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Praj Tantra Visthapana

प्रज बनाम प्रजातन्त्र

भीड़ पैदल को कुचलती है। भीड़ है प्रजा, व्यक्ति है पैदल। प्रजा का मस्तिष्क हमेशा उससे आगे बढ़े पैदल से कम होता है। प्रजा और प्रज के टकराव से इतिहास बनता है। भीड़ से अधिक विकसित व्यक्ति की संज्ञा है प्रज। भीड़ अन्धी होती है। अरविन्द ने कहा था-”राज्य भावना (भीड़ भावना या प्रजातन्त्र भावना) या एक छोटी या बड़ी सजीव मशीन और व्यक्ति भावना अधिकाधिक विशिष्ट प्रकाश युक्त और देवत्व की ओर बढ़ता हुआ पुरुष नित्य खड़े हो जाते हैं।“

निरंकुश शासक का सब पर अत्याचार एक ही पहलू के दो रूप हैं। इतिहास गवाह है कि भीड़ ने पैदल को कुचला है। अरस्तु ने कहा था ”अन्धों में एनेक्सगोरस ही देखनेवाला था।“ पश्चिमी सभ्यता के इतिहास में 500 ई.पू. एनेक्सगोरस एथेन्स में रहता था। उस समय एथेन्स की प्रजा सूर्य और चन्द्रमा में अगाध भक्तिभाव रखती थी। एनेक्सगोरस के स्वतन्त्र विचार थे। वह प्रज था। उसने कहा ”सूर्य जलता हुआ पत्थर है और चन्द्रमा मिट्टी का बना हुआ है।“ एनेक्सगोरस पर देव निन्दा का आरोप लगाया गया। वह दोषी ठहराया गया। उसे मृत्युदण्ड सुनाया गया। उस समय एथेन्स में प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र था, जो प्रजातन्त्र का सर्वश्रेष्ठ रूप है। उस समय के एक लेखक ने कहा है ”एथेन्स के लोग अपने घरों में अति चतुर किन्तु सामूहिक निर्णयों में अति बुद्धिहीन थे।

सुकरात 399 ई.पू. में 70 वर्ष का था। वह उन्मुक्त-चर्चा (शास्त्रार्थ) का मसीहा था। तर्क सम्राट अपनी आन्तरिक आवाज से शक्ति प्राप्त करता था। 70 वर्ष की उम्र में 501 एथेन्सवासियों की अदालत ने उस पर आरोप लगाया कि 1.वह राष्ट्र के देवताओं को नहीं मानता। 2.वह नए देवता मानता है। 3.वह एथेन्स के युवकों का चरित्र बिगाड़ रहा है। अदालत ने सुझाव दिया कि उसे मृत्युदण्ड दिया जाए। सुकरात ने सफाई दी। प्रजा ने कहा ”वह मृत्यु से बच सकता है, इस शर्त पर कि वह एथेन्स छोड़ दे या ज़ुबान बन्द रखे। प्रज सुकरात ने दोनों शर्ते न मानीं। जनता ने बहुमत से उसे विषपान मृत्युदण्ड दिया। सुकरात ने विष पी लिया। अपने जीवन के समान शानदार मृत्यु जी ली। आज वह प्रजा नहीं है सुकरात जिन्दा है।

सुकरात के भक्त प्लेटो की पाठशाला के मस्तिष्क ‘अरस्तू’ पर एक पुरोहित ने प्रार्थना ओर बलिदान को निष्फल बताने का आरोप लगाया। अरस्तू को एथेन्स से निकाल दिया गया।प्रजा उच्चतर सत्य कभी भी स्वीकार नहीं करती है। प्रजा अधिकतर सच में विश्वास रखती है। प्रजा की दृष्टि पीछे की ओर होती है। प्रज की दृष्टि आगे की ओर होती है। यही कारण है कि प्रज को प्रजा बीत जाने के बाद मान्यता देती है। प्रजा उच्चतर सत्य कभी भी सहजतः स्वीकार नहीं करती।

ब्रूनो ने पृथ्वी, सूर्य, तारों के विषय में प्रजा से आगे का दृष्टिकोण अपनाया। उसने कहा ”हमारी पृथ्वी की तरह असंख्य तारों पर प्राणी बसते हैं।“ ब्रूनों को अपने विचारों के कारण जीवित ही अग्नि में जला दिया गया। जब उसे यह दण्ड पढ़कर सुनाया गया तो उसने न्यायाधीशों से कहा ”मुझे तुम्हारा निर्णय सुनते हुए इतना भय नहीं लगता जितना तुम्हें सुनाते हुए होता है।“

