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“प्राकृतिक संरक्षण का प्रश्न ?”

कल्याणमयी, सुरक्षित, विस्तृत सुआधार, सुज्योतित, उथल पुथल रहित, उत्तम सुखदायक, अंखंडित, दक्षतापूर्वक निर्मित एवं चलित, उत्तर आधार युवा, निर्दोष तथा छिद्र रहित अन्तरिक्ष नाव धरती का हम आरोहण करें । ऋग्वेद 10/63/10

वेद की उपरोक्त भावना में प्राकृतिक संपदा संरक्षण का बीज सूत्र दिया है । अन्तरिक्ष यान द्वारा मनुष्य की मंगल बृहस्पति ग्रह यात्रा के पथ में सबसे बड़ी रुकावट धरती से साथ ली गई संपदा (भोजन, ओषजन, जलादि) के संरक्षण की है । यानि चाहे अंतरिक्ष यान हो या वायुयान हो या जलयान हो या धरायान हो या सौर्यमंडल यान हो इसकी एक सीमा है । यह सीमा इन यानों पर उपलब्ध संपदा के आंकलन, दोहन, पुर्नस्थापन के विषय में महत्वपूर्ण है ।

प्राकृतिक जगत स्वतंत्र नहीं है । सुव्यवस्थित अवश्य हैं । मधुमक्खी या दीमक या चींटी व्यवस्थाओं में बहुत कम खोट है । रानी, सेवक, निर्माता, खोजी, सूचक, युद्धक, उत्पादक अपने अपने क्षेत्र दायित्व सीमा में ही पूरा कार्य करते हैं । वे प्राकृतिक रूप में कार्यबद्ध हैं स्वतन्त्र नहीं है । मनुष्य का सौभाग्य है कि वह उन्नति कर सकता है । स्वप्रयास स्वतंत्रता का उपयोग कर सेवक से राजा, उत्पादकादि भी बन सकता है । परन्तु यही स्वतन्त्रता मनुष्य का दुर्भाग्य बन गई और उसके प्राकृतिक संपदा के अति दोहन तथा असंतुलन दोहन के कारण प्राकृतिक संपदा के संरक्षण का प्रश्न उठ खड़ा हुआ है ।

1) अतीत संसाधन प्राकृतिक संसाधनों की सूची इस प्रकार है ।

2) सजीव संसाधन
अ) मनुष्य
ब) प्राणी जगत 1) प्रत्यक्ष उपयोगी – पालतू पशु, मछली आदि
2) अप्रत्यक्ष उपयोगी, अन्य पश, कीटाणु जीवाणु आदि ।

3) निर्जीव संसाधन:
अ) धुतिशील जगत – ग्रह, वसु
ब) अंतरिक्ष – वातायन त्रिस्तरीय
स) धरा – खनिज – 1) ठोस 2) द्रव
द) जल – पेय, उपयोगी तथा समृद्ध
इ) औषधि जगत – 1) कृमि, कीट, वायरस नाशक 2) स्वास्थ्य वर्धक
फ) वनस्पति जगत – 1) प्रत्यक्ष उपयोगी, – खाद 2) अप्रत्यक्ष उपयोगी – जंगलादि

उपरोक्त प्राकृतिक संसाधन सजीव तथा निर्जीव तेजी से हृासोन्मुख है । इसी कारण इनके संरक्षण का संप्रश्न उठा है । यह संप्रश्न वैदिक है । उपरोक्त प्राकृतिक संसाधन विभाजन का आधार यजुर्वेद अध्याय का सत्रहवां मंत्र है । इस मंत्र की भावना है कि अतीव संसाधन, सजीव संसाधन तथा निर्जीव संसाधनों में एक प्राकृतिक स्थैर्य तथा संतुलन बना रहे तथा वह मानव को सहज प्राप्त हो । आज के औद्योगिक, आर्थिक, युद्धक, विस्फोटों से यह संतुलन तथा स्थैर्य टूटने के कगार पर आ खड़ा हुआ है । इसी कारण प्राकृतिक संसाधन के संरक्षण का प्रशन इस तीव्रता से उभरा है । वर्तमान मानव से ”सर्व से अंश“ के मान नियम अंश अंश के भयानक दोहन में ध्यान नहीं रखा और वह स्वयं ही विसंगतियों का, परिस्थितियों का, प्रदूषण का शिकार होते चला जा रहा है ।

