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Today's Words

पुष्प प्रबन्धन

मुझे तोड़ लेना तुम माली
उस पथ पर तुम देना फेंक
मातृभूमि पर षीष चढ़ाने
जिस पथ जाएं वीर अनेक

यह पुष्प अभिलाषा उदात्त अभिलाषा है। पुष्पगुच्छ ऊर्ध्व गति, त्याग गति, उदात्त गति की प्राप्ति करते हैं। यही उनकी सार्थकता है। पुष्प सुवास भी सूक्ष्मगति लोगों को आण्विक स्तर आल्हादित करती है। यदि पुष्प ऊर्ध्व गति को प्राप्त नहीं करता है तो वन-उपवन में ही अपने स्थान खिला खिला सूख जाता है। सुवास सुन्दरता पुष्प की पहचान है। पुष्प देवता तक पहुंचाता है। पुष्प शोभावृद्धिकारक होता है। पुष्प स्वागत प्रतीक होता है चाहे हार रूप में हो या पुष्पगुच्छ रूप में। पुष्प श्रद्धा का प्रतीक है, पूजा का चिह्न है। आदर का स्वर है पुष्प।

भरथरी कहता है पुष्प के दो गतियां होती हैं। इसी प्रकार मनस्वी की भी दो गतियां होती हैं। मनस्वी या दृढ़ विचारों वाले उच्चात्माओं का समाज में महत्वपूर्ण स्थान यह है कि वह सबके हृदय जीतकर उनपर शासन करता है अथवा एकाकी रहता हुआ विस्तृत होता बिखरता रहता है।

प्रबन्धन में मनस्वी जन का प्रयोग यह है कि उसे समुचित समूह का नेतृत्व दिया जाए तो वह प्रबन्धन हित में बड़ा काम करता है। मनस्विता तथा तेजस्विता के कारण जोगों के श्रद्धाभाव उसके प्रति उमड़ उमड़ कर आते हैं। तथा वह इन भावों के कारण प्रबन्धन को अति लाभकर होता है। यह उसका श्रेष्ठ उपयोग है। यदि प्रबन्धन ऐसे व्यक्ति को एकाकी कर देता है तो भी सन्तोषी मनस्वी स्वयं ही संस्थान हित की सोचता रहता है, बिखरता रहता है।

मनस्वी पुष्पवत ही कोमल स्वभाव होता है। इसका नियमन सावधानीपूर्वक करना चाहिए। भारतीय प्रबन्धन की अति कमजोर कड़ी है मनस्वी प्रबन्धन। एक शोध के अनुसार जहां तक मुझे स्मरण है पचहत्तर प्रतिशत मनस्वियों (पी.एच.डी., डी.लिट) को उनके क्षेत्रों से हटकर कार्य दिया गया है। भिलाई इस्पात संयन्त्र के परियोजना विभाग में सारे कालेज के मेरिट होल्डर सुपरसीड हो चुके हैं। जो अभियन्ता सुपरसीड नहीं हो चुके हैं वे पठन में औसत से घटिया रहे हैं। परियोजना विभाग गुणवत्ता या मनस्वी आदर जो उच्च प्रबन्धन द्वारा दिया जाता रहा है के अनुरूप मात्र सफल असफल रहा है।

”मनस्वी मृर्ध्नि“ सिद्धान्त का प्रबन्धन में अनुपालन संस्थान को श्रेष्ठ कर देता है। आन्ध्र प्रदेश प्रबन्धन अपेक्षाकृत अधिक मनस्वी मूर्ध्नि होने के कारण बिहार प्रबन्धन से कहीं कहीं श्रेष्ठ ठहरता है। संवैधानिक या व्यवस्थायी सिद्धान्तों का ढांचा इस प्रकार होना चाहिए कि ”धूर्त मूर्ध्नि“ स्थिति या ”मूर्खमूर्ध्नि“ या ”अज्ञ मूर्ध्नि“ स्थिति प्रबन्धन में कभी आने ही न पाए।

मनस्वी की एक महत्वपूर्ण पहचान यह है कि वह मणिवत होता है। रविरश्मि पग ठोकर से सूर्यकान्त मणि ज्योति झिलमिला उठती है, चकाचौंध पैदा कर देती है। ठीक इसी प्रकार तेजस्वी पुरुष दूसरों द्वारा की गई अवमानना को न सहते चकाचौंध पैदा कर देते हैं। ”परकृत विकृति“ को मनस्वी सहन ही नहीं किया करते हैं। दूसरो द्वारा किए गए व्यवस्था के अवमूल्न को वे अपना अपमान समझते तमक चमक उठते हैं।