जो ब्रूनों के साथ हुआ वही टामस हाब्स के जीवन के साथ हुआ। दार्शनिकों में जितने विरोध हाब्स को सहने पड़े उतने किसी और को नहीं सहने पड़े। जब वह 78 वर्ष का था तो उसकी पुस्तक ‘लेवायथन’ अर्थात् ‘धार्मिक और नागरिक राष्ट्रमण्डल की सामग्री, आकृति तथा शक्ति’ को चर्चने धर्म विरुद्ध ठहराया। लोकसभा में 1666 में पुस्तक की निन्दा की गई और बिल पेश किया गया कि हाब्स को नास्तिकता और धर्मविरोधी भाषा के प्रयोग के लिए दण्ड दिया गया।ब्रूनों के विचार की पुष्टि में गैलीलियो ने दूरबीन बनाई, और उसे जेल में सड़ना पड़ा। इसी कारण दार्शनिक डेकार्ट अपने भौतिक विज्ञान सम्बन्धी विचारों को प्रकाशित न कर सका। डेकार्ट ने ”मैं चिन्तन करता हूं अतः मैं हूं“ यह प्रमाण दिया था बैरुश स्पिनोजा ने इतना पढ़ा कि पढ़ाई से आगे निकल गया। उसने डेकार्ट की मर्यादा प्रतिबद्धता (भय) पर प्रतिकार किया। उसकी विचार मौलिकता से यहूदी पुरोहित-मण्डल और भीड़ सहम गए। उसे मण्डलाधीशों ने जाति बहिष्कार के शब्द सुनाए तथा प्रसारित किए। उसका अन्तिम अंश इस प्रकार का है… ”इस आदेश द्वारा सब यहूदियों को निर्देश दिया जाता है कि कोई भी उसके साथ न बोले, न उससे पत्र व्यवहार करे। कोई भी उसकी सहायता न करे, न कोई उसके साथ एक मकान में रहे। कोई भी चार हाथों से कम उसके निकट न आए, और कोई भी उसके लेख को जो उसने लिखवाया हो न पढ़े।“

स्पिनोजा का जीवन भीड़ से एक महान संघर्ष था। ‘यहूदी’ बहिष्कृत जाति थी। वह उससे भी बहिष्कृत था। उसके पिता ने उसे अस्विकार कर दिया। पिता मृत्यु पर पिता सम्पत्ति पर कानूनी हक अदालत से पाकर भी उसने बहन की लालच भावना के कारण वह सम्पत्ति बहन को दे दी। किसी से मदद न ली। उसके हाथ लौकिक कार्य ताला बनाने में तथा मस्तिष्क चेतना के असंख्य रूपों में प्रमुख रूप से जुड़ा रहा। उसकी पुस्तकें उसके मृत्यु पश्चात प्रकाशित हुईं। एक तंग कोठरी में उसने विश्व से आज़ाद विचार जिए। निर्धन स्पिनोजा आन्तरिक समृद्ध था। 44 वर्ष की ही आयु में उसका देहान्त हो गया।

इमॅन्युएल काण्ट की पुस्तक ”स्वाभाविक धर्म“ तत्कालीन भीड़ को सहन नहीं हुई और उसने राजा से शिकायत की। राजा ने काण्ट को चेतावनी चत्र लिखा, जिसमें कहा गया कि उसकी शिक्षा से ईसाइयत को बहुत हानि पहुंची है। और राजा बहुत नाराज है। उसे सम्हलना चाहिए नहीं तो परिणाम भयंकर होंगे। दर्शन की अटारी में एकाकी बैठा काण्ट भयंकर परिणाम की ओर न बढ़ा। भीड़ ने विश्व को धर्मचिन्तन से वंचित कर दिया।

