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Today's Words

“पूजा”

प्रश्न : पूजा किसकी की जाती है ?
उत्तर : पूजा देवताओं की की जाती है।

प्रश्न : देवता कितने प्रकार के हैं ?
उत्तर : मूल देवता तीन प्रकार के हैं ईश्वर, जीव, जगत् के पदार्थ। जड़ और चेतन की दृष्टि से देवता दो ही प्रकार के हैं क्योंकि ईश्वर और जीव का चेतन वर्ग में ग्रहण होने से। ईश्वर परमदेव है जो एक ही है.. जीवों में हरेक के लिए मातृदेवो भव, पितृदेवो भव आचार्यदेवो भव अतिथि देवो भव तथा गृहस्थाश्रम में पति के पत्नी देवी तथा पत्नी के लिए पति देवस्वरूप होने से पंच देव माने गए है.. इनके अलावा जिन-जिन से हम ज्ञान आदि ऐश्वर्य पाते हैं वे सभी हमारे लिए देव तुल्य ही हैं। जड़ देवताओं के वर्ग में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश तथा इन पंच महाभूतों से बननेवाले संसार के अन्नादि सारे पदार्थ जिनसे हम अपना प्रयोजन सिद्ध करते हैं देव शब्द से ग्रहण किए जा सकते हैं।

प्रश्न : पूजा किसे कहते हैं ?
उत्तर : ऋषियों ने यथायोग्य सत्कार को पूजा नाम से माना तथा अपने ग्रन्थों में लिखा है। यथायोग्य सत्कार जिसका नाम पूजा है केवल चेतनों की ही नहीं अपितु जड़ों की भी होती है। तभी तो पर्यावरण शोधन के सर्वोत्तम उपाय याने जड़ देवताओं में सन्तुलन तथा परिशोधन हेतु किए जानेवाले सर्वश्रेष्ठ कर्म यज्ञ शब्द की व्युत्पत्ति में संगतिकरण और दान के साथ-साथ देवपूजा शब्द का विनियोग किया है।

प्रश्न : पर हमने तो पूजा नाम से एक ईश्वर की ही पूजा को जाना माना है.. जड़ों के पूजन को हम पाखण्ड जानते एवं मानते हैं..??
उत्तर : जी हाँ, आप के द्वारा पूजा शब्द को ईश्वराराधना तक ही परिसीमित या रूढ़ कर देने तथा तदनुकूल ही सोचने का प्रमाद अवश्य ही हुआ है.. इस भ्रांति से बाहर निकल आने के लिए समाज में प्रचलित कतिपय शब्दों की स्मृति दिलाना आवश्यक समझता हूँ.. क्या पेटपूजा शब्द आपने कभी नहीं सुना..? यदि हां, तो क्या पेटपूजा से आप का तात्पर्य ईश्वरोपासना ही है, या अन्य कुछ..?? भूमिपूजनम् शब्द के प्रयोग में भी आप से यही मेरा प्रश्न बनेगा..!!

प्रश्न : तो क्या आप वर्णित तीनों प्रकार के देवताओं की पूजाविधि एकसी ही है या अलग-अलग..?
उत्तर : अलग-अलग..!! तभी तो पूजा को परिभाषित करने के लिए यथायोग्य सत्कार नाम से कहा गया है.. आज समाज में अनेकों धार्मिक सम्प्रदायों के अपने आप को सम्भ्रान्त और सुपठित माननेवालों में ईश्वर जीव एवं संसार के पदार्थ इनका पृथक्-पृथक अस्तित्व बोध तथा स्वरूप ज्ञान में अनेकों भ्रान्तियां अथवा अज्ञान व्याप्त होने से पूजाविधि में अनेकों विकृतियां आ चुकी हैं.. जिसका परिणाम समाज में पूजा के नाम पर पाखण्ड को लगभग हर सम्प्रदाय में खुले आम विश्वभर में देख जा सकता है.. जिसके चलते युवापीढ़ी धर्म अध्यात्म और आस्था से विमुख होती जा रही है, इतना ही नहीं इन तीनों के यथार्थ शाब्दिक ज्ञान रखनेवाले आर्य समाजियों में भी पूजा शब्द के अर्थ को मात्र परमदेव ईश्वर के पूजन तक परिसीमित कर दिया गया होने से जड़ देवता होते भी हैं या उनकी पूजा सम्भव भी है इस पर पर्याप्त अज्ञान का कई स्वाध्यायशील सुपठित चिन्तकों में भ्रान्तिदर्शन का मेरा दुर्भाग्य रहा है..