रजनीश द्वारा हनुमान मन्दिर परिसर सेक्टर 2 में धर्म के विरुद्ध दिया सिद्धान्तहीन भाषण सुनकर मनस्वी आनन्द विरोध स्वर तमतमा उठा था। आनन्द एक मनस्वी था पर प्रजातन्त्री भीड ने उसे न समझते हुए एकाकी कर दिया था। वह वन पुष्प की भांति स्वयं में स्वयं बिखर गया था। न होता मैं सशक्त इस दुनियां पर, न होता दयानन्द सशक्त इस दुनियां पर, न होता सुकरात सशक्त इस दुनियां पर, न होता स्पिनोजा सशक्त इस दुनियां पर तो दुनियां ने कुछ नहीं छोडा होता मुझे इन्हें पागल घोषित करने के लिए।

मध्यप्रदेश व विदर्भ आर्य प्रतिनिधि सभा का शताब्दि वर्ष मनाया जा रहा है। उसमें एक संकल्प घोषणा पत्र जारी किया गया। उसमें सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा ने ‘आर्य’ शब्द की प्रजातन्त्र से कुप्रभावित होकर अपनी परिभाषा प्रचलित करते आर्य होने की भावना का संकल्प भी दर्शाया। प्रस्ताव का मंचस्थ सारे आर्य विद्वानों ने वक्तव्य दे देकर समर्थन किया। मैं सार्वदेशिक प्रधान स्वामी ओमानन्द सरस्वती से तत्काल आर्योद्देश्यरत्नमाला पुस्तिका के साथ मंच पर जाकर मिला। उन्हें दयानन्दकृत परिभाषा तथा सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभाकृत परिभाषा दिखाई और कहा कि दयानन्दकृत परिभाषा श्रेष्ठ है अतः वही रहनी चाहिए। सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान ने कहा- ”हम आपसे सहमत हैं पर हम क्या कर सकते हैं आप म.प्र.प्रतिनिधि सभा से बात करिए“

”पर आप तो सार्वदेशिक प्रधान हैं न? इसलिए मैं आपके पास आया हूँ। अध्यक्षीय उद्बोधन में कह सकते हैं।“
”ठीक है मैं कह दूंगा“ वे बोले। पर उनका भाषण भी इस सन्दर्भ में टांय टांय फिस्स रहा।
”सत्य ब्रह्म के निकट होता है“ बिल्ली भाग्य छींका टूटा प्रस्ताव प्रस्तावक श्री रमेशचन्द्र श्रीवास्तव ने प्रस्ताव पारित होने भीड के सामने रख दिया। मंचस्थ लोगों के हाथ सबसे ऊंचे थे। सारी भीड ने हाथ उठा दिए। मैं लगभग दौड़ता प्रस्ताव हाथ में ऊपर उठा झुलाता मंच के निकट चला गया। तब तक पास पास ध्वनियां आ रहीं थीं। मैंने बिना माईक भीड़ को सम्बोधित करते मंच को सुनाते कहा ये आप लोग क्या कर रहे हैं? मैं प्रस्ताव में आर्य शब्द बदलने का पूर्ण विरोध करता हूँ। तथा दयानन्द की आर्य परिभाषा जो श्रेष्ठ है को बनाए रखने की मांग करता हूँ। मेरा अकेला नाम प्रस्ताव के इस भाग के विरोध में लिख लिया जाए।“ भीड तो भीड होती है कुछ बंट गई। बात सशक्त स्वर में कही गई थी। कुछ बह गई कुछ रह गई। उसके प्रभाव से बाद में सभामन्त्री ने मुझसे सम्पर्क किया कहा आप क्या परिवर्तन चाहते हैं वह प्रारूप हमें लिखकर दे दीजिए। हम प्रस्ताव सुधार देंगे। मैंने दो बार प्रस्ताव उन्हें लिखकर दे दिया।

मनस्वी की शक्ति श्रेष्ठता में होती है। ”मनस्वी मूर्ध्नि“ जपान ने, जर्मनी ने, अमेरिका ने, ब्रिटेन ने अपनाया। तभी तो वहां तागुची, डेमिंग, पिटर, जुरान, इषिकावा प्रबन्धन गुरुओं का आदर किया जाता है। कभी भारत में गौतम, कपिल, कणाद पतंजलि आदि मनस्वी मूर्ध्नि गिने जात थे। भारत विष्व सिरमौर था। पुनः सिरमौर होने इसे मनस्वी मूर्ध्नि के पुनर्प्रयास करने होंगे।

स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय
पी.एच.डी. (दर्शन – वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (आठ विषय = दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)

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