दुनियावी भीड़ के कारण शॉपेनहॉवर ने अपना जीवन एकाकी ही जिया। उसकी पत्नी उसकी सादगी के कारण उसे एकाकी छोड़ गई। उसकी मां ने उसे लिखा ”तुम असह्य हो मत जाना। उसकी पांच वर्ष की मेहनत करके लिखी गई पुस्तक रद्दी में बेच दी गई उसने इसके पूर्व प्रकाशक को लिखा ”जब कोई पुरुष बड़ी पुस्तक लिखता है तो जनता के स्वागत और आलोचकों की प्रतिकूल आलोचना की उतनी ही परवाह करता है जितनी कि स्वस्थ चित्त मनुष्य पागलों के वचनों की।“ जाहिर भीड़ से कटे शॉपेनहॉवर का अकेला बन्धु सफेद कुत्ता था जिसे वह आत्मा कहता था। किसी विश्व विद्यालय में उसके लिए स्थान न था। रक्त-सर्द बुढ़ापे में उसे सम्मान मिला, जो उसके लिए रद्दी के समान था।

बहुत पुरानी नहीं फेड्रिक नीत्शे ने एक पुस्तक लिखी- ‘जरथुस्त के कथन’। इस पुस्तक पर प्रजा की राय का पता इससे लगता है कि पुस्तक की 40 प्रतियां बिकीं 7 भेंट की गईं, स्वीकृत हुई और किसी ने इसकी प्रशंसा न की। इसकी प्रशंसा तब हुई जब जीवन के अन्तिम वर्षों में नीत्शे पागल हो चुका था।

सिसरो की क्रूर हत्या और दांते विश्व राज्य की श्रेष्ठ कल्पना- ‘द मोनार्चिया’ को चर्च द्वारा जला देना, उसे न पढ़ने योग्य, काली पुस्तकों की सूची में रखना अन्धी प्रजा के अन्य गुनाह हैं। अन्धी प्रजा नें प्रज को कभी भी नहीं स्वीकारा। पाश्चात्य विश्व में वह धीरे-धीरे कायर लेखकों का समर्थन प्राप्त करती रही। और अन्त में प्रजातन्त्र की स्थापना हुई। इस प्रजातन्त्र में जो भी प्रजानन (नेता जिसका आनन प्रजा का है) प्रजा स्वीकृत हुए हैं- वे औसत योग्यता से भी निम्न स्तरीय, किसी तरह की घिसी पिटी नीतियों की लकीर पीटते, मात्र फटाका बातें करते, अत्यधिक लादे गए अधिकारों से युक्त, वास्तविक कार्य और अधिकार अनुपात प्रतिशत क्षमता में सामान्य श्रमिक से भी निम्न, घोर सुविधाभोगी और चकाचौंधों से जनता को प्रभावित करते इतिहास पुरुष, इतिहास-रत्न बनते हैं।

प्रजातन्त्र इतनी घातक व्यवस्था है कि यह प्रज (प्रजा से अधिक योग्यों को) पनपने ही नहीं देती है। इसे आज प्रजतन्त्र से विस्थापित करना ही होगा। प्रजतन्त्र वह व्यवस्था है जो संविधान से शासन तक प्रज या व्यक्ति आधारित है। जिसकी ओर स्व-तन्त्र, स्व-आधीन, स्व-स्थ, स्व-अस्ति, स्व-त्व, स्व-सम आदि प्रत्यय इंगन कर रहे हैं। इसकी तुलना में प्रजातन्त्र सर के बल खड़ी व्यवस्था है। एनेक्सगोरस, सुकरात, अरस्तु, ब्रूनो, हाब्स, स्पनोजा, इमॅन्युएल काण्ट, शॉपेनहावर, नीत्शे, सिसरो, दांते भद्र पुरुष थे स्व-तन्त्र थे, स्वाधीन थे, स्व-यम (स्व नियम नियमित) थे।

आधुनिक प्रजातन्त्र के स्वातन्त्र्य अधिकार मात्र तीन पंक्तियों के हैं। और उन पर प्रतिबन्ध छत्तीस पंक्तियों के हैं। बाएं हाथ की छीनी ऊंगली से दिए गए स्व-अधिकार दोनों हाथों के प्रजा अधिकारों द्वारा बुरी तरह नोच दिए गए हैं।

भारतीय संविधान की धारा 19 का मूल अस्तित्व लहूलुहान है। इसमें ‘स्व’ की तन्त्रता, अधीनता अस्तित्वता, नियमन का आधार स्व न मानकर प्रजा माना गया है। संविधान-वर्तमान विधि के खिलाफ, संविधान के खिलाफ, लोक व्यवस्था के खिलाफ, इनसे अधिक स्वस्थ आचरण, इनसे उच्च चिन्तन की भी इजाजत नहीं देता। यदि कानून ही भ्रष्ट हो तो उसे तोड़ने का सबको हक है। हक ही नहीं उसे नष्ट करना सबका प्रथम कर्तव्य है। भीड़ द्वारा मारे गए प्रजों-महान चिन्तकों नेें यही कर्तव्य पालन किया था, जो उस समय गुनाह था। उफ! यह आज भी गुनाह है।

