबड़-खाबड़ शय्या पर शयन, नदी कगार के छांह में बैठना, जोर से हंसना, शब्दयुक्त अपानवायु का त्याग, नख बजाना, भूमि को नख से कुरेदना, दांत किटकिटाना, रात्रि में देवमन्दिर, उपवन, स्मशान, वधस्थान, शून्यगृह और जंगल में निवास न करें, अधिक जागरण या अधिक सोना, उत्तम पुरुषों से विरोध, नीच पुरुषों से स्नेह, अतिस्नान, अतिभोजन, अतिजलपान आदि न करें।
र) भोजन सद्व्यवहार :- १. मित भोजन, २. हित भोजन, ३. ऋत मोसमानुकूल भोजन, ४. सात्विक भोजन, ५. कार्य कैलोरी भोजन कैलोरी अनुपात १० : ८ हो, ६. उदात्त वाक्य बोले बिना भोजन न करें, ७. प्रसन्न चित्त भोजन करें, ८. झूठे मुंह, बिना हाथ धोए भोजन न करें, ९. भोजन की निन्दा करते भोजन न करें, १०. बासी भोजन न करें, ११. ‘‘अन्न है ब्रह्म’’ भाव या अन्न है बहुमूल्य समझकर भोजन करें।
ल) सामाजिक सद्व्यवहार :- १. समयायोजन करें, २. संस्था नियमों का पालन करें, ३. लोभी, मूर्ख, दुःखी, दुर्गुणी, नपुंसक से मित्रता न करें, ४. किसी का तिरस्कार न करें, ५. मित्र बताई बातें गुप्त रखें, ६. कार्यकुशलता प्राप्त करें, ७. आजीविका धर्म दृढ़ रहें, ८. परनिन्दा, अभिमान, आक्षेप, बकवाद, विवाद न करें, ९. किए जानेवाले कार्य की औचित्य परीक्षा करें, १०. ली गई सेवा का शुल्क अविलम्ब पटाएं, ११. हमेशा वैचारिक दुनिया में न रहें, १२. मित्रगण पर अविश्वास न करें, १३. अन्धविश्वास न करें, १४. स्वच्छन्द व्यवहार से बचें, १५. दीर्घसूत्री, आलसी, टाल-मटोलू न बनें, १६. हर्ष या शोक के वशीभूत होकर कार्य न करें, १७. कार्यसिद्धि या असिद्धि सम रहने का प्रयास करें, १८. ऋत नियमों का पालन करें, १९. कारण सिद्धान्त का ज्ञान, उपयोग ज्ञान रखें, २१. अपमान पर बदलाभाव न रखें।
व) मानवाधिकारों का पालन करें। वैदिक मानवाधिकार हैं :- १. ब्रह्मचर्य, २. अहिंसा, ३. सत्य, ४. अपरिग्रह, ५. अस्तेय, ६. दान, ७. ज्ञान, ८. मित्रता, ९. हर्ष, १०. शान्ति, ११. उपेक्षा = असाध्य या सुधार अयोग्य लोगों से दुराव रखें। (अधूरे आलेख के लिए पाठकों से क्षमा चाहते हैं..!! …“आर्यवीर”)

स्व.डॉ.त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय

पी.एच.डी. (दर्शन – वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (आठ विषय = दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)

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