प्रश्न : क्या मैं इन तीनों प्रकार के देवताओं के पूजन की प्रामाणिक तथा वैज्ञानिक विधि जान सकता हूँ..??
उत्तर : जी हाँ, अवश्य जान सकते हो..!! सर्वप्रथम समस्त देवों का भी परमदेव ईश्वर को लेते हैं- जो निराकार है, सर्वव्यापक है, सृष्टिकर्ता है, हम सभी जीवों का कर्मफलदाता है तथा अनादि काल से हम सभी के साथ-साथ ही रहता है.. (अर्थात् जिससे हम कभी अलग नहीं हुए न हो सकते..) जो हमारी शाश्वत माता-पिता-गुरु-बन्धु-सखा आदि है.. के पूजन विधि के दो प्रकार हैं पहली विधि दिवस और रात्रि की सन्धिकाल में आसन लगा, प्राणायाम कर, मन इन्द्रियों को अन्तर्मुख कर, ज्ञान किरणों को एकाग्र कर ईश्वर के स्वरूप चिन्तन युक्त उसके मुख्य तथा अन्य गुण-कर्म-स्वभाव दर्शाते अन्य नाम-जपपूर्वक अपनी आत्मा को सर्वव्यापी ईश्वर में मग्न कर देना यानी समाधि लगाना.. दूसरी पूजनविधि है- व्यवहार काल में ईश्वर द्वारा प्रदत्त मन-बुद्धि-शरीरादि साधनों का ईश्वरोक्त याने वेदोक्त आज्ञाओं का पालन करना है। अब आते हैं जीव स्वरूपी द्वितीय प्रकारक चेतन देवताओं की पूजा विधि.. ऋषियों ने इसे पंचायतन पूजा का नाम दिया है.. अर्थात् माता-पिता-गुरुजन तथा अतिथि का यथायोग्य सत्कार याने उनका प्रियाचरण याने आज्ञापालन, सेवा आदि करना तथा गृहाश्रम में पति-पत्नी परस्पर स्नेह-समर्पण-त्याग एवं सेवा आदि देवत्व के गुणों को धारण करते व्यवहार करें.. ये पंचायतन पूजा जिस घर में होती है वही स्वर्ग होता है.. तथा उन्हीं की सन्तान सुसंस्कारित एवं सर्वगुण तथा समृद्धि-सम्पन्न हो सकती है.. अब आते हैं अन्तिम प्रकारक जड़ देवताओं के पूजनविधि पर.. यद्यपि पृथ्वी वायु जलादि देवताओं में चेतनत्व नहीं है परन्तु हम जीवों को बसाने में ये मुख्य कारक होने से तैंतीस कोटि याने तैंतीस प्रकार के देवताओं में से अष्ट वसुओं में इन्हें गिना गया है.. पृथ्वी जल वायु अन्नादि देवताओं से हम सतत उपकार ग्रहण करते हैं.. तथा सृष्टि में असंख्यात प्राणियों में से हम मनुष्य प्राणी ही हैं जो इनमें असन्तुलन उत्पन्न कर प्रदूषणरूपी भस्मासुर के उत्पन्न होने में कारण बनते हैं.. अग्निर्वै देवानां मुखम् अग्नि सभी जड़ देवताओं का मुख है.. सुगन्धित, रोगनाशक, पुष्टिदायक तथा मधुर पदार्थों को अग्नि में होमने से जल-वायु-अन्नादि की शुद्धि होकर पर्यावरण सन्तुलन स्थापित किया जा सकता है.. अतः अग्निहोत्र को जड़ देवताओं की प्रामाणिक एवं वैज्ञानिक पूजाविधि हम कह सकते हैं। अब आते हैं व्यवहार प्रयोग के अन्य प्राकृतिक वस्तुओं.. तो इनके यथायोग्य रक्षा, साज-सज्जा, तथा यथायोग्य प्रयोजन सिद्धि ही इनका सत्कार अथवा पूजा है ऐसा समझना चाहिए.. इन जड़ वस्तुओं को ईश्वर के स्थानापन्न मानकर इनकी पूजा के नाम पर वर्तमान में प्रचलित सभी विधियाँ अन्धविश्वास और पाखण्ड की श्रेणियों में आ जाएंगे। मैं तो कहता हूं प्रतिमापूजन या विग्रहपूजन भी सम्भव है.. अन्तर केवल इनके जड़-चेतन स्वरूप को यथार्थतः समझ कर यथायोग्य सत्कार की अपेक्षा है..