सारे महान चिन्तक उस समय के कानूनों से महान थे। क्यों कि वे तटस्थ थे, अन्धे नहीं थे। अर्थात् विशिष्ट टोपीधारी नहीं थे। उनके सिर टोपियों से बड़े थे। तटस्थता बुद्धि की आत्मा है। आज के प्रजातन्त्र में ”बुद्धि की आत्मा“ की हत्या का विधान संविधानों में ही है। प्रजातन्त्र के संविधानों से गुजरकर मात्र तरह-तरह के अन्धे ही उच्चतम पदों पर पहुंच सकते हैं। हर शाख पर उल्लू तो कुछ ठीक ही व्यवस्था है। क्यों कि उल्लुओं को तो रात में तो दीखता है। यहां तो हर शाख पर अन्धे उल्लुओं का राज्य है। प्रतिबद्धता किसी भी पार्टी के प्रति हो, शुद्ध अन्धेपन का ही नाम है। कुछ न दिखना भयानक बीमारी है। शुद्ध अन्धापन है, जो अन्धेपन से भी खतरनाक है। शुद्ध अन्धेपन के दबाव समूहों को प्रजातन्त्र मान्यता देता है। प्रजातन्त्र व्यवस्था में जातिगत, पार्टीगत, नगरगत, प्रान्तगत, ग्रामगत, शिकंजों का जो स्वरूप विकसित हुआ है वह धार्मिक शिकंजों से कहीं नीच, कहीं घिनौना, कहीं दमघोंटू है।

बहुसंख्यक दल व्यवस्था का व्यक्ति पर अत्याचार निरंकुशके व्यक्तियों पर के अत्याचार से कहीं भयानक, कहीं बीभत्स है। निरंकुश शासन में भद्र पैदा होने की संभावना तो रहती है, परन्तु बदल अत्याचार व्यवस्था में प्रज या भद्र या तटस्थ पैदा होने, पनपने की सम्भावनाएं नष्ट कर दी गई है। अरविन्द ने आज के राजनीतिज्ञों जो महान दशानन या प्रजानन (कई वोटों से बने चेहरेवाले) हैं के बारे में कहा है कि ”संसार के किसी भाग के राजनीतिज्ञ के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता कि वह जाति की आत्मा याउसकी उच्च आकांक्षाओं का प्रतीक नहीं होता। साधारणतया वह अपने चारों ओर की आम तुच्छता, स्वार्थपरता, अहंबुद्धि और आत्मप्रवंचना का ही प्रतिनिधि होता है। इनका प्रतिनिधित्व तो वह भली-भांति करता ही है, साथ ही अत्यधिक मानसिक अयोग्यता, नैतिक रूढ़िता, भीरुता, क्षुद्रता तथा पाखंड का प्रतिनिधित्व भी करता है।“ यह तो प्रजातन्त्र की सबसे श्रेष्ठ, सम्भ्रान्त, सर्वाधिकार-सम्पन्न फसल है। इस राजनीतिज्ञ के विषय में आगे कहा है कि ”उच्च शब्द और उत्तम विचार उसके मुख पर होते हैं। पर वे शीघ्र ही पार्टी के विज्ञापन की चीज बन जाते हैं। वर्तमान राजनीतिज्ञ जीवन में असत्याचरण का यह रोग संसार के प्रत्येक देश में दृष्टिगोचर हो रहा है, और सब लोग यहां तक कि बुद्धिजीवी वर्ग भी मन्त्रमुग्ध होकर उस बढ़े संगठित स्वांग में सहमत और सहभागी हो जाते हैं। उससे रोग ढंक जाता है, तथा लम्बे समय तक चलता रहता है।“

इस आलेख द्वारा आह्नान है उन महान बुद्धिजीवीयों का जो इस स्वांग के सहभागी नहीं हैं। वे अपने-अपने क्षेत्र प्रजातन्त्र हत्या महान प्रयास से करें। वर्तमान एवं भविष्य उनका आभारी होगा।

स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय
पी.एच.डी. (दर्शन – वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (आठ विषय = दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)

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