प्राकृतिक संसाधन दोहन का क्षेत्र भयावह है –
1) विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन ने 1969 में डी.डी.टी. का प्रयोग समाप्त करने का प्रस्ताव रखा क्योंकि डी.डी.टी. का प्रयोग समाप्त करने का प्रस्ताव रखा क्योंकि डी.डी.टी. द्वारा पक्षी एवं मछली जाति की कई प्रजातियों के नष्ट हो जाने का खतरा है । निर्धन राष्ट्रों ने प्रस्ताव नामंजूर कर दिया ।

2) विश्व में 275 पशु प्रजातियों के तथा 300 पक्षी प्रजातियों के नष्ट हो जाने की संभावना पर्यावरण प्रदूषण के कारण ही है ।

3) मछली उत्पादन में 1968 तक अभिवृद्धि हुई लेकिन 1969 से पांच प्रतिशत प्रति वर्ष का हृास होना प्रारंभ हो गया । अमेरिका के कुछ समुद्री किनारों पर खतरनाक पारे के स्तर युक्त मछलियां पाई गईं।

औद्योगिक विश्व में सजावट मछलियों के उपलब्धि भी चिन्तनीय सीमा तक आ पहुंची है । व्हेल उद्योग में समुद्र असामंजस्य के कारण व्हेल की कई प्रजातियां समाप्त होने के खतरनाक स्तर तक कम हो गई हैं ।

4) विश्व स्तर पर सीमित पर्यावरण बिना चिन्तन दोहन के करण समुद्र भोजन, प्राकृतिक ईंधन, जंगल उत्पादों, भूमि (खेती तथा निवास) स्वच्छ जल, शहर में भू जल उपलब्धि, औद्योगिक प्राकृतिक कच्चे माल के मूल्य में आशातीत वृद्धि के कारण विश्वव्यापी उद्योग विकास हृास का दौर शुरु हो रहा है । इसी कारण उन्नत औद्योगिक विश्व नई नीतियों के अंतर्गत अविकसित या विकासमान राष्ट्रों के संसाधनों को ललचाई नजर से देख रहा है ।

5) प्राकृतिक पर्यावरण पर सबसे बड़ा बोझ खाद तथा कीट नाशकों का है । ये धरा एवं मानव भक्षण (मानव स्वस्थता हृास) सीमा तक बढ़ चुके हैं ।

6) विश्व परिपेक्ष में पेट्रोलियम पदार्थों का उपयोग 4 प्रतिशत प्रतिवर्ष, शुद्ध जल उपभोग 3 प्रतिशत प्रतिवर्ष, मांसाहार उपयोग 4 प्रतिशत और रसायनिक खाद प्रयोग 7 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। प्रति दस वर्ष रसायनिक खाद का उपयोग दुगुना हो रहा है ।

7) रसायनिक खाद, कीटनाशक, औद्योगिक कचरे, अतिखंडनीय मानव उपयोग कचरे के कारण झीलें, नदियां, तालाब, कुएं निरूपयोगी जड़ होते चले जा रहे हैं । इसी कारण कई समुद्र तटों पर मछलियों, पक्षियों ने भी रहना छोड़ दिया है ।

8) ब्रिटेन उद्योग क्षेत्र का आकलन बनाता है कि उद्योग प्रदूषण के कारण श्वेत पक्षियों की प्रजातियां सौ सवा सौ साल में काली प्रजातियों में परिवर्तित हो गई । इस क्षेत्र में मानव-प्रजाति अध्ययन जरूरी है। कहीं पर्यावरण शोषण के कारण ही हम सब आतंकवादी, अमानवीय, स्वार्थी, सीमित हावी, सम्प्रदायी काली मानव प्रजाति तो नहीं हो रहे हैं ।