प्रश्न : क्या आप मुझे प्रतिमापूजन या विग्रहपूजन की यथार्थ विधि समझाएंगे..??
उत्तर : अवश्य समझाऊँगा.. इसके लिए मैं समाज में प्रचलित एक देवता के दो पूजकों का उदाहरण देना चाहूँगा.. भारत एवं विश्वभर में रामायणकालीन महापुरुष बजरंगबलि हनुमान के मन्दिर हजारों नहीं लाखों की संख्या में मिल जाएंगे आप को.. उनकी दो श्रेणियां हम बना लेते हैं.. प्रथम श्रेणि के पूजकों का वर्णन इस प्रकार से है.. वह हनुमान का भक्त प्रतिदिन मन्दिर जाता है, यथा समर्थ्य विग्रह प्रतिमा चित्र या मूर्ति को सिंदूर पुष्प-हार नैवेद्य के रूप में फल मिठाई आदि चढ़ाता है, प्रदक्षिणा करता है, बैठ कर हनुमान चालिसा का जाप करता है, माला फेरता है, घण्टे घडियाल बजा श्रद्धापूर्वक आरती करता है, घर आकर इष्ट-मित्र-स्वजनों में प्रसाद वितरण करता है.. ऐसे भक्तों में सभी न सही पर अधिकांश के जीवन में अल्प या अधिक मात्रा में छल कपट अन्याय, किसी न किसी प्रकार का नशा आदि दुर्गुण भी पाए जाते हैं..

अब दूसरे हनुमानपूजक की कथा सुनें.. यह भी प्रतिदिन मंदिर जाता है, न चित्र को सिंदूर पुष्प या नैवेद्य चढ़ाता, न चालीसा पढ़ता, न घण्टे-घडियाल बजा आरती बोलता, न न प्रसाद बांटता.. तो फिर वहाँ जाकर वह क्या करता होगा ? इस प्रश्न का उत्तर है वह हनुमान जी के सामने खड़ा होकर उनसे प्रेरणा लेता है कि हे हनुमान जी मैंने रामायण में पढ़ा है कि आप की राम-लक्ष्मण की प्रथम भेट के दो घण्टे के वातालाप में आपने राम के मन पर अपने व्याकरण और वेदादि शास्त्रों के अद्भुत विद्वान होने की छाप छोड़ी थी मैं भी उक्त आर्ष ग्रन्थों को पढ़-समझ-जीवन में उतार आप सदृश् प्रज्ञावान बनुंगा.. और हे पवनपुत्र आप न केवल बुद्धिमान् अपितु व्यायाम आदि करके सर्वोत्तम शरीर सौष्ठव (बॉडी बिल्डर) को प्राप्त वज्र-अंग=बजरंग बने थे.. मैं भी मैदानी खेल, आसन, व्यायाम, प्राणायाम आदि द्वारा आपसदृश ही बलवान बनूँगा.. इस पर भी आप की विशेषता ये थी कि आप ने अपने सदृश बुद्धिमान चरित्रवान बलवान वानर समुदाय के युवाओं का संगठन बनाकर राम सदृश धार्मिक क्षत्रिय युवराज के असुर-दलन के कार्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया था.. मैं भी आप के जैसा ही बनकर समाज में चरित्रवान न्यायप्रिय राष्ट्रभक्त युवकों को इकत्रित कर संगठन बनाकर नरेन्द्र मोदी सदृश् किसी नेता के राष्ट्रहित कार्यों में सहायक बनूँगा..

अब आप ही के ऊपर मैं ये निर्णय छोड़ रहा हूँ कि उपरोक्त दो प्रकार के हनुमानभक्तों में से सही याने असली भक्त कौन तथा नकली कौन..!! आपके निर्णय-सुविधा के लिए बता दूँ पहले ने चित्र-पूजा की तो दूसरे ने चरित्र पूजा..!! जी हाँ, आप ने सही पहचाना चरित्र पूजा हर महापुरुष की जीवनोत्थान के लिए आवश्यक ही नहीं अपितु अनिवार्य है जब कि चित्र पूजा निरर्थक..!!

जिज्ञासु : आप का हार्र्दिक धन्यवाद..!! आपने मेरी आंखें आज खोल दी हैं.. इस विषय में अधिक जानकारी हेतु मुझे क्या करना होगा..??
उत्तर : ये मेरा सौभाग्य रहा, तथा इस बात की मुझे भी प्रसन्नता है कि पूजा विषय को लेकर आप के हृदय का अज्ञान या भ्रान्तियों के निराकरण का मैं ईश्वर और ऋषि-मुनि तथा गुरुजनों एवं लम्बे समय से वेदोक्त ब्रह्मचर्यमय जीवन जीने के फलस्वरूप साधन बन पाया.. अधिक जानकारी के लिए निकट के किसी भी आर्य समाज या आर्य समाज द्वारा संचालित संस्थान में जाकर महर्षि दयानन्द जी की लिखी कालजयी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश आद्योपान्त पढें.. इस पुस्तक का एण्ड्रोइड एप्प भी अपने चलभाष पर उतार जब चाहें पढ़ सकते हैं.. कल्याणमस्तु, शुभं भूयात्..!!

‘‘आर्यवीर’’

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