9) विश्व आर्थिक क्रिया विस्फोट के कगार पर उन्नति अग्रसर हैं । सारे विश्व में आर्थिक विस्फोट का औसतः अठाईस-तीस प्रतिशत युद्ध है जो मानसिक, प्राकृतिक, राजनैतिक प्रदूषण का प्रमाण है और सर्वोत्तम प्राकृतिक संसाधन मानव को सीधा प्रभावित करता है ।

10) कल का सपना कोई सुखद नहीं है । इसमें विषय सिंचित अनाज ताकि वह कीट से सुरक्षित रह सके, परमाणु विकरण रक्षित अनाज, जहरित डब्बा बंद खाद्य, का युग आ रहा है । प्राकृतिक संसाधन अनाज भी संरक्षण चाहता है ।

11) प्राकृतिक संसाधन आजोन, ओषजन भक्षण तथा शोर, गंध, वातायन प्रदूषण जाने माने हैं ।

यह स्पष्ट है कि प्राकृतिक संसाधन संरक्षण मानव की महती आवश्यकता है । यह एक विकराल प्रश्न है ? क्या इसका कोई उत्तर है । हम इस दिशा में सोचें ।
1) पहला उत्तर है दहलीज प्राकल्पना – डाक्टर मैसनीफ की दहलीज प्राकल्पना सीमा से अधिक औद्योगिक विकास पर हर राष्ट्र में रोक । उद्योग दहलीज सीमा है जिससे अधिक समृिद्ध मानव को दुखी कर देती हैं ।

2) दहलीज सीमा से अधिक शोर, गंध, वातायन, प्रदूषण उद्योग क्षेत्रों में भी दृढ़ता पूर्वक वर्जित ।

3) पुर्न उपयोग, पुर्न चक्रण, आत्म सात करना, शून्य प्रदूषण, अप-उपयोग का उद्योग, उत्पादकता, उत्पादन परिभाषाओं में ही समावेश ।

4) प्रजातंत्र के स्थान पर प्रजतंत्र व्यवस्था (शत प्रतिशत योग्यता अनुभव श्रेष्ठता धारित) को लागू करना जिससे विश्व गधे प्रजाननों के निर्णयों से दूषित – प्रति दूषित न हो ।

5) हर उद्योग के क्षेत्र में ”सांतसा“ लागू करना । ”सांतसा“ वह भविष्य की तकनीक है जिसके क्षेत्र में जापान, अमेरिका आदि राष्ट्र पहले कदम रख रहे हैं । सांतसा का अर्थ है सांस्कृतिक तकनीकी सामाजिक अर्थात वह तकनीक जो संस्कृति तथा सामाजिकता से इरी घिरी हो । यजुर्वेद का पर्यावरण मंत्र सांतसा का पर्यावरण संबंधी बीज मंत्र है ।

6) शिक्षा, उद्योग तथा जीवन के क्षेत्र में ”सर्व में अंश“ नियम का दृढ़ता पूर्वक अनुपालन । सर्व में अंश का बीज सूत्र तैतीस देवताओं की ब्रह्म, जगत, शरीर की उर्ध्व, मध्यम, निम्न अवस्था है ।

7) अर्थ एवं काम के विस्फोट धर्म एवं मोक्ष द्वारा समन्वित तथा सीमित हर विकासमान निर्णय में होने ही चाहिए ।

8) विष द्वारा संरक्षण का अभिवृद्धि वृति का पूर्णतः त्याग ।

9) हर मानव द्वारा, हर संस्था द्वारा, हर उद्योग द्वारा प्रदूषण से पूर्व ही प्रदूषण से अधिक स्वच्छता उपाय।

10) वृक्ष हरितमा नष्ट करना ही नहीं, वृक्ष हरितमा उत्पन्न न करना भी अपराध घोषित करना ।

11) नदी, झील, तालाब, सागर में या वातायन में अंशतः अन्य प्रदूषित पदार्थ विसर्जन भी अपराध घोषित करना ।

12) मानव क्षमता हानि की किसी भी स्थिति को कानूनी स्वीकृति न देना ।

स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय
पी.एच.डी. (दर्शन – वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (आठ विषय = दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)

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